Thursday, January 24, 2013

वेदों की दृष्टि में मानसिक स्वास्थ्य, समस्याएं और निवारण




मानसिक स्वास्थ्य
मन एक व अणुस्वरूप है । मन का निवास स्थान ह्रदय व कार्य स्थान मस्तिस्क है । इंद्रियों तथा स्वयं को नियंत्रित करना, ऊह (प्लानिंग) व विचार करना ये मन के कार्य हैं । मन के बाद बुद्धि प्रवृत होती है । रज व तं मन के दोष हैं । सत्व अविकारी व अविकारी व प्रकाशक हैं, अतः यह दोष नहीं है । रज प्रधान दोष हैं । इसकी सहायता से तं प्रवृत होता है ।
नारजस्कं तमः प्रवर्तते ।
राज व तम काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद, शोक, चिंता, उद्देग, भय और हर्ष इन बारह विकारों को उत्तपन्न करते हैं । ये विकार उग्र हो जाने पर मन क्षुब्ध हो जाता है । क्षुब्ध मन मस्तिस्क की क्रियाओं को उत्तेजित कर मानसिक रोग उत्पन्न करता है । मन, बुद्धि, स्मृति, ज्ञान, भक्ति, शील, शारीरिक चेष्टा व आचार (कर्तव्य का पालन) कि विषमता को मानसिक रोग जानना चाहिए ।

विरुद्ध, दोष-प्रकोप, दूषित व अपवित्र आहार तथा गुरु, देवता व ब्राह्मण के अपमान से बारहा प्रकार के मनोविकार बढ़ते हैं और ज्ञान (शास्त्र्यज्ञान), विज्ञान (आत्मज्ञान), धैर्य, स्मर्ति व समाधि से सभी मनोविकार शांत होते हैं । 
मानसो ञानविज्ञानधैर्यस्मर्तिसमाधिभिः
(चरक संहिता, सूत्रस्थानम् : १.५८)
ज्ञान-विज्ञानादि द्वारा मन (सत्व) पर विजय प्राप्त करनेवाली इस चिकित्सा पद्दति को चरकाचार्यजी ने ‘सात्त्वाजय चिकित्सा’ कहा है।
आज का मानव शारीरिक अस्वास्थ्य से भी अधिक मानसिक अस्वास्थ्य से पीड़ित है। मानस रोगों मे दी जानेवाली अँग्रेजी दवाइयां अमन व बुद्धि को अवसादित (डिप्रेस) कर निष्क्रिय कर देतीं हैं । सात्त्वाजय चिकित्सा मन को निर्विकार व बलवान बनाती है, संयम, ध्यान-धारणा, आसान-प्राणायाम, भगवान के नाम का जप, शस्त्र्याध्ययन के द्वारा चित्त का निरोध करके सम्पूर्ण मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करती है ।
मन को स्वस्थ व बलवान बनाने के लिए
आहारशुद्धि : आहारशुधो सत्वशुद्धि: । सत्वशुद्धो ध्रुवास्मृति: ॥  (छंदोग्य उपनिषद् : ७.२६.२)
शब्द-स्पर्शादि विषय इंद्रियों का आहार है । आहार शुद्ध होने पर मन शुद्ध होता है । शुद्ध मन मे निश्चल स्मृति (स्वानुभूति) होती है। 
प्राणायाम : प्राणायाम से मन का माल नष्ट होता है। रज व तम दूर होकर मन स्थिर व शांत होता है। 
शुभ कर्म : मन को सतत शुभ कर्मों मे रात रखने से उसकी विषय-विकारों कि ओर होने वाली भागदौड़ रुक जाती है।
मौन : संवेदन, स्मृति, भावना, मनीषा, संकल्प व धारणा – ये मन की छ: शक्तियां हैं । मौन व प्राणायाम से इन सुषुप्त शक्तियों का विकाश होता है। 
उपवास (अति भुखमरी नहीं) : उपवास से मन विषय-वासनाओं से उपराम होकर अंतर्मुख होने लगता है । 
मन्त्र्जप : भगवान के नाम का जाप सभी विकारों को मिटाकर दया, क्षमा, निष्कामता आदि दैवी गुणों को प्रकट करता है।
प्रार्थना : प्रार्थना से मानसिक तनाव दूर होकर मन हल्का व प्रफुल्लित होता है । मन मे विश्वास व निर्भयता आती है। 
सत्य भाषण : सदैव सत्य बोलने से मन मे असीम शक्ति आती है।
सदविचार :  कुविचार मन को अवनत व सदविचार उन्नत बनाते हैं। 
प्रणवोच्चारन : दुष्कर्मों का त्याग कर किया गया ॐकार का दीर्घ उच्चारण मन को आत्म-परमात्म शांति में एकाकार कर देता है ।
इन शास्त्रनिर्दिस्ट उपायों से मन निर्मलता, समता व प्रसन्नतरूपी प्रसाद प्राप्त करता है ।
पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र व गोबर), सुवर्ण तथा ब्राह्मी, यष्टिमधु, शंखपुष्पी, जटामांसी, वचा, ज्योतिष्मती आदि औषधियाँ मानस रोगों के निवारण मे सहायक हैं । 

सत्वसार पुरुष के लक्षण
सत्वसार पुरुष स्मरणशक्तियुक्त, बुद्धिमान, भक्तिसंपन्न, कृतज्ञ, पवित्र, उत्साही, पराक्रमी, चतुर व धीर होते है । उनके मन मे विषाद कभी नहीं होता । उनकी गतियाँ स्थिर व गंभीर होती है । वे निरंतर कल्याण करने वाले विषयो मे मन और बुद्धि को लगाये रहते है।
                                  आयुर्वेद का अवतरण
शरीर, इंद्रियो, मन, और आत्मा के संयोग को आयु कहते है ओर उस आयु का ज्ञान देने वाला वेद है – आयुर्वेद ।   
तस्यायुषः पुण्यतमो वेदो वेदविंदा मतः ।
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ 
(चरक संहिता, सूत्रस्थानम् : १॰४३)
आयुर्वेद आयु का पुण्यतम वेद होने के कारण विद्धानो द्वारा पूजित है। यह मनुष्य के लिए इस लोक व परलोक मे हितकारी है । अपना हित चाहनेवाले बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह आयुर्वेद के उपदेशों का अतिशय आदर के साथ पालन करे ।
आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है और यह अपौरुषेय है, अर्थात् इसका कोई कर्ता नही है।

ब्रह्मा स्मृत्वाssयुषो वेदम्
(अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थानम् : अध्याय १)
ब्रह्माजी के स्मरणमात्र से आयुर्वेद का आविभार्व हुआ । उन्होने सर्वप्रथम एक लाख श्लोकोंवाली ‘ब्रह्म संहिता’ बनायी व दक्ष प्रजापति को इसका उपदेश दिया । दक्ष प्रजापति ने सूर्यपुत्र अश्विनीकुमारों को आयुर्वेद सिखाया । अश्विनीकुमारों ने इन्द्र को तथा इन्द्र ने आत्रेय आदि मुनियों को आयुर्वेद का ज्ञान कराया । उन सब मुनियों ने अग्निवेश, पाराशर, जतुकर्ण आदि ऋषियों को ज्ञान कराया, जिन्होंने अपने-अपने नामों कि प्रथक-प्रथक संहिताएँ बनायी । उन संहिताओं का प्रति-संस्कार करके शेष भगवान के अंश चरकाचार्या  जी ने ‘चरक संहिता’बनायी, जो आयुर्वेद कि प्रमुख व सर्वश्रेष्ठ संहिता मानी जाती है ।
आयुर्वेद के आठ अंग हैं -
1- कायचिकित्सा – सम्पूर्ण शरीर कि चिकित्सा । 
2- कौमारभ्रत्य  तंत्र – बालरोग चिकित्सा । 
3- भूतविध्या – मंत्र , होम , हवनादि द्वारा चिकित्सा ।
4- शल्य तंत्र – शस्त्रकर्म चिकित्सा । 
5- शालाक्या तंत्र – नेत्र, कर्ण, नाक आदि की चिकित्सा ।
6- अगद तंत्र – विष की चिकित्सा । 
7-  रसायन तंत्र – वृद्धावस्था को दूर करनेवाली चिकित्सा ।
8- वाजीकरण तंत्र – शुक्रधातुवर्धक चिकित्सा । 
इन आठ अंगों मे व्याधि – उत्पत्ति के कारण, व्याधि के लक्षण व व्याधि – निव्रत्ति के उपायों का सूक्ष्म विवेचन समग्ररूप से किया गया है । 

(मित्रों यह सदैव याद रखे की स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क निवास करता  है ! इसलिए जब तक आप मानसिक व शारीरिक रूप से  मजबूत नहीं है तब तक आप अपने व अपने देश, धर्म के कार्य में अपना योगदान नहीं दे सकते !)

Sunday, October 28, 2012

शून्यखर्च चुनाव प्रणाली (एक क्रन्तिकारी विचार)


इसे गंभीरता से पढ़कर अपने विचार प्रेरित करे ताकि राष्ट्र निर्माण में आप अपनी प्रत्यक्ष भूमिका निभा सकें।
यह विचार अंतिम नहीं है । यह तो प्रारम्भ हैं । इसमे कुछ भी सुधार संभव हैं । हम महानतम् भारत के निर्माता हैं । अत: हमे मिल बैठकर मार्ग खोजना ही होगा । 

देश की सभी समस्याओ का मूल हैं :  ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लूट के धन पर खड़ा संसदीय लोकतन्त्र
                              जिसकी नाभि का अमृत हैं, “छद्मम छद् म चुनाव प्रणाली” 

शून्य खर्च वाली चुनाव प्रणाली ही भारत देश की समस्त समस्यों का समाधान हैं। हर बस्ती / २०० परिवार / ग्राम सभा होगी विधान सभा। जिसमे हर परिवार से होगा एक जनप्रतिनिधि।

वस्तुत: यह आंदोलन देश की सिकंदर के आक्रमण अर्थात २४०० वर्ष की सतत दुरावस्था से पीड़ित भारतीय समाज एवं योरुपीय लूट, कपट एवं विस्तारवाद की नीति से उपजा एक आध्यात्मिक आन्दोलन हैं । जो राज्य-समाज व्यवस्था, प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रो मे आयी गंदगी की सफाई के लिए कृत संकल्पित हैं । 

इस लोकतंत्र में चुनावो में वोट डलवा कर जनता में भ्रम पैदा किया गया है की सरकार तो तुम ही चुनते हो, इसलिए दोषी भी तुम्ही हो । पहले तो ५४३ प्रत्याशी जो ५०-१०० करोड़ खर्च कर सके, वे धनकुबेर ही इस चुनाव में हमारे सामने होते हैं, फिर शराब, गुंडा गर्दी, जातिवादी दंगो का खेल शुरू होता हैं । इसके बाद भी जो प्रतिनिधि चुना जाता हैं, उसे भोगविलास की कानूनी छूट जनता के टैक्स के पैसे पर प्राप्त हैं । मंहगाई एवं भ्रष्टाचार की जड़ यही छिपी हैं । उसके बावजूद सांसद आदि किसी भी जनप्रतिनिधि को कोई अधिकार नहीं दिया गया हैं । सारे अधिकार प्रधानमंत्री में निहित हैं, जिसे जनप्रतिनिधि होना भी जरूरी नहीं हैं । जो मनोनीत ढंग से बन सकता हैं । देश को चलाने वाले सभी मुख्य पद मनोनीत हैं । उदाहरणार्थ: सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश, गवर्नर रिजर्व बैंक, उपाध्यक्ष योजना आयोग और चुनाव आयुक्त आदि । सारी जनता परिवर्तन के लिए कराह रही हैं । हजारो तरफ से ईमानदार प्रयास भी देश में हो रहे हैं । किन्तु क्या हजारो करोड़ के खर्च पर इस चुनाव प्रक्रिया को बदले बिना कोई भी परिवर्तन अपेक्षित परिणाम दे सकेगा ? 

सकारात्मक लोकतन्त्र में जनप्रतिनिधि का चयन (नगरग्राम स्वराज योजना)

“स्वावलम्वी नगरग्राम, परंपरागत आत्मनिर्भर व्यवसाय, कोई नौकर नहीं, पूंजी नहीं श्रम प्रधान-अधिकार नहीं कर्तव्य आधारित व्यवस्था, साथ ही सृजनात्मकता एवं आत्मविकाश के लिए अतिरिक्त समय मिले यही है नए भारत की आधारशिला ।”

यहाँ केंद्र में (वॉटर) व्यक्ति को नहीं, परिवार को रखा गया हैं । प्रशासन की प्रथम इकाई नगर और ग्राम के भेद को दूर करने वाली “नगरग्राम” कही जाएगी, जो पूर्णतया स्वावलंबी होगी, जिसमे १०० बस्तियाँ / ग्राम सभाएं होंगी। जिसमे अनुमानित २०० परिवार होंगे । गाँव / बस्ती / २०० परिवारों के २०० मुखिया अपने क्षेत्र के विकास के लिए एक साथ बैठेंगे, जिसे ग्राम विधान सभा (ग्रा॰वि॰स) कहा जाएगा । इसका नेतृत्व ५ सदस्यीय मंत्री परिषद करेगी ।     
  • मंत्री परिषद का चयन : ग्रा.वि.स. के सभी २०० सदस्य-वरीयता क्रम में ५ नाम लिखकर बाक्स में डालेंगे । जिनका मूल्यांकन होगा।
  •  I -100, II - 80, III - 60, IV – 40, V – 20.
  •  तुरंत ही सबके समक्ष बाक्स खुलेगा, सभी मत पत्रो पर दिये गए वरीयता नामो के आगे अंक लिखते जाएंगे । पूरे २०० मत पत्र खुलने के बाद सभी को प्राप्त अंको का योग हो जाएगा । सर्वाधिक अंक प्राप्त ५ व्यक्ति मंत्री होंगे । इस प्रकार ५ सदस्यीय मंत्री परिषद का चयन हो जायेगा ।
नगरग्राम स्वराज्य        
  • नीचे की प्रत्येक इकाई के मंत्री ऊपर की इकाई के लिए साधारण सदस्य होंगे ।
  • नगरग्राम १०० बस्तियो की १ लाख आबादी वाली इकाई होगी। 
नगरग्राम / विधान सभा की सदस्य संख्या = १०० बस्तियो के पाँच मन्त्री अर्थात १००x५ = ५००
यह ५०० सदस्य पूर्ववत्त वरीयता मत प्रणाली से पुनः ५ सदस्यीय मंत्री परिषद का चयन करेंगे । सर्वाधिक अंक प्राप्त प्रथम व्यक्ति नगरग्रामपाल, शेष उनके चार मंत्री होंगे ।
  • कृषि, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य, प्राथमिक रोजगार, रोटी की गारंटी एवं अपने विकास के लिए आर्थिक अधिकाओ से युक्त यह स्वायत्तईकाई होगी, जो औसतन १ लाख आबादी या २० हजार परिवारो वाली होगी । इसी प्रकार जनपद (१० नगरग्राम), प्रांत (१०० नगरग्राम) एवं देश के बारे में भी कार्यवाही होगी। सभी ईकाइयो की परिधि में आये दायित्वों के लिए वही स्वायत्त ईकाई होगी । नगरग्राम का औसत क्षेत्रफल १० कि.मी त्रिज्या वाला होगा। जिससे किसी भी प्रशासनिक अधिकारी या राजनेता को सरकारी वाहन अथवा आवास देने की आवश्यकता नहीं रहेगी । इस प्रकार बजट का खर्च ८०% तक कम किया जा सकेगा।
  • इसी प्रकार १०० नगरग्राम अर्थात एक करोड़ आबादी वाले १२० प्रांत होंगे । प्रांतीय मंत्री परिषदों के १२०x५ = ६०० सदस्य राष्ट्रीय प्रतिनिधि सभा (संसद) होगी अर्थात राज्य सभा/विधान परिषद/मनोनीत जैसे पिछले द्वारो से गलत व्यक्ति का प्रवेश बंद हो जाएगा।
इस व्यवस्था में सबको समान शिक्षा की गारंटी है जो चार चरणों में विभक्त होगी । क्रमशः चौथे चरण तक पहुंचे उच्चीकृत विधार्थी वर्ग शिक्षक, वैज्ञानिक एवं विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ आदि होंगे इनमे अपरिंगही शिक्षाविदों का वर्ग मा.उ.प. कहा जाएगा जो राज्य व्यवस्था के लिए मार्गदर्शक संस्था होगी । 

विचार - भारत उत्थान परिषद, झाँसी