- कार्बन-१४ जांच - शाहजहाँ से पूर्व बनी ताजमहल की इमारत बड़ी प्राचीन है और वह हिन्दू ग्रंथो के आधार पर बनाई गई है यह मेरा संशोधन पढ़कर एक अमेरिकन प्राध्यापक (Marvin Mills) भारत आया था । ताजमहल के पीछे, यमुना के किनारे पर ताजमहल का एक प्राचीन टूटा हुआ लकड़ी का द्वार है वह उसका एक टुकड़ा ले गया । उस टुकड़े की उस विद्वान ने Newyork की एक प्रयोगशाला मे भौतिक Carbon-14 जाँच कराई । उस जाँच मे भी ताजमहल शाहजहाँ से सैकड़ो वर्ष पूर्व बनी इमारत सिद्ध हुई ।
- स्थापत्य के साक्ष्य - मिसेस केनोयर, ई०वी० हवेल और सर डब्ल्यू० डब्ल्यू० हण्टर जैसे प्रख्यात पाश्चात्य विद्वानों का मत है की ताजमहल हिन्दू मंदिर की प्रणाली के अनुसार ही बनाया गया है । हवेल ने लिखा है की जावा के प्राचीन चंडी सेवा मंदिर की रूपरेखा जैसी ही ताज की रूपरेखा है ।
- ताजमहल के शिखर पर चार कोनों मेँ चार छात्र और बीच मेँ गुंबद यह हिन्दू पंचरत्न की कल्पना है । इसी प्रकार हिन्दू परंपरा मेँ पंचगव्य, पंचामृत, पंचपात्र, गाँव के पाँच आदि होते है ।
- ताजमहल के चार कोनों पर खड़े संगमरमर के चार स्तम्भ हिन्दू धार्मिक परंपरा के अंग हैं। वे रात तो प्रकाश स्तम्भ व दिन को पहरेदारों के निगरानी के स्तम्भ के नाते उपयोग में लाये जाते थे । इस प्रकार के स्तम्भ प्रत्येक पूजास्थल की चतुस्सीमा निर्धारण हेतु लगाए जाते हैं । हिंदुओं के विवाह एंव सत्यनारायन पूजा वेदी के चार कोनों पर लगाये जाने वाले चार स्तम्भ आज भी इनके साक्षी हैं । किसी पूजा स्थान या मंगल स्थान के चार कोनों पर स्तम्भ खड़े करना वैदिक प्रथा है ।
- ताजमहल का अष्टकोणी आकार हिन्दू विशिष्टता है । हिन्दू परम्परा मे आठ दिशाओ के आठ दैवी पालक नियुक्त है जो अष्टदिक्पाक्ष कहलाते है । स्वर्ग तथा पाताल मिलाकर दस दिशा निर्देशित हो जाती है । किसी वस्तु या वस्तु का शिखर आकाश का निर्देश करता है तो नींव पाताल की प्रतीक होती है अत: पृष्ठ भाग पर इमारत अष्टकोणी करने दस दिशा निर्देशित हो जाती है । राजा या परमात्मा का अधिकार दस दिशाओ मे होता है। अत: राजा के संबन्धित या देवो से संबन्धित इमारत या तो स्वंय अष्टकोणी होती है या उसमे कही-न-कही अष्टकोणी आकार बनाये जाते है । इसी नियम के अनुसार ताजमहल का आकार आठकोना है । दिल्ली की तथाकथित जामा मस्जिद के सारे द्वार-मार्ग अष्टकोणीय है अत: वह भी अपह्रत हिन्दू मंदिर है ।
- ताजमहल के गुम्बद पर जो अष्टधातु का कलश खड़ा है वह त्रिशूल के आकार का पूर्ण कुंभ है । उसके मध्य दण्ड के शिखर पर नारियल की आकृति बनी है । नारियल के तले, दो झुके हुए आम के पत्ते और उनके नीचे कलश दर्शाया गया है । चन्द्रकोर के आकार के कमानदार लौहदंड पर कलश आधारित है । उस चन्द्रकोर के दो नोक और उनके बीचोबीच नारियल का शिखर मिलकर त्रिशूल का आकार बना है । हिमालय की घाटियो मे बने हिन्दू या बौद्ध मंदिरो पर ऐसे ही कलश लगे है । ताजमहल की चार दिशाओ मे बने उत्तुंग संगमरमरी प्रवेशद्वारों के कमानो के नोको पर भी रक्त कमलरूपी त्रिशूल अंकित है । असावधानी से जल्दवाजी मे लोग उस त्रिशूलाकृति कलशदण्ड को इस्लामी चाँद कहते आ रहे है । गुम्बद पर चढ़कर जिन कर्मचरियों ने, उस कलशदण्ड का समीप से निरीक्षण किया है वे बताते है कि उस अष्टधातु के कलश पर ‘अल्लाह’ ऐसे अरबी अक्षर खुदे है और Taylor यह आंग्ल नाम अंकित है । यदि वह सही है तो वह कनिंगहम कि हेराफेरी हो सकती है । सेना का इंजीनियर होने से कनिंगहम के टेलर नाम के किसी इस्तक ने गुम्बद पर चढ़कर ज्वाला फेंकने वाले स्टीव उपकरण से कलश को गरम कर उस पर अल्लाह तथा Taylor यह दो नाम गढ़ दिये । ताकि लोग ताजमहल को इस्लामी इमारत ही समझे । किन्तु संगमरमरी ताजमहल के पूर्व मे लाल पत्थर के आँगन मे उस कलश की जो पूर्णाकृति जड़ी है उसमे अल्लाह और Taylor नाम नही है । इससे कनिंगहम के पड्यंत्र का भेद खुल जाता है । पूर्व दिशा का वैदिक परम्परा मे महत्व होने से पूर्वी आँगन मे कलशदंड की आकृति अंकित रहना ताजमहल परिसर के हिन्दुत्व का एक और प्रमाण है।
- असंगत तथा भ्रामक तथ्य - संगमरमरी ताजमहल के पूर्व में तथा पश्चिम मे एक जैसे दो भवन है । पश्चिम दिशा वाली इमारत को शाहजहाँ के समय से मुसलमान लोग मस्जिद कह रहे है । उसमे एक भी मीनार नही है जबकि ताजमहल यदि कब्र हो तो उसके चार कोनो पर चार समान मीनार क्यों ? ऐसे मुद्दो का लोग विचार नही करते और यदि पूर्ववर्ती इमारत मस्जिद नही है तो उसका आकार पश्चिम वाली इमारत के समान क्यों है ? यदि आकार समान हो तो इमारतो का उपयोग भी समान होना चाहिए । अत: जब पूर्ववर्ती इमारत मस्जिद नही है तो उसके जोड़े वाली पश्चिम की इमारत भी मस्जिद नही हो सकती । वास्तव मे दोनों भवन तेजोमहालय मंदिर की दो धर्मशालाएँ है।
- पश्चिम वाली उस तथाकथित मस्जिद से लगभग ५० गज पर नक्कारखाना है । यदी वह इमारत मूलत: मस्जिद होती तो उसके इतने निकट नक्कारखाना नही बनाया जाता । यदि ताजमहल मूलत: कब्र होती तो उसमे नक्कारखाने का तो कोई काम ही नही । क्योंकि मृतात्मा को शांति की आवश्यकता होती है न कि शोर की । और नगाड़ा बजाकर मृत मुमताज़ को जगाने की कोई आवश्यकता ही नही थी । इसके विपरीत, हिन्दू मंदिर या महल में नक्कारखाना होना आवश्यक है क्योंकि श्रुतिमधुर शांति भक्ति संगीत से ही प्रात:–सायं दैनंदिन हिन्दू जीवन आरम्भ होता है।
- केंद्रीय अष्टकोने कक्ष में जहाँ मुमताज की नकली कब्र है (और जहाँ उससे पूर्व शिवलिंग होता था) उसके द्वार में प्रवेश करने से पूर्व प्रेक्षक दायें – बायें दीवारों पर अंकित संगमरमरी चित्रकला देखिए । उसमें शंख के आकार के पत्ते वाले पौधे तथा ॐ आकार के फूल दिखेंगे । कक्ष के अंदर संगमरमरी जालियों का जो अष्टकोना आलय बना है उन जालियों के ऊपरी किनारे में गुलाबी रंग वाले कमाल जड़ें हैं । यह सारा हिन्दू चिन्ह है ।
- मुमताज की नकली कब्र के स्थान पर कभी शिव जी का तेजोलिंग होता था । उसके पाँच परिक्रमा मार्ग हैं । संगमरमरी जाली के अंदर से पहली परिक्रमा होती थी । जाली के बाहर से दूसरी परिक्रमा होती थी । तीसरी परिक्रमा उस कक्ष के बाहर से होती थी । चौथी परिक्रमा संगमरमरी चबूतरे से होती थी । पाँचवी परिक्रमा लाल पत्थर के आँगन से की जाती थी ।
- ताजमहल के गर्भगृह के ऊपरी तथा निचले कक्षों के द्वार चाँदी के थे । शिवलिंग के चारों और रत्नजड़ित सोने के खंबे लगे थे । सोने के घड़े से शिवलिंग पर जल बिन्दुओं का अभिषेक होता रहता था । संगमरमरी जाली में रत्न जड़े होते थे । मयूर सिंहासन भी यंही था।
- इतनी सारी संपत्ति हड़प करने के लालच से ही शाहजहाँ ने मुमताज को ताजमहल में ही दफनाने की चाल चली । जयपुर नरेश जयसिंह मुगलों का अंकित भी था और आगरे से २५० मील की दूरी पर रहता था । आगरा तो मुगलों की राजधानी थी । अत: एकाएक घेरा डालकर जब मुगलई सेना ने ताजमहल स्थित सारी संपत्ति हड़प करना आरंभ किया तब जयसिंह देखता ही रह गया ।
- शाहजहाँ के शासन काल में जो यूरोपियन प्रवासी आगरे आए थे उनमे एक अंग्रेज़ पीटरमंडी था । मुमताज की मृत्यु के पश्चात केवल एक या डेढ़ वर्ष में वह इंग्लेंड वापस लौट गया । तथापि उसने उस समय लिख रखा है कि मुमताज की कब्र के चारों ओर रत्नो से जड़े सोने के खंबे लगे थे । इससे सिद्ध होता है कि वहाँ स्थित शिवलिंग के ऊपर जब मुमताज के नाम की कब्र बनाई गई तो शिवलिंग के चारों ओर सोने के खंबे कब्र के चारों ओर के खंबे बन कर रह गए । अब वे वहाँ नही है । इससे स्पष्ट है कि उन्हें उखाड़कर शाहजहाँ के खजाने मे जमा करा दिया गया । यदि ताजमहल २२ वर्षो मे बना होता तो मुमताज की मृत्यु से एक वर्ष के अंदर वहाँ सोने के खंभे कैसे लगे होते ? इतने सारे धन-दौलत समेत ताजमहल का हड़प किया जाना शाहजहाँ और जयसिंह के बीच बड़े विवाद का कारण बन गया ।
- सोने के खंभे के आधार जहाँ जमीन में गड़े थे वहाँ कब्र के चारो ओर वे सुराख बंद किए जाने के निशान बारीकी से देखने पर अभी भी दिख जाते है । उनसे पता चलता है कि वह खंभे चौकोर लगे हुए थे ।
- कब्र के ऊपर गुंबद के मध्य से अष्टधातु की एक जंजीर लटक रही है । शिवलिंग पर जलसिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी जंजीर से टँगा था । उसे निकालकर जब शाहजहाँ के खजाने मे जमा करा दिया गया तो वह निकम्मी लटकी जंजीर भद्दी दिखने लगी । अत: गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने वहाँ एक दीप उस जंजीर मे लटकवा दिया । वह दीप अभी भी वहाँ लटका हुआ है ।
- उस घट से जो बूंद-बूंद पानी शिवलिंग पर टपकता था । वह शाहजहाँ द्वारा घट हड़प होने के पश्चात बन्द हो गया । तथापि बूंद टपकने की बात लोगो की स्मृति मे बनी रही । अत: समय बीतते-बीतते कब्र के ऊपर शाहजहाँ का आँसू टपकने की बात अनजाने चल पड़ी ।
- शाहजहाँ के आँसू गत सैकड़ो वर्ष लगातार मुमताज़ की कब्र पर टपकते रहने की बात एकदम असंगत एवं अविश्वसनीय है । पता नही लोग असावधानी से उसे कैसे दोहराते आ रहे है । यदि ऐसे कोई आँसू टपकते तो कब्र के पास बैठने वाला मुजावर एक कपड़ा लेकर सर्वदा गीली जमीन पोंछ्ता हुआ दिखाई देता । शाहजहाँ कोई साधु, सन्यासी या योगी तो था नही उसकी आत्मा मृत्यु के पश्चात आँसू टपकने का चमत्कार कर सके । शाहजहाँ तो एक क्रूर अत्याचारी रंगेल बादशाह था । और एक मुद्दा यह है कि ताजमहल मे एक के ऊपर एक ऐसे दो गुम्बद होने से कोई पानी अंदर टपक ही नही सकता । कब्र के पास खड़े होकर अंदर से जो गुम्बद दिखता है वह छत के ऊपर उल्टी कड़ाही के समान समाप्त हुआ है । बाहर से जो गुम्बद दिखता है वह टोपी जैसा उस गुंम्बद पर ढका हुआ है । जिस गुम्बद की गोलाई पर बंदर भी नही ठहर सकता है वहाँ शाहजहाँ की आत्मा या शाहजहाँ का भूत गुम्बद के ऊपर बैठकर मुमताज के लिए आँसू कैसे बहा सकेगा ? और यदि शाहजहाँ के भूत को या आत्मा को रोना ही होता तो वह अन्य प्रेक्षकों जैसे उत्तुंग द्वार से प्रवेश कर कब्र पर सिर पटक-पटक कर रोना पसंद करेगा न की धूप तथा बरसात मे फिसलाने वाले गुम्बद की गोलाई पर बैठकर रोना चाहेगा ? गुम्बद मे कोई छेद ही नही है तो आँसू टपकेगे कैसे ? और यदि कोई छेंद होता भी तो वर्षा का पानी भी तो बड़ी मात्रा मे अंदर आ गिरता । सामान्य लोगो के भोलेपन का यह एक लाक्षणिक उदाहरण है । कहीं-सुनी बातो की छानबीन किए बिना उन्हे मान लेने की लोगो की आदत होती है ।
- कहते है कि किसी कारीगर ने क्रोध में आकर गुम्बद पर हथौड़ा मारा । उस प्रहार से ऐसा जादुई छिद्र गुम्बद मे हुआ कि उससे वर्ष मे एक बार या प्रत्येक पूर्णिमा या अमावस्या के दिन शाहजहाँ का एक आँसू बराबर मघ्य-रात्री के समय मुमताज की कब्र के ऊपर टपकता था । क्रोध मे किए प्रहार से गुम्बद मे क्या ऐसा नपा-तुला छिद्र होगा कि जो अमावस्या या पूर्णिमा के दिन आकाश मे बादल नही भी हो तो भी एक बूंद अवश्य टपकायेगा । गनीमत यह है कि उस बात को दोहराने वाले व्यक्ति यह नही कहते कि शाहजहाँ का आँसू कब्र मे धरे मुमताज के शरीर के किसी भाग पर गिरता है । हथौड़े से गुम्बद मे छिद्र किए जाने की बात जो करते है वे यह नही जानते कि गुम्बद की दीवार १३ फीट मोटी है । एक या दो बार हथोड़ा मारने से उससे छेंद नही हो सकता । और जब शाहजहाँ द्वारा ताजमहल के लिए पानी जैसा पैसा बहाया गया ऐसी बात कहीं जाती है तो किसी कारीगर के नाराज होने का प्रश्न ही नही था । यदि कोई कारीगर को क्रोध भी आया तो विवाद करने के लिए वह बादशाह तक पहुँच ही नही सकता और यदि विवाद हुआ भी तो बादशाह नीचे बगीचे मे और नाराज कारीगर ऊपर गुम्बद पर हथौड़ा मारने पर तुला हुआ इतनी दूरी पर से होना असंभव है । जहां तक आँसू टपकने की बात है हम पहले ही बता चुके है कि शिवलिंग के ऊपर टपकने वाला जल शाहजहाँ ने जब बंद कराया तब से मुसलमानो ने शाहजहाँ का आँसू टपकने की बात चला दी । मनगढ़न्त शाहजानी कथा मे दूसरी धौस यह दी जाती है कि ताजमहल बहुत लुभावना बना है ऐसा दिखने पर वे कारीगर अन्य किसी के लिए उतना सुंदर ताजमहल न बना पाएँ इस हेतु शाहजहाँ ने उनके हाथ कटवाए । कारीगरो के हाथ कटने की घटना हो सही है किन्तु उसे जो प्रेम का रंग चढ़ाया गया है, वह झुठा है । किसी रईस के लिए कोई कारीगर यदि एक सुंदर वस्तु बनाते है तो उन कारीगरो को पारितोषित देकर सम्मानित किया जाता है । उल्टा हाथ कटवाने का दण्ड देकर उन्हे अपमानित तथा अपंग बनाना घोर पाप है । सही बात तो यह थी कि ताजमहल का हिन्दू परिसर हथियाने के पश्चात सात मे से छ: मंजिलों के सैकड़ो कक्ष, जीने, छज्जे, द्वार, खिड़कियाँ आदि बंद करवाने के लिए शाहजहाँ को हजारो मजदूरो की आवश्यकता थी । शाहजहाँ कंजूस होने के कारण वह ताजमहल को कब्रस्थान मे रूपान्तरित करने के लिए अपने पल्ले से एक कौड़ी भी खर्च नही करना चाहता था । अत: शाहजहाँ की आज्ञा से रोज मुगल सैनिक आगरा नगर मे चक्कर लगाकर जो भी गरीब लोग बेकार खड़े, बैठे या घूमते दिखते, उन्हे पकड़कर ताजमहल परिसर मे ला पटकते और तेजोमहालय मंदिर परिसर को कब्रस्थान मे बदलने के काम पर लगा देते । उन्हे वेतन भी नही दिया जाता । केवल दाल-रोटी देकर काम करवा लेते । उन पर देख-रेख करने वाले मुकादम दाल-रोटी का आधा भाग छीन लेते । इस प्रकार उन मजदूरो को आधा पेट कम करना पड़ा । बाल-बच्चो के लिए वे कुछ कमा नही पाते थे । अत: ताजमहल को बंद करने का कार्य २०-२२ वर्ष शनै:-शनै: चलता रहा । ऐसी अवस्था मे मजदूर लोग या तो भाग जाते थे या बलबा कर उठते । उनके उस विद्रोह को दबाने के हेतु शाहजहाँ ने उनके हाथ कटवाये ।अत: बूंद टपकने की तथा हाथ कटवाने की घटनाएँ तो सही है किन्तु उन्हे शाहजहाँ-मुमताज़ का हो प्रणयरंग चढ़ाया जाता है वह एक ऐतिहासिक वचन है ।
- उतना सुंदर ताजमहल और किसी के लिए न बने ऐसी आशंका शाहजहाँ को आना असंभव था । क्योकि शाहजहाँ-मुमताज़ जैसे असीम प्रेम की बात कितने जोड़ो को लागू हो सकती थी ? शाहजहाँ जैसे उस समय कितने लोग विधुर रहे होंगे ? क्या उनके पास भी पत्नी के शव पर बहाने के लिए करोड़ो रुपयो की पूंजी थी ? क्या वे इतनी पूंजी कब्र बनाने मे व्यर्थ गँवाने की इच्छा या क्षमता रखते थे ? और यदि कोई हरी का लाल ताजमहल से अधिक विशाल तथा सुंदर कब्र बनाने की सोचता भी तो क्या उसे बादशाही आज्ञा से चुप कराया नही जा सकता था ? अत: हाथ कटवाने की बात केवल धोस है ।
- उस कथा मे और एक असंगति यह है कि एक तरफ तो मुमताज़ की मृत्यु से शोकाकुल शाहजहाँ अति कोमलहर्दयी था ऐसा ढोंग किया जाता है जबकि दूसरी ओर वही बादशाह सुंदर मकबरा बनाने वाले कुशल कारीगरों को इनाम देने के बजाय उनके हाथ कटवाने की उल्टी, क्रूर तथा दुष्ट कार्यवाही करता हुआ बताया जाता है ।
- संगमरमरी चबूतरे के तहखाने मे (जहां मुमताज़ की मूल कब्र बताई जाती है) उतरते समय पाँच-सात सीड़ियाँ उतरने के पश्चात एक आला-सा बना हुआ है । उसके दाएँ-बाएँ की दीवारे देखे । वे वेजोड़ संगमरमरी शिलाओ से बंद है । उससे पता चलता है कि तहखाने के जो सैकड़ो अन्य कक्ष बंद है उनमे पहुँचने के जीने यहाँ से निकलते थे । वे शाहजहाँ ने बंद कर दिया ।
- लाल पत्थर के आँगन मे जूते उतारकर जब प्रेक्षक सीड़ियाँ चढ़कर संगमरमरी चबूतरे पर पहुँचते है तो उनके पैरो के आगे एक चौकोर शिला दिखेगी । उस पर पैर थपथपाये तो अंदर से पोली-सी आवाज आएगी । अत: वह शिला यदि निकाली जाए तो खुले चबूतरे के अंदर जो सैकड़ो कक्ष है उनमे उतरने के जीने दिखाई देंगे ऐसा अनुमान है । क्योंकि सात मंजलि कुआं तथा मस्जिद कहीं जाने वाली इमारत के छत के ऊपर भी एक डंडे से थपथापने पर जब अंदर से पोली सी आवाज आई तब वहाँ के पुरातत्वीय कर्मचारी (आर०के०वर्मा) ने वह शिला निकलवाई तो उसमें अंदर मोटी दीवार के गहराई में उतरता हुआ जीना दिखा । उससे ज्यों ही अंदर उतरने लगे तो अंदर नागों का एक जोड़ा फन उठाए दिखा । तब वर्मा जी तुरंत वापस लौट आए ।
- ताजमहल में जो सात मंजली वावली महल है तथा संगमरमरी ताजमहल के दाईं – बाईं ओर जो दो सात मंजली इमारतें हैं उनमें से एक मस्जिद कही जा रही है । उनमें प्राचीन पद्धति के शौचकूप उर्फ पाखाने बने हैं । वे प्रेक्षकों से छिपाये गए हैं ।
- मस्जिद कहलाने वाली इमारत के साथ जो सातमंजिला कुआँ है उसमें जल स्तर वाली मंजिल में खजाना रखा जाता था । इस प्रकार खजाने वाली बाबली बनाना वैदिक क्षत्रिय परंपरा थी । ऐसे खजाने वाले कुएँ कई जगहा होते थे । पेशवाओं का एक ऐसा कुआँ पुणे नगर में है । जल स्तर के साथ वाली मंजिल में तिजोरियाँ होती थीं । यदि शत्रु की शरण में जाना पड़ा तो तिजोरियों को कुएँ मे ढकेल दिया जाता था । ताकि खजाना शत्रु के हाथ ना लगे । उस परिसर को पुन: जीत लेने पर तिजोरियाँ कुएँ के सतह से निकाल ली जाती थी । जीवित मुसलमान भी जब इतना जल प्रयोग नहीं करता तो मृत मुमताज के शव के लिए सात मंज़िले कुएँ की आवश्यकता क्या थी ? किन्तु ताजमहल तेजोमहालय नाम का हिन्दू मंदिर होने से उसमें बार-बार विपुल जल की आवश्यकता पड़ती थी ।
- मृत्यु तथा दफनाने के दिन अज्ञात - यदि शाहजहाँ चकचौध कर देने वाले ताजमहल का वास्तव में निर्माता होता तो इतिहास मे ताजमहल मे मुमताज किस मुहूर्त पर, किस दिन बादशाही ठाठ के साथ दफनाई गई, उस दिन का अवश्य निर्देश होता । किन्तु जयपुर राजा से हड़प किए हुए पुराने महल मे दफनाने जाने के कारण उस दिन का कोई महत्व नही है ।
- इतना ही नही अपितु इतिहास में मुमताज की मृत्यु के दिन तथा वर्ष के बारे मे भी घोटाला-ही-घोटाला है । उसकी मृत्यु का वर्ष अलग-अलग ग्रंथो मे सन् १६२९ या १६३० या १६३१ या १६३२ लिखा है । जिस जनानखाने मे पाँच सहस्र स्त्रियां हो उसमे भला प्रत्येक स्त्री के मृत्यु दिन का हिसाब रहे भी कैसे ? उस जनानखाने मे मुमताज का महत्व केवल १/५००० होने से उसके लिए ताजमहल बनता तो औरों के लिए भी ताजमहलों की कतार बननी चाहिए थी ।
- शाहजहाँ-मुमताज प्रेम का निराधार उल्लेख - क्योकिं शाहजहाँ ने मुमताज के दफनस्थल के ऊपर ताजमहल बनवाया, अत: शाहजहाँ का मुमताज पर असीम प्रेम होना ही चाहिए ऐसा उल्टा निष्कर्ष इतिहासज्ञों ने आज तक निकाला । वस्तुत: मुमताज़ पर शाहजहाँ का अनोखा प्रेम था यह सिद्ध करने वाली एक भी कथा नही है जैसे तुलसीदास की पत्नी-विरह से बेचैन होने की कथा है । लैला-मजनू, रोमियो व ज्यूलियट की प्रेम कहानियाँ बाजार मे मिलती है । उसी प्रकार शाहजहाँ-मुमताज़ की प्रेम कहानियाँ भी मिलनी चाहिए थी । वैसी एक भी पुस्तक कहीं भी मिलती नही है ।
- व्यय क्या हुआ ? ताजमहल पर चालीस लाख रूपये खर्च हुए, ऐसा शाहजहाँ के बादशाहनामें मे उल्लेख है । किन्तु उसका ब्यौरा नही दिया है । दो मंजिलों मे संगमरमरी का फर्श तोड़कर मुमताज़ की दो कब्रे बनवाना, विशाल मचान लगवाना, कुरान जड़वाना और सैकड़ो कक्ष, जीने, छज्जे आदि बंद करवाना ऐसे कार्यो पर ४० लाख रुपया खर्च होना स्वाभाविक ही था । बादशाहनामे के उस न्यून के कारण ही अनेक मुसलमान लेखको ने समय-समय पर ताजमहल पर खर्च की गई रकम के पचास लाख रुपयो से नौं करोड़ सत्रह लाख रुपयो तक के विविध कपोलकल्पित अनुमान लिख रहे है । उनमे कुछ लेखको ने तो चार करोड़ ४५ लाख १८ हजार ७२९ रुपया, ७ आना, ६ पैसे इस प्रकार आने-पाई तक के आंकड़े भोलेभाले लोगो की आंखो मे धूल झोकने हेतु दे रखे है । ताजमहल जैसी विशाल इमारत के खर्चे के आंकड़े कभी नमक-मिर्ची की तरह आने-पाई मे नही दिए जाते । खर्चे का इतना वारिक ब्यौरा देने से पाठक उस हिसाब को वास्तविक तथा विश्वास योग्य समझेगे ऐसा लेखक का अनुमान रहा होगा । किन्तु वह अनुमान गलत सिद्ध हुआ । एक विशाल इमारत पर हुए खर्चे के काल्पनिक आंकड़े आने-पाई मे देने से ही लेखक की धोखेबाजी प्रकट होती है । ताजमहल पर जो खर्च हुआ वह सारा शाहजहाँ के खजाने से ही हुआ होगा ऐसा लोग मानकर चलते है, परंतु इस संबन्ध मे भी कुछ मुसलमान लेखको ने कपोलकल्पित संख्याएँ लिखी है वे भी बड़ी विचित्र-सी है । वे लिखते है कि शाहजहाँ ने ताजमहल पर १, ४४, १, ८७, ४०, ६०१ रुपया खर्च किया तथा अन्य राजाओ ने २८, ५०३ रुपया किया । इससे स्पष्ट निष्कर्ष यह निकलता है कि जयपुर नरेश से जब्त किये ताजमहल को कब्र का रूप देने मे जो भी खर्चा हुआ वह भी कंजूस शाहजहाँ ने सारा स्वयं न करते हुए हिन्दू राजाओ को धमकाकर उनसे वसूल किया । इस प्रकार ताजमहल का निर्माण तो दूर ही रहा, ताजमहल से शाहजहाँ ने जो अपार संपत्ति लूटी थी उसका नगण्य हिस्सा ही शाहजहाँ ने तेजोमहालय मंदिर को कब्र रूप देने मे लगाया ।
- निर्माण की अवधि - ताजमलहल बनबाने मे कितने वर्ष लगे, एस संबंद मे भी विविध लेखको ने भिन्न-भिन्न अनुमान दे रखे हैं । वस्तुत: शाहजहाँ ने ताजमहल का निर्माण किया ही नहीं । फिर भी ताजमहल के निर्माण मे १०, १२, १३, १८ या २२ वर्ष लगे ऐसे अनुमान प्रचलित है । इससे विभिन्न अनुमान इसलिए प्रकट हुए कि तेजोमहालय जब्त करने के पश्चात विविध कक्ष, जीने, छज्जे, द्वार, खिड़कियां बंद करबना, कुरान जड़वाना आदि परिबर्तन कार्य की कोई जल्दी नही थी । वह आरम से कई वर्ष तक धीरे-धीरे चलता रहा । परिवर्तन कितना करना और कब तक करना इसका कोई निश्चित लक्ष्य भी नही था । अत: यह परिवर्तन रुक-रुककर १०, १२, १३, १८ या २२ वर्ष भी चलते रहे । इसी कारण विविध लेखको ने किए वे उल्लेख एक प्रकार से सही भी हो सकते है या कपोलकल्पित । किन्तु वह अवधि ताजमहल के निर्माण की नही अपितु ताजमहल के छह मंजिल बंद करने मे और उसका रंगरूप बिगाड़ने मे तथा उसमे की संपत्ति लूटने मे लगा ।
- वास्तुकारों के मनगढ़न्त नाम - ताजमहल जैसा सुंदर भबन किसने बनाया ? इस संबंध मे भी विविध इतिहासज्ञों ने अनेक वास्तुकारों के मनगढ़न्त नाम दे रखे है । यदि शाहजहाँ वास्तव मे ताजमहल बनवाता तो प्रमुख कारीगरों के नाम दरबारी दस्ताबेज मे लिखे मिलते, परंतु शाहजहाँ के दरबारी कागजो मे या तत्कालीन तबारीखों मे ताजमहल का नाम तक नही है । ताजमहल के निर्माताओ के विभिन्न कल्पित नाम इस प्रकार है—ईसा एफंदी या अहमद मेहंदिस या आस्तिन् द० बोर्दों नाम का फ्रेंच व्यक्ति या जेरोनिमो व्हिरोनिओ नाम का इटालवी व्यक्ति । कुछ अन्य लोग कहते है कि किसी कारीगर की आवश्यकता ही क्या थी जब मुमताज पर असीम प्यार करने वाला शाहजहाँ स्वयं ही इतना कुशल कलाकार था कि मुमताज पर आँसू बहाते-बहाते शाहजहाँ के मन मे ताजमहल की पूरी रूपरेखा प्रकट हो गई और उसी के अनुसार ताजमहल बनवाया गया ।
- नक्शे कहाँ हैं ? - ताजमहल जैसी विशाल तथा सुंदर इमारत बनवानी हो तो उसके सैकड़ो नक्शे बनवाने पड़ते है । वे विविध कारीगरो को बांटे जाते है और उन्ही के अनुसार इमारत बनती है । ताजमहल के बारे मे जो विविध अफवाहें है उनमे कभी तो यह कहा जाता है कि शाहजहाँ ने ताजमहल की रूपरेखा स्वयं बनाई, कोई कहता है कि ईसा एफंदी ने जो नक्शा बनाया, वही शाहजहाँ को पसंद आया और उसी के अनुसार ताजमहल बना । अन्य इतिहासकार कहते है कि ईरान, तुर्कस्थान आदि कई देशो के कारीगरो से नक्शे मंगवाकर उनमे से एक चुना गया । वह सारी कल्पनाएँ निराधार हैं क्योकि ताजमहल का एक भी नक्शा शाहजहाँ के दरबारी दस्तावेजो मे उपलब्ध नही हैं ।
- मजदूरी तथा सामग्री के दस्तावेज कहाँ हैं ? ताजमहल के निर्माण मे २० हजार मजदूर २२ वर्ष तक कम करते रहे और विविध प्रकार की सामग्री (ईट, पत्थर, चूना, हीरे, माणक, पन्ने इत्यादि) ढेरो मे खरीदी गई इत्यादि, ब्यौरा इतिहासकार, पत्रकार तथा अध्यापक आदि दोहराते रहते है । तो प्रश्न यह उठता है कि २२ वर्ष तक २० हजार मजदूरो को मजदूरी दिए जाने के हिसाब, तथा सामग्री खरीदे जाने के हिसाब ये सारे कहाँ है ? इस प्रकार का एक भी कागज शाहजहाँ के दरवारी दस्तावेजो मे इसलिए उपलब्ध नही है क्योकि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया ही नही । शाहजहाँ ने तो बना-बनाया ताजमहल केवल हथिया लिया । अत: इतिहासज्ञ तथा उपन्यासकार, पत्रकार, कवि, नाटककार, लेखक, ग्रंथकार आदि शाहजहाँ द्वारा ताजमहल बनवाए जाने का ब्यौरा देते रहते है वह निराधार है ।
- बगीचे मे पवित्र हिन्दू पुष्प वृक्ष - शाहजहाँ ने कब्जा करने से पूर्व ताजमहल उर्फ तेजोमहालय के बगीचे मे केतकी, जाई, चम्पा, जुई, मौलश्री, हरश्रृंगार और बेल आदि हिन्दू महत्व के वृक्ष थे जिनके फल, फूल तथा पत्ते हिन्दू पूजा विधि मे प्रयोग किये जाते है । इससे भी सिद्ध होता है कि ताजमहल तेजोमहालय मंदिर ही था । यदि ताजमहल कब्रस्थान के निमित बना होता हो उसमे हिन्दू धार्मिक महत्व के पौधे नही होते । क्योकि गले हुए मृत मानवी मृत देहो के खाद से पनपे पौधो के फल, फूल आदि का सेवन पसंद नही किया जाता । और यदि वे पौधे शाहजहाँ की आज्ञा से लगवाए जाते तो वे आज भी होने चाहिए थे । किन्तु वर्तमान समय म ताजमहल के उधान मे उस प्रकार के पौधे दिखाई नही देते क्योकि शाहजहाँ ने वे उखड़वाए ।
- यमुना तट - नदियो के किनारे हिन्दू मंदिर तथा महल बनाने की प्रथा अति प्राचीन हैं । उसी के अनुसार तेजोमहालय यमुना के किनारे बना है । जीवित मुसलमानों को भी इतना पानी लगता । अत: मृत मुमताज की कब्र कभी नदी के समीप बनाई नहीं जाती । नदियो से खाई की तरह इमारत की सुरक्षा भी बनी रहती हैं ।
- इस्लामी प्रथा मे मृतक की कब्र बनाना और कब्र की पूजा आदि करना वर्जित है । मृतक को दफनाकर भूमि को इस प्रकार समतल कर देना कि दफन का कोई चिन्ह ही न रहे । ऐसा मूलत: इस्लाम का आदेश हैं । विविध सुल्तान, बादशाह, बेगम, नाई, धोबी, भिस्ती, चिस्ती आदि की शानदार कब्रे और उन पर मचने वाला हल्ला-गुल्ला इस्लामी नियमो का उल्लंघन है । जिन विशाल भवनो मे शेरशाह, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, मुमताज, दिलरसबानु बेगम आदि दफनाई गई है वे सारे हड़प किए गये विशाल हिन्दू महल हैं । उन महलो मे तहखाने तथा ऊपर के मुख्य मंजिल होने से ऊपर-नीचे एक ही व्यक्ति के नाम दो-दो कब्रे बनी है । जहां एक भी कब्र वर्जित है वहाँ प्रत्येक मृत की दो-दो कब्रे बनाना सर्वथा बाह्म है । शिव मंदिरो मे दो स्तरो पर दो शिवलिंग होते है । उन दोनों को दबाने के लिए भी दो स्तरो पर एक ही मृतक की दो-दो कब्रे बनी है । उज्जैन के महाकालेश्वर तथा सोमनाथ के अहल्याबाई होलकर द्वारा बनाये गए मंदिर मे दो स्तरो पर दो शिवलिंग बने हैं । तेजोमहालय उर्फ ताजमहल मे भी उसी प्रकार दो स्तरो पर दो शिवलिंग थे । उन्हे छुपाने के लिए ताजमहल के दो मंजिलों मे मुमताज के नाम की दो कब्रे बनी है । हो सकता है कि मुमताज का शव बुरहानपुर मे ही हो और ताजमहल वाली कब्रों मे अग्रेश्वर महादेव के दो शिवलिंग ही दबे पड़े हो ।
- ताजमहल के चारो ओर के महराबदार प्रवेशद्वार पूर्णत: समरूप है । इस प्रकार की रूपरेखा को वैदिक स्थापत्य मे चतुर्मुखी कहा जाता है । जैसे ब्रह्माजी के चार मुख होते है ।
भाग - १
भाग - ३
भाग - ४
शेष भाग ३ में
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