Tuesday, May 8, 2012

भारत में दरबदर होता कश्मीरी पण्डित


 डॉ0 शशि तिवारी
 भारत ’’सर्वे भवन्तु सुखनः एवं वसुधैव कुटुंबकम’’ की भावना को लेकर चलता है। लेकिन देश में शैतानी शक्तियों का बढ़ता दायरा केंसर की तरह सम्प्रदायवाद, जातिवाद एवं आतंकवाद के रूप में द्रुत गति से बढ़ रहा है। अब वक्त आ गया है देश के विखण्डन के पहले इसके खात्मे के लिये एक समयबद्ध एक कठोर रणनीति बने।

 राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघसंचालक डाॅ. मोहन भागवत हिदुत्व को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि यह कोई पूजा पद्धति का नाम नहीं है, हिन्दुस्तान का हर एक व्यक्ति हिन्दु है। भारत का दर्शन एवं विचारों को कई मुल्क तारीफ करते नहीं थकते, वहीं भारत अपनी संस्कृति को छोड़ पश्चिमी संस्कृति की और आंखमूंद बढ़ रहा है। या यूं कहे अपने को मिटा रहा है दूसरे को अपना रहा है। यदि यही हाल रहा तो हो सकता है कि भविष्य में भारत के पास संस्कृति के नाम पर कुछ भी न बचे। वक्त आ गया है कि हिन्दू एवं हिन्दूत्व पर अधिकाधिक चर्चा एवं संगोष्ठियां आयोजित हो। सभी भारतवासियों को यह स्वीकारना होगा कि हिन्दु सभी को समाहित करने की विचाराधारा है अलगाव, द्वेष या विरोध की नहीं।

 हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है किसी से छिपी नहीं है। इन्हें दोयम दर्जे की हैसियत से ज्यादा कुछ भी हासिल नही है, लेकिन भारत में देखे तो अल्पसंख्यक के नाम पर ही सारा गुणा भाग कर राजनीति चलती है। यदि यूं कहे कि भारतीय राजनीति अल्पसंख्यक आधारित ही है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वहीं स्वतंत्र भारत में भारत का अभिन्न अंग कश्मीर को लेकर यहां कुछ यक्ष प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मसलन किसी भी मुस्लिम संगठन ने कश्मीरी पंडित का समर्थन खुलकर क्यों नहीं किया? देश में ये कैसा सेक्युलेरिज्म है? हिन्दू भारत में सुरक्षित क्यों नहीं? जिम्मेदार मौन क्यों? स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं कश्मीरी पंडित थे वही वंश की राजनीति का ताना झेलने वाली कांग्रेस और उसके बयानवीर शांत, चुप एवं घुघ्घु क्यों बने हुए हैं? शर्म क्यों नहीं आती? हमारी तथाकथित राजनीतिज्ञ अल्पसंख्यको के लिए एक पैर पर खड़े रहने वाले कश्मीर में अल्पसंख्य हिन्दू मसले पर मौन क्यों? इन्हें सांप क्यों सूंघ गया है? पाकिस्तान में हिन्दुओं पर जुल्म ढहाए जाने की बात तो समझा में आती है लेकिन भारत में भी ऐसा हो समझ से परे है?

 भारत के अभिन्न अंग कश्मीर में हिन्दुओं पर कहर टूटने का सिलसिल 1989 में जम्मू-कश्मीर में जेहाद के लिये गठित जमात-ये-इस्लामी से शुरू हुआ। जिसने कश्मीर में इस्लामिक डेªस कोड को सख्ती से लागू करने पर जोर दिया। इसी के साथ शुरू हुआ कश्मीरी पंडितों की दुकान, धंधों, घरों को चुन-चुनकर निशाना बनाने का कुचक्र, जिसमें 24 घण्टे में कश्मीर छोड़ने या मरने की धमकी साथ ही नारा दिया ‘‘ हम सब एक, तुम भागो या मरों।’’ जनवरी 1990 में जम्मू-कश्मीर में जगमोहन की राज्यपाल की नियुक्ति के साथ ला एण्ड आॅर्डर बनाए रखने के लिये कफ्र्यू लगाया गया। हिजबुल ने मस्जिदों को आवाम को संदेश देने का अड्डा बनाया। कफ्र्यु के साथ ही पंडितों को नित नए तरह से प्रताडि़त एवं जुल्म ढहाने का अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया। इसी के साथ तीन टेप भी जारी किये गये। ‘‘कश्मीर में अगर रहना है तो अल्लाह-ओ-अकबर कहना होगा। दूसरा यहां क्या चलेगा ‘‘निजाम-ए-मुस्तफा’’ तीसरा असी गच्ची पाकिस्तान बताओ रोएस्ते बतनानेव शान जिसका अर्थ है कि हम पाकिस्तान और हिन्दू महिलाओं को उनके आदमी के बिना चाहते हैं। 300 हिन्दुओं, मर्द और ओरतों का कत्ल किया गया। 14 सितम्बर 1989 को भाजपा के राष्ट्रीय एक्जीक्यूटिव पं. टीकालाल टपलू जो पेशे से नामी वकील भी थे का भी मर्डर कर दिया गया। तत्पश्चात् जस्टिस एन.के.गंजू जो श्रीनगर हाईकोर्ट में थे केा भी मौत के घाट उतार दिया गया।

 अब हजारों हिन्दुओं ने कश्मीर से पलायन शुरू कर दिया यह मंजर बहुत कुछ भारत-पाक के विभाजन जैसा ही है। एक आंकड़े के अनुसार लगभग 300000 कश्मीरी पण्डित अपने ही देश में देखते-ही देखते अपने घर से दर-बदर हो गए, जिनमें कुछ रिफ्यूजी कैम्प में तो कुछ दिल्ली में आ गए।

 19 जनवरी 2005 में एक खबर के अनुसार कोई भी हिन्दू घाटी में नहीं बचा, यदि यह सत्य है तो कितना भयावह है, कितना दुर्भाग्यपूर्ण है? वहीं रिफ्यूजी कैम्प में रह रहे पण्डित आर्थिक, मानसिक एवं स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों से भी जूझ रहे हैं। ऐसा उदाहरण शायद ही विश्व में कहीं मिले कि भारत में हिन्दुओं की अधिकता होेते हुए भी इसी के अभिन्न अंग कश्मीर में मुस्लिम कट्टर पंथियों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहा है, अपने पुरखों की भूमि को छोड़ भागना पड़ रहा है। भारत के लिये इससे बढ़कर कलंक और क्या हो सकता है? कुछ इसी तरह की स्थिति भारत के उत्तर पूर्वी भाग में भी है।

 सन् 2011 में कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू कहते हैं, कश्मीर में राज्य एवं केन्द्र दोनों ने ही पंडितों को दोयम दर्जे का नागरिक मानती हैं। यूं. तो कश्मीरी पंडितों का योगदान भारत के लिये अधिक है फिर चाहे वो पंडित जवाहर लाल नेहरू हो पुरूषोत्तम नारायण हो, भास्कर हो, भागवान गोपीनाथ हो विजय लक्ष्मी पंडित हो या इंदिरा गांधी। ऐसे में डाॅ. फारूख अब्दुल्ला हो, ओमर अब्दुल्ला हो या गिलानी हो सभी केवल सियासी धार तेज बनाए रखने के लिये कभी कभी हिन्दू समर्थित बयान राजनीतिक माइलेज के लिये देते भर है, करते कुछ भी नहीं।

Friday, April 27, 2012

दरगाह अजमेर शरीफ और हिन्दुओं की अज्ञानता

 डॉ विवेक आर्य
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी की भारत यात्रा का नया शगूफा अजमेर की यात्रा और ख्वाजा गरीब नवाज़ की दरगाह पर जाकर मन्नत मांगना. इस यात्रा के दो मुख्य पहलु हैं एक राजनैतिक जो इस लेख का विषय नहीं हैं दूसरा धार्मिक जिसमें विशेष रूप से अजमेर की यात्रा हैं. यह ख्वाजा मुइनुद्दीन चिस्ती जिन्हें गरीब नवाज़ भी कहा जाता हैं कौन थे? यह इतने प्रसिद्ध कैसे हो गए? क्या उनकी दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने से हिंदुयों का भला होता हैं? क्या उनकी दरगाह पर मन्नत मांगने वालो की सभी मन्नते पूरी होती हैं?
कहाँ से आये थे? इन्होने हिंदुस्तान में क्या किया और इनकी कब्र पर चादर चदाने से हमे सफलता कैसे प्राप्त होती हैं? गरीब नवाज़ का जन्म ११४१ में अफगानिस्तान में हुआ था .गरीब नवाज़ भारत में लूटपाट करने वाले , हिन्दू मंदिरों का विध्वंश करने वाले ,भारत के अंतिम हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान को हराने वाले व जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करने वाले मुहम्मद गौरी के साथ भारत में शांति का पैगाम? लेकर आये थे.पहले वे दिल्ली के पास आकर रुके फिर अजमेर जाते हुए उन्होंने करीब ७०० हिन्दुओ को इस्लाम में दीक्षित किया(Ref- page 117 vol. 1 a history of Sufism in India –Saiyid Athar Abbas Rizvi). अजमेर में वे जिस स्थान पर रुके उस स्थान पर तत्कालीन हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान का राज्य था. ख्वाजा के बारे में चमत्कारों की अनेको कहानियां प्रसिद्ध हैं की जब राजा पृथ्वी राज के सैनिको ने ख्वाजा के वहां पर रुकने का विरोध किया क्योंकि वह स्थान राज्य सेना के ऊँटो को रखने का था तो पहले तो ख्वाजा ने मना कर दिया फिर क्रोधित होकर शाप दे दिया की जाओ तुम्हारा कोई भी ऊंट वापिस उठ नहीं सकेगा. जब राजा के कर्मचारियों नें देखा की वास्तव में ऊंट उठ नहीं पा रहे हैं तो वे ख्वाजा से माफ़ी मांगने आये और फिर कहीं जाकर ख्वाजा ने ऊँटो को दुरुस्त कर दिया. दूसरी कहानी अजमेर स्थित आनासागर झील की हैं. ख्वाजा अपने खादिमो के साथ वहां पहुंचे और उन्होंने एक गाय को मारकर उसका कबाब बनाकर खाया.कुछ खादिम पनसिला झील पर चले गए कुछ आनासागर झील पर ही रह गए .उस समय दोनों झीलों के किनारे करीब १००० हिन्दू मंदिर थे, हिन्दू ब्राह्मणों ने मुसलमानों के वहां पर आने का विरोध किया और ख्वाजा से शिकायत करी.ख्वाजा ने तब एक खादिम को सुराही भरकर पानी लाने को बोला.जैसे ही सुराही को पानी में डाला तभी दोनों झीलों का सारा पानी सुख गया. ख्वाजा फिर झील के पास गए और वहां स्थित मूर्ति को सजीव कर उससे कलमा पढवाया और उसका नाम सादी रख दिया.ख्वाजा के इस चमत्कार की सारे नगर में चर्चा फैल गयी. पृथ्वीराज चौहान ने अपने प्रधान मंत्री जयपाल को ख्वाजा को काबू करने के लिए भेजा. मंत्री जयपाल ने अपनी सारी कोशिश कर डाली पर असफल रहा और ख्वाजा नें उसकी सारी शक्तिओ को खत्म कर दिया. राजा पृथ्वीराज चौहान सहित सभी लोग ख्वाजा से क्षमा मांगने आये. काफी लोगो नें इस्लाम कबूल किया पर पृथ्वीराज चौहान ने इस्लाम कबूलने इंकार कर दिया. तब ख्वाजा नें भविष्यवाणी करी की पृथ्वी राज को जल्द ही बंदी बना कर इस्लामिक सेना के हवाले कर दिया जायेगा..(Ref- ali asghar chisti- jawahir-I faridi , Lahore 1884, pp.155-160 ) .बुद्धिमान पाठकगन स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं की इस प्रकार के करिश्मो को सुनकर कोई मुर्ख ही इन बातों पर विश्वास ला सकता हैं
निजामुद्दीन औलिया जिसकी दरगाह दिल्ली में स्थित हैं ने भी ख्वाजा का स्मरण करते हुए कुछ ऐसा ही लिखा हैं. उनका लिखना हैं की न चाहते हुए भी ख्वाजा की चमत्कारी शक्तियों के कारण पृथ्वीराज चौहान को ख्वाजा का अजमेर में रहना स्वीकार करना पड़ा. ख्वाजा का एक खादिम जो की मुस्लिम था से पृथ्वीराज किसी कारण से असंतुष्ट हो गया. तब ख्वाजा ने पृथ्वीराज को उस पर कृपा दृष्टि बनाये रखने के लिए कहा जिसे पृथ्वीराज ने मना कर दिया. इस पर ख्वाजा ने भविष्यवाणी कही की कुछ ही समय में पृथ्वीराज को पकड़ कर इस्लाम कि सेना के हवाले कर दिया जायेगा और कुछ समय बाद मुआम्मद गोरी ने आक्रमण कर पृथ्वीराज के राज्य का अंत कर दिया.(Ref- amir khwurd, siyaru’l – auliya, delhi,1885,pp.45-47)
भारत से सदा सदा के लिए हिन्दू वैदिक धर्म का राज्य मिताने वाले ख्वाजा गरीब नवाज़ कि दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने वालों से , पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों पर हर वीरवार को जाकर मन्नत करने वालों से मेरे कुछ प्रश्न हैं-
१.क्या एक कब्र जिसमे मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चूँकि हैं वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं?
२. सभी कब्र उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजो का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म रक्षा करते की बलि वेदी पर समर्पित कर दियें थे?
३. क्या हिन्दुओ के राम, कृष्ण अथवा ३३ करोड़ देवी देवता शक्तिहीन हो चुकें हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक हैं?
४. जब गीता में श्री कृष्ण जी महाराज ने कहाँ हैं की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?
५. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरो की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालो की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं?
६. क्या संसार में इससे बड़ी मुर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता हैं?
७. हिन्दू जाति कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहीं हैं जो वेदों- उपनिषदों में कहीं नहीं गयीं हैं?
८. कब्र पूजा को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल और सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओ को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ?
आशा हैं इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा . अगर आप आर्य राजा राम और कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दे और अन्य हिन्दुओ को भी इस बारे में बता कर उनका अंध विश्वास दूर करे.
Source : http://agniveerfans.wordpress.com/2012/04/08/ajmer-2/

Monday, March 26, 2012

राष्ट्रधर्म

|| इदं राष्ट्राय इदन्न मम ||

योगाभ्यास के साथ-साथ प्रतिदिन 5 से 10 मिनट राष्ट्र-शक्ति व हमारे राष्ट्रधर्म के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें लोगों को बताना तथा लोगों को समझाना कि हम देश के लिए क्या कर सकते हैं। इन बिन्दुओं को पहले संक्षिप् त रूप में तथा बाद में विस्तारपूर्वक प्रत्येक ग्रामवासी व राष्ट्रवासी को समझायें।
  1. राष्ट्र की शक्ति : - हमारे देश भारत में 89 प्रकार की भूसम्पदाएं हैं-लोहा, कोयला, ताम्बा, सोना, चांदी, हीरा, एल्यूमिनियम आदि धतुएँ तथा गैस व पेट्रोल से लेकर बहुत से मिनरल्स हैं इन सबके ज्ञात भण्डार (रिजर्वस) का यदि आर्थिक मूल्यांकन किया जाए तो यह करीब 10 हजार लाख करोड़ रुपये होते है। इसमें अकेला कोयला ही (केवल ज्ञात भण्डार) 276.81 बिलियन टन है जिसका मूल्य लगभग 950 लाख करोड़ है तथा लोहे के ज्ञात भण्डार लगभग 15.15 बिलियन टन है। ऐसी ही अन्य बहुत सी बेशकीमती चीजें भारत माता के गर्भ में छिपी हैं। यदि हमने इन बेईमान लोगों को नही हटाया तो ये सब देश की सभी सम्पदाओं को लूट लेंगे। भूसम्पदाओं के अतिरिक्त जल, जंगल, जमीन, जड़ी-बूटी व अन्य राष्ट्रीय सम्पदाओं के साथ-साथ बौद्धिक, आर्थिक, चारित्रकि व आध्यात्मिक दृष्टि से भी भारत दुनियाँ का सबसे बलवान व धनवान देश है।
  2. महाशक्ति भारत - हमारे देश में जर्मनी, जापान और प्रफांस जैसे देशों से कम से कम 50 गुणा अधिक शक्तिशाली है। जिस दिन भ्रष्टाचार मिट जायेगा उस दिन भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बन जायेगा। दुनियाँ की पाँच बड़ी संस्थाएं आई.एम.एफ., वर्ल्ड बैंक, डब्लू.एच.ओ., यू.एन.ओ., डब्लू. टी.ओ., सब यहींं से हम संचालित कर सकेंगे। हम वल्र्ड सुपर पॉवर होंगे, हम दुनियाँ की सबसे बड़ी आर्थिक, राजनैतिक व आध्यात्मिक महाशक्ति होंगे और यह सब हमारे लिए बड़े गर्व की बात होगी।
  3. क्या देश स्वतन्त्र है - 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया, यह देश के इतिहास में पढ़ाया जाता है तथा नेताओं द्वारा बताया जाता है कि हम आज स्वतन्त्र हैं लेकिन हकीकत कुछ और ही है। दुर्भाग्य से 14 अगस्त 1947 को तत्कालीन प्रधनमंत्री तथा अंग्रेज सरकार के प्रतिनिधि माउंटबेटन ने एक बहुत बड़ा शर्मसार समझौता कर लिया और उसका नाम है ट्रांसफर ऑफ पॉवर एग्रीमेंट (सत्ता के हस्तांतरण का समझौता)। इस एग्रीमेंट के तहत आज भी स्वतन्त्र भारत में विदेशी तंत्र चलता है। न तो हम भाषा की दृष्टि से आजाद हो पाये हैं और न ही व्यवस्थाओं की दृष्टि से, जैसे अंग्रेज सरकार भारत को चलाती थी, ठीक वैसे ही भारत सरकार भारत को चलाती है। टी.बी. मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा-व्यवस्था, जिसमें संस्कार व आध्यात्मिक मूल्यों को पूरी तरह निकाल दिया गया है; अंग्रेजी चिकित्सा-व्यवस्था जिसमें भारतीय चिकित्सा-व्यवस्था-योग, आयुर्वेद व प्राकृतिक-चिकित्सा आदि को हाशिये पर रख दिया है; अंग्रेजी कानून-व्यवस्था, जिसमें 34735 कानून जो अंग्रेजों ने भारत को लूटने के लिए बनाए थे, वह आज भी लागू हैं। अंग्रेजी अर्थव्यवस्था, जिसमें पूँजी का विकेन्द्रीकरण न होकर गाँव, गरीब व भारत का शोषण हो रहा है। इसी तरह आज आजादी के नाम पर हम अंग्रेजी गुलामी में जी रहे हैं। महात्मा गाँधी व सभी क्रान्तिकारियों का निविदमववादित रूप से स्पष्ट मानना था कि भारत आजाद होते ही सभी अंग्रेजी व्यवस्थाओं का हमें स्वदेशीकरण करना होगा, जो दुर्भाग्य से नहीं हुआ। अब इस आधी अधूरी आजादी के स्थान पर हमें पूरी आजादी लानी है। आज हम अन्याय के खिलाफ बोल सकते हैं तथा सरकार बदल सकते हैं। इसका हमें पूरा लाभ उठाना है। आज जब किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र में विदेशी तंत्र व विदेशी भाषा नहीं चलती, तब स्वतन्त्र होते हुए भी विदेशी तन्त्र व विदेशी भाषा को ढोना यह हमारे लिए कितने शर्म व अपमान की बात है।
  4. राष्ट्रीय सुरक्षा एवं विदेशी नीति - जिस तरह से चीन ने पूर्वोत्तर से लेकर जम्मू-कश्मीर तक सड़कों व रेल आदि का जाल बिछा दिया है तथा अपनी लगभग 31 लाख सेना का अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र प्रोद्यौगिकी के साथ तीव्र गति से आधुनिकीकरण कर रहा है और साथ ही चीन सरकार के नियन्त्रण में चलने वाले प्रचार-प्रसारों के माध्यम से भारत को 20-30 भागों में विखंडित करने की जो बात कही जा रही है, यह बहुत ही चिन्ताजनक है। अत: हमें अपनी सेनाओं के तीव्र गति से आधुनिकीकरण एवं अन्य ढांचागत सुविधओं के लिए तुरन्त प्रभावी कदम उठाने चाहिए तथा अपनी विदेश-नीति में भी हमको व्यापकता, दूरदर्शिता एवं रहस्यमय कूटनीति को अपनाना पड़ेगा। हमें वैश्विक स्तर पर भारत को मजबूत स्थिति में लाना पड़ेगा। चीन के साथ-साथ पाकिस्तान के नापाक इरादों व बंग्लादेशी घुसपैठ को भी प्रभावी तरीके से रोकने की आवश्यकता है। भारत-हित को सर्वोपरि रखकर हमें अन्य देशों के साथ अपनी व्यापार-नीति व विदेश-नीति बनानी होगी। हमें उदारीकरण, वैश्वीकरण व डब्लू.टी.ओ. की नीतियों, सन्धियों व कानूनों का देश को आर्थिक दृष्टि से कमजोर करने में उपयोग नहीं होने देना, अपितु अपने उत्पादन एवं निर्यात को बढ़ाकर राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने में उपयोग करना है। राष्ट्रीय सुरक्षा (बाह्य सुरक्षा) के साथ-साथ हमारी आन्तरिक सुरक्षा-व्यवस्था में भी नक्सलवाद, माओवाद व अन्य घरेलू हिंसा भी बहुत बड़ी चुनौतियाँ हैं। इनके भी निर्णायक समाधन के लिए हमें स्पष्ट रणनीति बनानी होगी।
  5. विदेशी हस्तक्षेप - हमारे देश में, हमारे देश के नीति-निर्धरण से लेकर प्रधनमंत्री, वित्तमंत्री, विदेशमंत्री व रक्षामंत्री आदि महत्वपूर्ण पदों पर कौन व्यक्ति होने चाहिए, इसमें विदेशी सरकारों, उनकी अगेंसियों व विदेशी कम्पनियों का बहुत बड़ा हस्तक्षेप रहता है। इसके लिए मीडिया मेनेजमेन्ट और सम्बन्धित व्यक्तियों के महिमा मण्डन से लेकर सम्बन्ध पार्टी या सम्बन्धित व्यक्ति के लिए फुन्डिंग (Funding-धन) भी विदेशी सरकारें, एजेसियाँ व कम्पनियाँ करवाती है तथा कई बार तो सीधे तौर पर ही विदेशी सरकारों या एजेंसियों के एम.एल.ए., एम.पी. चुनाव लड़कर विधनसभा एवं लोकसभा तक पहुँचते हैं। विदेशी हस्तक्षेप द्वारा परोक्ष रूप से देश की सरकारें विदेशी ताकतों से संचालित होती हैं। यह देश के लिए बहुत खतरनाक है। राजनैतिक हस्तक्षेप के अलावा सामाजिक, धमिर्क, आर्थिक, चारित्रकि व सांस्कृतिक क्षेत्र में भी विदेशी हस्तक्षेप बहुत बड़ी चिन्ता का विषय है।
  6. गरीब का अपमान क्यों - हम यह भूल जाते हैं कि जिन मकानों में हम रहते हैं, जिन मन्दिरों में पूजा करते हैं, जिन अस्पतालों में हम इलाज करवाते हैं, जिन विद्यालयों में हमारे बच्चे पढ़ते हैं तथा जिन सड़कों पर हम अपनी गाड़ियाँ चलाते हैं। देश का ये सारा निर्माण देश के गरीब-मजदूर व कारीगरों ने किया है। मजदूर व कारीगर तथा 120 करोड़ लोगों का अन्नदाता किसान, इन दोनों का ही सत्ता व कुछ समर्थ लोगों द्वारा अपमान हो रहा है। देश के निर्माता व अन्नदाता का यह अपमान तुरन्त बन्द होना चाहिए। उनके श्रम का पूरा मूल्यांकन होना चाहिए और सत्ता व सब समर्थ लोगों को भी इनका सम्मान करना चाहिए। विलासिता की चीजें उपलब्ध करवाने वालों का तो सम्मान हो रहा है तथा जो मूलभूत विकास करने वाले मजदूर-कारीगर और जीवनदाता व अन्नदाता है उनका अपमान हो रहा है।
  7. कितना दुर्भाग्य - चीन, जापान, अमेरिका व प्रफांस आदि देशों में देशभक्ति की बात करना स्वाभिमान, सम्मान, गौरव की बात मानी जाती है लेकिन हिन्दुस्तान में जो लोग देशभक्ति की बात करते हैं, देश के लिए काम करते हैं, भ्रष्टाचार, कालेधन, भ्रष्ट-व्यवस्था का विरोध करते हैं तो उनको गुनाहगार, अपराधी की तरह देखा जाता है यह कितनी शर्म की बात है।
  8. जनसंख्या - वर्तमान में देश में 120 करोड़ लोग हैं उनको भी आज तक सरकारें न्याय नहीं दे पाई हैं। प्रतिवर्ष 2 करोड़, 38 लाख, 39 हजार, 945 नये बच्चों का पैदा होना बहुत बड़ी चिन्ता का विषय है तथा अभी तक तीन से चार करोड़ अवैध रूप से बंग्लादेशी घुसपैठिये घुस चुकें हैं तथा प्रतिदिन लाखों घुसपैठियों का घुसना हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
  9. सामाजिक न्याय - आज आजादी के 64 वर्षों बाद भी 3 करोड़ 33 लाख 5 हजार 845 मामले देश की विभिन्न अदालतों में लम्बित हैं। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस जे.एस. वर्मा के अनुसार इन लम्बित मामलों को निपटाने में लगभग 350 वर्ष लगेंगे। यह न्याय के नाम पर कितना बड़ा अन्याय है और हमारे ईमानदार जज भी कई बार अंग्रेजों द्वारा बनाये गये गलत कानूनों के कारण न्याय की अपेक्षा मात्र फैसला ही दे पाते हैं। भोपाल गैस काण्ड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हमें न्याय-व्यवस्था की सत्य के आधर पर पुन: रचना करनी होगी। जिससे न्यायालयों में फैसले नहीं बल्कि न्याय मिल सके। नये न्यायालयों, फास्ट ट्रैक कोर्ट व नये जजों की नियुक्ति करनी होगी।
  10. देश की आर्थिक लूट के दो बड़े स्रोत - देश का धन देश से बाहर जाए तो देश शक्तिहीन होता है। अत: जो विदेशी कम्पनियाँ व्यापार करके देश का धन लूट रही हैं तथा भ्रष्ट लोग भ्रष्टाचार करके देश को लूट रहे हैं, अब हमें स्वदेशी को अपनाकर तथा विदेशी व्यापार व भ्रष्टाचार को मिटाकर देश को बचाना है। विदेशी-व्यापार व भ्रष्टाचार दोनों ही देश के सबसे बड़े शत्रु हैं, अधिकांश लोग अन्जाने में ही विदेशी वस्तुओं का प्रयोग करके राष्ट्रीय पाप के भागीदार बन रहे हैं और इससे बहुत बड़ा देशाघात हो रहा है।
  11. 64 वर्षों में कितना विकास या कितनी लूट व विनाश - सत्ताओं पर आसीन सरकारों ने विकास के रूप में अब तक जो बजट बनाया उसका लगभग 80 से 90 प्रतिशत भ्रष्टाचार करके लूट लिया तथा मात्र 10 से 20 प्रतिशत ही धन देश के विकास में लगा है। इसके अलावा अवैध-खनन, रिश्वतखोरी व टैक्स इत्यादि चोरी करके जो देश लूटा है। वह देश के साथ बहुत बड़ा अन्याय व धोखा हुआ है। जब केन्द्र-सरकार व अन्य सरकारें विकास का श्रेय (क्रेडिट) लेती है तो उनके शासनकाल में भ्रष्टाचार के रूप में हुये 80 से 90 प्रतिशत विनाश की जिम्मेदारी (रेस्पोंसिबिलिटी) भी उनको लेनी पड़ेगी। हकीकत यह है कि देश का विकास देश के लोगों की मेहनत से हुआ है तथा सरकारें भी जिस विकास का श्रेय लेती हैं उसके लिये भी धन देश के मेहनत करने वाले लोगों ने टैक्स के रूप में दिया है अत: अब तक की अधिकांश सरकारों ने इस देश को विकास के नाम पर लूटा है तथा इस देश में जो कुछ भी विकास हुआ है अथवा अच्छा नजर आ रहा है, वह सच्चे, अच्छे व ईमानदार नागरिकों, गाँव के किसानों, गरीबों व मजदूरों की मेहनत का परिणाम है।
  12. भ्रष्ट-आचरण - बिना मेहनत किए धन, सम्पत्ति अजिदमवत करना यही भ्रष्टाचार है। ऐसे लोगों को वेद में दस्यु या राक्षस कहा गया है अकर्मा दस्यु: - वेद । सरकारी अथवा गैर सरकारी नौकरी में समय से न जाना, नौकरी में पूरा काम न करना, बिना मेहनत किए वेतन लेना तथा विवाह में दहेज लेना व अन्य सामाजिक बुराइयाँ भी नैतिक रूप से भ्रष्ट-आचरण है। इस आर्थिक व राजनैतिक-भ्रष्टाचार के लिए मुख्य रूप से राज्य-व्यवस्था जिम्मेदार है व नैतिक भ्रष्ट-आचरण के लिए जनता स्वयं जिम्मेदार है। राष्ट्र के नागरिकों का चरित्र-निर्माण ही इस नैतिक भ्रष्टाचार का एकमात्र समाधन है। इसके लिए माता-पिता को बचपन से ही ऊँचे संस्कार देने होंगे तथा शिक्षा व्यवस्था में संस्कार व आध्यात्मिक मूल्यों का सम्मिलित करने से लेकर पूरी सामाजिक संरचना में सकारात्मक-परिवर्तन लाना होगा और इस काम को हम पूरी दृढ़ता से कर रहे हैं।
  13. भ्रष्टाचार :- भ्रष्टाचार एक सामाजिक समस्या नहीं है अपितु ये एक विशुद्ध रूप से राजनैतिक समस्या है। संवैधनिक पदों पर बैठे लोग ही अपने अधिकारों व शक्तियों का दुरुपयोग करके या तो भ्रष्टाचार खुद करते हैं या फरि दूसरों से करवाते हैं। इस देश का आम आदमी मेहनत करके कमाता है व ईमानदारी से जीने में विश्वास रखता है।
  14. भ्रष्टाचार का स्थाई समाधन :-
    1. कठोर कानून।
    2. लोगों के जीवन में सच्चाई, उच्च नैतिक मूल्य तथा गाँव, गरीब व राष्ट्र से प्रेम। जो लोग सच्चे व ईमानदार हैं, वे कभी बेईमान नहीं हो सकते, दुनियाँ सच्चाई से ही चल रही है तथा फरि भी यदि कोई ईमानदार भी बेईमान हो जाए अथवा बेईमान व्यक्ति भ्रष्टाचार करे तो उसके लिए कठोर से कठोर दण्ड होना चाहिए।
  15. देश से ममता -
    1. जैसे हमें अपने शरीर, घर, धन, दौलत से प्रेम होता है और उसको हम लुटने व नष्ट होने नहीं देते हैं वैसे ही हमें अपने देश, देश की भूसम्पदाओं, जल, जंगल, जमीन, जड़ी-बूटियों व जवानों से प्रेम होना चाहिए तथा किसी भी कीमत पर देश को लुटने व बरबाद नहीं होने देना चाहिए।
    2. जैसे हमारे घर में यदि 400 रुपये से लेकर 4 लाख रुपये की भी चोरी हो जाती है तो हम चोरों का पता लगाते हैं तथा पूरी ताकत लगाकर अपना धन वापस लेते हैं। क्योंकि वह हमारी मेहनत का पैसा है वैसे ही देश के 120 करोड़ लोगों की टैक्स के रूप में दी गई मेहनत की कमाई व अन्य स्रोतों से लूटा गया देश का लगभग ये 400 लाख करोड़ रुपये हमें वापस लेना है क्योंकि ये देश एवं देश का धन हमारा है।
    3. जैसे-हमारे घर में एक भी बच्चा भूखा सोता है, अनपढ़ रहता है या अभाव व अपमान में जिदंगी जीता है तो माता-पिता की आँखों में आँसु आ जाते हैं और वे चैन से सो नहीं पाते हैं, वैसे ही इस देश के 84 करोड़ लोगों की भूख, अशिक्षा व अपमान से हमें आहत होना चाहिए, हमारी आँखों में संवदना के रूप में आँसु होने चाहिए। क्यांकि ये हमारे हैं और जब तक हम इनको इनका अधिकार नही दिलवा देते तब तक न तो चैन से बैठगे न ही चैन से सोयग।
  16. नेता व पाटिदमवयाँ कठोर कानून क्यों नहीं बनाते -देश में सत्ता के शीर्ष पर बैठे किसी केबिनेट मंत्री या अन्य नेताओं की माँ, बहन व बेटियों के साथ न तो बलात्कार होता है, न ही उनके परिवार वालों को खाने-पीने की मिलावटी चीजों का सामना करना पड़ता है तथा भ्रष्टाचार में भी नेताओं व पाटिदमवयों का धन नही लुटता। देश की महिलाओं के साथ बलात्कार होता है व लगभग देश के 120 करोड़ लोगों को मिलावटी सामान मिलता है जिससे वे बीमार होकर मरते हैं। भ्रष्टाचार से देश का धन लुटता है तथा इन अधिकांश भ्रष्ट नेताओं का भ्रष्टाचार से घर भरता है। देश से इनको कोई ममता, प्रेम या मोहब्बत नही है। अत: ये अधिकांश नेता व पाटिदमवयाँ-भ्रष्टाचार, बलात्कार व मिलावट के खिलाफ आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड का कठोर कानून नहीं बनाते; भ्रष्टाचार के खिलाफ रिकवरी (वसूली) का कानून भी नही बनाते, ऐसा करने से इन भ्रष्टाचारियों से कालाधन छिनेगा तथा देश को धन मिलेगा।
  17. अखण्ड भारत - भ्रष्टाचार व कालेधन के समाप् त होते ही भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 20 हजार लाख करोड़ रुपये की हो जाएगी। भारत के आर्थिक महाशक्ति बनते ही समय के साथ अलग हुए सभी राष्ट्र पुन: भारत में विलीन हो जायेंगे। अफगानिस्तान से लेकर बर्मा तक तथा कैलाश मानसरोवर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरा भारत अखण्ड होगा और एक शक्तिशाली व आध्यात्मिक भारत के उदय से नये विश्व का उदय होगा।
  18. सेवा का सिद्धांत - सम्पूर्ण सृष्टि या ब्रह्माण्ड सेवा, श्रम या कर्म के सिद्धांत पर कार्य कर रहा है। सूर्य, चन्द्र, धरती, वृक्ष व जड़ी-बूटियाँ आदि सब दूसरों के लिए जी रहे हैं। बदले में कुछ भी नहीं ले रहे हैं। हम भी इन सबसे निःस्वार्थ सेवा, श्रम व कर्म करना सीखें। देखो ! इन सबमें कोई स्वार्थ, प्रतिक्रिया व प्रमाद आदि नहीं है।
  19. राष्ट्रसेवा :- देश को अच्छा, शक्तिशाली बनाने के लिए तथा राष्ट्र सेवा के लिए आत्मानुशासन में रहकर आत्मविश्वास व साहस के साथ अपने कर्म को अपना धर्म मानकर, श्रमपूर्वक अपने राष्ट्र की समृद्धि करना, यह हमारी व्यक्तिगत रूप से सबसे बड़ी राष्ट्रसेवा है। जिस दिन हर किसान, हर जवान, हर अध्यापक, विद्यार्थी, राजनेता, डॉक्टर, इन्जीनियर, साधु, संन्यासी, योगी, माताएँ, बहनें व बेटियाँ आदि सब अपना-अपना काम अपनी पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करने लगेंगे, उस दिन देश जरूर महान~ बनेगा। जापान, अमेरिका व चीन आदि देश ईमानदारी से मेहनत करके ही ऐसे ही आगे बढ़े है।
  20. राष्ट्र-निर्माण - कुछ लोग घर बनाने में, कुछ लोग भवनों के निर्माण में, कुछ लोग सड़के बनाने में, कुछ लोग गाड़ियाँ बनाने में, कुछ लोग औद्योगिक क्षेत्र में, इस तरह से राष्ट्र-निर्माण के विभिन्न क्षेत्रों में लगे सभी लोगों की हम हृदय से प्रशंसा करते हैं। कुछ लोग इसी तरह से एक से दो घण्टा अथवा पूरा जीवन व्यक्ति-निर्माण, ग्राम-निर्माण व राष्ट्र-निर्माण में जीवन को लगा दें तो इससे बड़ा जीवन का सौभाग्य कुछ और नहीं हो सकता एवं यह जीवन की सबसे बड़ी उपयोगिता होगी।
  21. योग-सेवा- गरीब-अमीर सब व्यक्तियों, समाज, राष्ट्र व विश्व की सेवा का सर्वश्रेष्ठ व सम्पूर्ण साधन या माध्यम है- योग। व्यक्ति व समाज में बहुत से रोग, विचार, दु:ख व बुराइयाँ है - योगसेवा इन सबका समाधन है। अब अलग-अलग अभियान (कम्पियन) न चलाकर, सब लोग योग-कम्पियन ही चलायेंगे। इससे रोग, नशा, हिंसा, अज्ञान व अन्य सब बुराईयों से मुक्त समाज तो बनेगा ही साथ ही योग से हम सब संगठित होकर करॅप् शन, कैरॅप् ट पोलिटिकल सिस्टम व ब्लैक मनी के अगेंस्ट भी कम्पियन को सार्थक, निर्णायक व निःस्वार्थ भाव से चला पायेंगे। योग आत्मोन्नति, राष्ट्रोन्नति, आत्मनिर्माण, ग्राम-निर्माण व राष्ट्र निर्माण का, आत्मकल्याण व विश्वकल्याण का सर्वश्रेष्ठ, सार्थक, परिणामकारी, सार्वभौमिक, वैज्ञानिक, शाश्वत व सात्विक माध्यम या साधन है। जैसे अतीत में यज्ञ, स्वाध्याय, शास्त्रार्थ, मठ, मन्दिर, कथा व शाखाएं व्यक्ति-निर्माण, राष्ट्र-निर्माण व युग-निर्माण आदि की माध्यम बनी व आज भी इन सबकी प्रासंगिकता है लेकिन योग-सेवा समय, काल परिस्थिति के अनुसार सर्वश्रेष्ठ सेवा का रूप ले चुकी है।
  22. योग संन्यास या सेवा संन्यास- प्राचीन काल में हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों ने एक श्रेष्ठ सामाजिक व्यवस्था के तहत सोलह संस्कार व चतुर्वर्णाश्रम की रचना की थी। भारत के सामाजिक, आध्यात्मिक, आर्थिक व राजनैतिक पतन के कारण वह व्यवस्था क्षीण हुई है। अब कम से कम योग संस्कार व योग संन्यास से हम अपने प्राचीन आध्यात्मिक वैभव को बचा सकते हैं। जितने भी वरिष्ठ नागरिक हैं अथवा समर्थ लोग हैं वे बाहर से संसार में रहते हुए भी भीतर से अर्थात् कर्म या आचरण से संन्यासी बनें। इनमें से कुछ आंशिक रूप से तो कुछ पूर्णरूप से योग-संन्यास अथवा सेवा-संन्यास का व्रत या दीक्षा लें कि अब हम अपने सम्पूर्ण जीवन को इस श्रेष्ठतम कार्य में लगायेंगे। शीघ्र ही योग-संन्यास अथवा सेवा-संन्यास की श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के सान्निध्य में पंजीकरण की व्यवस्था भी की जायेगी।
  23. व्यक्ति व राजनीति की शुद्धि में समय -प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत दोषों को दूर करने का अवसर प्रतिदिन व प्रतिपल मिलता है। अत: हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम आज से तथा इसी क्षण से अपने दोषों को स्वीकार कर स्वयं में सुधर करेंगे। दृढ़-संकल्प, योग, प्राणायाम व ध्यानादि से जीवन को पूर्ण-पवित्र बनायेगें। राजनैतिक दोषों को दूर कर भारतीय राजनीति का पुनर्जन्म करने का अवसर पाँच वर्ष में एक बार अथवा चुनाव के समय ही मिलता है लेकिन इस एक दिन में हम निष्कलंक लोगों को एक-एक वोट करके इस राजनीति की पूरी खोट को दूर कर सकते हैं और भ्रष्टाचार, कालाधन व भ्रष्ट राजनैतिक व्यवस्था जिसके कारण पूरा देश नरक बना हुआ है उसको बदल कर इस देश को स्वर्ग व सुखी बना सकते हैं। राजनीति का शुद्धिकरण या पुनर्जन्म तो हमारे 1 प्रतिशत ध्येय के अन्तर्गत आता है जोकि चुनाव के समय लोकतन्त्र के महाकुम्भ पर निष्कलंक (नॉन-करेप् ट) लोगों को हम वैसे ही वोट करके व दूसरों को प्रेरित कर वोट करवाकर प्राप् त कर लेंगे। 99 प्रतिशत तो हमारा ध्येय प्रतिदिन साधना व सेवा करके चरित्र-निर्माण करना ही है।
  24. भारत स्वाभिमान का ध्येय-रोग, नशा व विदेशी कम्पनियों की लूट के षड्यंत्र से देश को बचाकर भ्रष्टाचार, कालाधन व भ्रष्ट व्यवस्थाओं से मुक्त एक महाशक्तिशाली, वैभवशाली भारत का निर्माण करना तथा भारत को एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठापित करना भारत स्वाभिमान का ध्येय है।
  25. भारत स्वाभिमान के मुख्य सिद्धांत व आदर्श -
    1. चारित्रकि, आर्थिक व आपराधिक दोषों से मुक्त रहना।
    2. वाणी व व्यवहार के दोषों से मुक्त रहना।
    3. अपमान, उपेक्षा व विरोध आदि से विचलित न होकर अपने कर्त्तव्यपथ पर निरन्तर आगे बढ़ना, चरैवेति-चरैवेति।
    4. गीता के अनुसार एक आदर्श कार्यकर्त्ता होना -मुक्तसग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकर:कर्ता सात्विक उच्यते।। (गीता 18/26)- लालच व अंहकार से मुक्त, धैर्य व उत्साह से युक्त रहकर परिणाम की परवाह किये बिना, फलासक्ति से रहित रहकर योगधर्म व राष्ट्रधर्म को निष्ठापूर्वक निभाना।
    5. गुरु को केन्द्र में रखकर संगठन के अनुशासन व मर्यादा में रहकर पूर्ण समपिदमवत भाव से प्रतिदिन सेवा करना।
  26. हमारी संगठन-शक्ति - व्यक्ति निर्माण से ग्राम-निर्माण व राष्ट्र-निर्माण के लिए तथा भ्रष्टाचार व कालाधन आदि को खत्म करने के लिए और व्यवस्था परिर्वतन हेतु सत्ता आदि परिर्वतन के लिए आज हमारे पास देश के सभी प्रान्तां, सभी जिलो, सभी तहसीलों व लाखों गाँवों में एक मजबूत संगठन है तथा वर्ष 2011 के अन्त तक सभी गाँवों में भी 100 प्रतिशत भारत स्वाभिमान का संगठन खड़ा हो जायेगा।
  27. सफलता :- सही दिशा व पूर्ण पुरुषार्थ सफलता के मुख्य साधन है। आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक रूप से बड़े परिवर्तन के लिए पाँच आधर-भूत साधन है -
    1. व्यापक मजबूत व अनुशासित संगठन,
    2. निरन्तर निःस्वार्थ सेवा
    3. पूर्ण-पवित्रता
    4. आर्थिक सामथ्र्य
    5. व्यापक लोकप्रियता व विश्वसनीयता। हमारे संगठन में ये पाँचों शक्तियाँ हैं एवं इनको और अधिक बढ़ाना है तथा हमें 100 प्रतिशत सफल होना है।
  28. भारत स्वाभिमान आन्दोलन से देश को क्या मिलेगा -
    1. रोग में देश का प्रतिवर्ष लगभग दस लाख करोड़ रुपये, नशों में लगभग दस लाख करोड़ रुपये तथा विदेशी कम्पनियाँ भी व्यापार के नाम पर जो लूट कर रही हैं। उससे देश का प्रतिवर्ष 5 लाख लाख करोड़ रुपये से अधिक धन विदेशों में चला जाता है। योग व भारत स्वाभिमान अभियान से, प्रतिवर्ष हो रही इस लगभग 25 लाख करोड़ रुपये की लूट से देश को हम बचा रहे हैं और आगे पूरी तरह से बचायेंगे ।
    2. भ्रष्टाचार करके अब तक जो 400 लाख करोड़ रुपये लूटे गएं हैं। वह देश व देशवासियों का धन तो देश को वापस दिलायेंगे ही, साथ ही आगे से लगभग 10 हजार लाख करोड़ रुपये से भी अधिक जो हमारी राष्ट्रीय सम्पदायें हैं उनकी लूट न हो ऐसा प्रबन्ध करेंगे तथा भ्रष्टाचार के सभी मुख्य पाँच स्रोतों को बन्द करके प्रतिदिन हो रहे हजारों करोड़ रुपये के घोटालों से देश को बचायेंगे। साथ ही स्वतन्त्र भारत में चल रहे अंग्रेजी तंत्र के स्थान पर समस्त व्यवस्थाओं का भारतीयकरण व आध्यात्मीकरण करेंगे।
    3. भारत की आर्थिक समृद्धि इतनी अधिक होगी कि हमारा एक रुपया अर्थात् एक भारतीय मुद्रा अमेरिका के 50 डॉलर के बराबर होगी अर्थात् एक रुपये देने पर हमको 50 अमेरिकी डॉलर मिलेंगे। दुर्भर्ाग्य से आज 50 रुपये देने पर हमको एक अमेरिकी डॉलर मिलता है।
    4. गरीब-अमीर सब को समान रूप से संस्कारों के साथ नि:शुल्क शिक्षा मिलेगी तथा पढ़ाई करने के बाद एक भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं रहेगा।
    5. जैसे आज भारतीय नागरिक डॉलर व पौण्ड आदि विदेशी मुद्रा के लिये विदेशों में कार्य करते हैं, खासकर वहाँ के पेट्रोल पम्प, रेस्टोरेन्ट व एयरपोर्ट आदि पर, वैसे ही आने वालों 10 से 25 वर्षों में ब्रिटेन, अमेरिका व अन्य यूरोप आदि देशों के लोग सशक्त भारतीय मुद्रा के लोभ में हमारे देश में, एयरपोर्ट, पेट्रोल-पम्प, होटलों व अन्य कर्मचारियों के रूप में काम करेंगे तथा उनके बॉस के रुप में बड़े अधिकारी भारतीय लोग होंगे।
  29. वोट - एक प्रश्न अक्सर लोगों के मन में उठता है कि भारत स्वाभिमान आंदोलन की सभाओं में आने वाले लोग या वैचारिक रूप से हमसे जुड़े हुए लोग क्या भारत स्वाभिमान के आह्वान पर चुनाव के समय ईमानदार, निष्कलंक (नॉन-करप्ट) व योग्य व्यक्तियों को वोट देंगे? तो हमारा उत्तर है-हाँ, क्योंकि श्रद्धेय स्वामी जी जब लोगों से पूछते हैं "क्या आप लोग चुनाव के समय संगठन के आह्वान पर वोट देंगे"-तो लोग कहते हैं कि "बाबा जी वोट देंगे, औरों से भी दिलवायेंगे तथा संगठन के काम के लिए दान (नोट) भी देंगे तथा जरूरत पड़ी तो जान भी कुर्बान करने से पीछे नहीं हटेंगे"। दरअसल ये बात राजनैतिक पाटिदमवयों के विषय में बिल्कुल उल्टी होती है क्योंकि उनकी रैलीयों में लोगों को पैसे देकर बुलाया जाता है। अत: उस भीड़ का वोट में बदलना एक बहुत बड़ा प्रश्न होता है। यहाँ तो श्रद्धेय स्वामी जी महाराज के कार्यक्रमों में आने वाले लोग श्रद्धापूर्वक अत: प्रेरणा से आते हैं। वैचारिक रूप से हमसे जुड़े 100 करोड़ से अधिक लोग, अब इस भ्रष्टाचार, कालेधन व भ्रष्ट-व्यवस्था को समाप् त करने के लिए पूरी तरह से तैयार हो चुके हैं जन-साधरण को केवल अगले चुनाव का इंतजार है।
  30. हमारी भावी विकास योजना:-
    1. जल प्रबन्धन की राष्ट्रव्यापी नीति बनाना, जो देश को बाढ़ व सूखे से बचाए तथा करीब 50 करोड़ एकड़ भूमि के ऊपर लगभग 50 लाख करोड़ रुपये की प्रतिवर्ष सालाना उपज लेना। इससे भारत के गरीब, मजदूर व किसान को समृद्ध बनाना।
    2. प्रत्येक जिले के विकास योजनाओं का स्वरूप एक राष्ट्र की तरह बनाना। गाँव से लेकर शहर तक औद्योगिक, सेवागत व कृषिगत विकास में एक संतुलन बनाना। आजादी के बाद अधिकांश सरकारों की गलत आर्थिक नीतियों के कारण से जो विषमताएं पैदा हुई हैं उनको समाप् त करना व विकास के विकेन्द्रीकरण की नीतियों को पूरी ईमानदारी के साथ क्रियान्वित करके विकास का संतुलन बनाना।
    3. आयुर्वेद के विकास से कॉस्मेटिक, स्वास्थय-वर्धक आहार व अन्य नित्य-प्रयोग की वस्तुओं में जड़ी-बूटियों के प्रयोग को प्रोत्साहन देकर 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के वैश्विक व्यापार में भारत की भागीदारी को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाते हुए कम से कम 50 प्रतिशत तक ले जाना।
    4. देश की जनसंख्या का उपयोग देश के उत्पादन को बढ़ाने में तथा विकास करने में करना। अनुत्पादक व दिशाहीन श्रम से देश को मुक्ित दिलाना। सभी नागरिकों को शिक्षा देकर व समृद्ध बनाकर जनसंख्या को व्यवहारिक तथा ताकिदमवक रूप से नियन्त्रति करना। यदि हम राष्ट्र की श्रम शक्ति का पूरा उपयोग करें तो 100 से 200 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त आर्थिक समृद्धि हासिल हो सकती है। अनुत्पादक-श्रम देश के वर्तमान शासकों की अदूरदर्शिता व मू[र्ाता का बहुत बड़ा उदाहरण है।
    5. दुर्भाग्य से हमारे देश में विश्व-स्तरीय शोध व अनुसंधन-संस्थान, विश्व-विद्यालय एवं अन्य सम्पूर्ण विकास का ढाँचा जितना होना चाहिए, उतना नहीं है। हम इसे खड़ा करेंगे तथा विज्ञान व तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्तरिक्ष-विद्या, भूगर्भ-विद्या आदि से हर क्षेत्र में भारत को सर्वोच्च स्थान पर लेकर जायेंगे, जैसे कि प्राचीन काल में भारत ने हर क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व किया था और हमने ही विश्व को सबसे पहली भाषा, संस्कृति, सभ्यता, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, कृषि व अर्थ-व्यवस्था आदि दी थी।
  31. इतनी जल्दी क्यों -योग व अध्यात्म से जब देश ठीक हो जायेगा तो सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा, फरि भारत स्वाभिमान आन्दोलन की जरूरत व इतनी जल्दी क्यों ? यह प्रश्न बहुत से लोग करते हैं पहली बात ये भ्रष्ट-बेईमान व चोर लोग न योग करते है, न अध्यात्म व भगवान को मानते हैं। अत: इनको सुधरने के लिए तो भारत स्वाभिमान जरूरी है ही, साथ ही पहले जो 400 लाख करोड़ रुपये लूटा गया सो तो लूटा गया, आगे से राष्ट्रीय सम्पदाओं के रूप में लगभग दस हजार लाख करोड़ रुपये लूटने का खतरा बना हुआ है। टैक्स जस्टिस नेटवर्क के अनुसार दुनियाँ के भ्रष्ट लोग प्रतिवर्ष 1.6 ट्रिलियन डॉलर अर्थात् लगभग 72 लाख करोड़ रुपये क्रोस बोर्डर ब्लैक मनी जमा करते हैं इसमें भारत से भी लगभग 20 लाख करोड़ रुपये की प्रतिवर्ष लूट होती है। इसका मतलब यह हुआ कि प्रतिमाह लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये तथा प्रतिदिन लगभग 5 हजार करोड़ रुपये भारत से ये बेइमान लोग लूट कर रहे है। अत: एक दिन भी इन भ्रष्ट लोगों का सत्ता में बना रहना भी देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
  32. राजनैतिक हस्तक्षेप क्यों? :- हम देश को अच्छा देखना चाहते हैं। हम देखना चाहते हैं, कि हमारे देश में भी अमेरिका, जापान व इंग्लैण्ड आदि की तरह अच्छी सड़के हों, सबके लिए नि:शुल्क समान शिक्षा हो, शिक्षा के साथ संस्कार व उच्च आध्यात्मिक मूल्य व आदर्श हों, अच्छी स्वास्थ्य सुविधएं हों, कानून अच्छे हों, जिससे अपराधियों को दण्ड मिले व सब लोगों को सुरक्षा मिलें। क्योंकि देश कानून से ही चलता है नेता व सरकारें तो आती-जाती रहती हैं। भूमि अधिग्रहण व गोहत्या जैसे काले कानून खत्म हों। भ्रष्टाचार, बलात्कार व मिलावट के खिलाफ मृत्युदण्ड का कानून बने तथा गोहत्या-निषेध का कानून बने, पशुधन आधरित विष-मुक्त कृषि हो जिससे किसान व सब देशवासी स्वस्थ व समृद्ध बनें, देश में सर्वत्र आध्यात्मिकता व ईमानदारी हो आदि-आदि। परन्तु हम भूल जाते हैं कि देश में लोकतान्त्रकि शासन प्रणाली में सर्वोच्च शक्ति चुनी हुई सरकार के पास होती है। सरकार चाहे तो ये सब काम एक दिन में कर सकती है। देश की सभी व्यवस्थाएं (पूरा सिस्टम) सभी सेनाएं व देश की आधे से ज्यादा जमीनें तथा सभी भूसम्पदाएं सरकार के अधिकार मे हैं। देश के जल, जमीन, जंगल, जड़ी-बूटियाँ, जवानों का वर्तमान व भविष्य सब कुछ सरकार के हाथों में है। अत: सरकार का अच्छा व ईमानदार होना बहुत ही जरूरी है। यदि देश, भारत माता गलत लोगों के हाथों में होगी तो वे उसे लूटेंगे, बेचेंगे, नोचेंगे, खा जायेंगे और अधिकांशत: यही हो रहा है। अत: हम चुनी हुई सरकारों पर अपना संवैधनिक कर्तव्य निभाने के लिए दबाव डालेंगे और यदि वे पूरे सिस्टम को ठीक नहीं रखती हैं, तो इस देश को बचाने के लिए हमारे संविधन ने एक बहुत बड़ी शक्ति हमें दी है कि हम पाँच साल में अथवा जब भी चुनाव हो, तो एक दिन में अपने एक-एक वोट से भ्रष्ट सरकारों को बदलकर अच्छे लोगों को चुनकर देश को बचा सकते हैं।
    यदि हमने देश को नहीं बचाया तो हम भी उतने ही गुनाहगार होंगे जितना ये देश को लूटने वाले भ्रष्टाचारी। अत: यह राजनैतिक हस्तक्षेप हमारा राष्ट्रधर्म है, यह हमारा देश के प्रति संवैधनिक कर्त्तव्य है, यह पाप नहीं पुण्य है, राजनीति का शुद्धिकरण या पुनर्जन्म करना यह नफरत, घृणा, उपेक्षा या तिरस्कार की बात नहीं अपितु यह देश के लिए बहुत बड़ा धर्म व पुण्य का काम है। यह राजनैतिक हस्तक्षेप राष्ट्रसेवा है, राष्ट्रधर्म है, यह राष्ट्रप्रेम है।
  33. हमारे विरोधी कौन - गाँव, गरीब व भारत विरोधी भ्रष्ट लोग अपने निहित स्वार्थों के चलते हमारा विरोध करते रहे हैं तथा आगे भी करेंगे। विरोध के मुख्य चार कारण होते है:- स्वार्थ, अज्ञान, आग्रह व अहंकार। जो अज्ञान, आग्रह व अहंकार-वश हमारा विरोध कर रहे हैं। हम उनको विनम्रतापूर्वक समझाकर समाप् त कर लेगें व अपनी बात पूरी बताकर अपना समर्थक बना लेंगे, लेकिन स्वार्थी तत्व व भ्रष्ट लोग तो सदा ही विरोधी रहेंगे।
  34. पाप व अन्याय का विरोध - राष्ट्रहित में ज्ञानपूर्वक शालीनता के साथ पाप व अन्याय का विरोध करना अनुचित नहीं अपितु उचित है, धर्म व पुण्य है। पाप का तो विरोध हमारे पूर्वजों ने सदा से ही किया है तथा वेद में भी कहा है-मा व स्तेनऽ ईशत: (यजु0 1.1) अर्थात् भ्रष्ट व चोर लोग हम पर शासन न करें। अत: पाप का विरोध करना अपराध या गुनाह नहीं अपितु पाप का विरोध न करने वाले अपराधी, पापी व गुनहगार है।
  35. परिवर्तन -जैसे लगभग 2 या 3 हजार वर्ष पूर्व वैदिक धर्म के साथ अन्य धर्म-सम्प्रदायों के रूप में धमिर्क परिवर्तन हुआ, जैसे 100 साल पहले पूरे विश्व में राजतंत्र से प्रजातंत्र के रूप में शासन व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन हुआ है। वैसा ही अब इस देश में एक बड़ा सामाजिक, आध्यामिक, आर्थिक, राजनैतिक-परिर्वतन अवश्यंभावी है। यदि हमने व अन्य संगठनों, सात्विक लोगों ने यह परिवर्तन नहीं किया, तो भी यह तो होना ही है। परिवर्तन संसार का वैसा ही अटल सत्य है जैसा बचपन के बाद यौवन। यदि हम सब संगठित होकर इस परिवर्तन को सही दिशा में लायेंगे तो यह राष्ट्र व संसार के लिए शुभ , हितकर व कल्याणकारी होगा।
  36. सत्य या उचित-अनुचित क्या है - कोई भी नेता अथवा तथाकथति बड़ा व्यक्ति किसी भी संदर्भ में मीडिया में कोई बयान देता है तो वह सत्य व उचित नहीं हो जाता अपितु तथ्य, तर्क व प्रमाणों से ही उचित-अनुचित, सत्य अथवा झूठ का निर्णय होता है।
  37. मूलत: हम सब ग्रामवासी - हम सबके पूर्वज मूलत: गाँव में ही पैदा हुये हैं। शहरी संस्कृति तो बहुत ही अर्वाचीन है। हमारे बड़े-बुजुर्ग व ऋषि-मुनि अरण्यों (वनों) व गाँवों में वास करते थे। अत: हम सबका यह कर्तव्य है कि अपने पूर्वजों की जन्मभूमि गाँव व गाँव के गरीब, मजदूर व किसानों के जीवन-स्तर को ऊपर उठाने के लिए ग्राम-इकाईयाँ गठित करके योजनाबद्ध व चरणबद्ध तरीके हम सब मिलकर प्रयास करें। इससे एक ओर जहाँ गाँव में खुशहाली आयेगी तथा गरीबों व किसानों के चेहरों पर मुस्कान आयेगी वहीं हमारे पूर्वजों की आत्मा को भी शान्ति मिलेगी।
  38. हम किसके साथ - हम देश, सत्य व न्याय के साथ हैं तथा गाँव, गरीब व भारत के हितैषी सदा हमारे साथ थे, हैं और रहेगें तथा जो लोग पूरी ईमानदारी व सच्चाई से पहले अपने भीतर के (जीवन या पार्टी के) पाप को साफ करके देश से भ्रष्टाचार, भ्रष्ट-व्यवस्था को मिटाने व कालेधन को देश को वापिस दिलाने के लिये सहमत हैं, वे भी हमारे साथ होंगे। हम अपने तप व करोड़ों लोगों के विश्वास को देश के लिए तो दाँव पर लगायेंगे, भ्रष्ट लोगों के लिए नहीं।
  39. हम कौन हैं :- हम सब आध्यात्मिक दृष्टि से ईश्वर की सन्तान हैं, कुल वंंश, परम्परा से हम ऋषि पुत्र हैं तथा भौतिक रूप से मूल में भारत माता की सन्तान हैं। क्योंकि प्रथम पिता यह राष्ट्ररूपी पिता है तथा प्रथम माता यह धरती-माता या मातृभूमि है -माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या: (अथर्ववेद 12.1.12)। अत: हमारा कर्त्तव्य है हम सब मिलकर भगवान~ का साम्राज्य अर्थात स्वर्ग धरती पर लाएं। हम ऋषियों के वंशज हैं, अत: भारत को ऋषि भूमि बनाएं तथा भारत माता की सन्तान होने का धर्म निभाते हुए भारत को विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाएं।
  40. आत्म-स्वरूप या स्वभाव -अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सदाचार, प्रेम, करूणा, सेवा, सद~भावना, आनन्द, शान्ति, ज्ञान, शौर्य, साहस, धैर्य, सहजता, कर्मशीलता ये हमारे स्वभाव, धर्म या स्वरूप हैं। स्वभाव उसको कहते हैं जिसमें हम 24 घण्टे जीतें हैं। सहज प्रेम व सत्य आदि में हम 24 घण्टे जीते हैं अथवा जीना चाहते हैं अत: ये हमारे स्वभाव हैं। लेकिन काम, क्रोध व अहंकार आदि, यदि एक क्षण के लिए भी हमारे मन में उठते हैं तो हमें कष्ट देते हैं। अत: अविद्या आदि पाँच क्लेश व अज्ञान-मूलक काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकारादि पाँच विकार इन्द्रियों का व मन का मिथ्यारूप बोध ये हमारे स्वभाव, स्वधर्म व स्वरूप नहीं हैं।
  41. व्यक्ति की शक्ति - भगवान ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रथम होने की शक्ति, सामथ्र्य व ज्ञान दिया है। जो क्षमता सृष्टि के आदिकाल से अब तक विश्व के महान~ आदर्श महापुरूषों में थी वही सम्पूर्ण क्षमता हम सब में है। अत: हमें जीवन के हर श्रेष्ठ क्षेत्र में प्रथम बनना है तथा अपने देश को भी प्रथम बनाना है। हमारे राष्ट्र में भी विश्व के प्रथम राष्ट्र होने की सम्पूर्ण क्षमता है।
  42. विचार की शक्ति - जीवनव मन एक खेत की तरह है तथा विचार बीज की तरह। जीवन व चित्त-रूपी भूमि में जैसे विचारों के बीज डालेंगे वैसा ही हमारा जीवन, आचरण व चरित्र हो जायेगा। हम जो कुछ भी हैं सदाचारी-दुराचारी, हिंसक-अहिंसक, शाकाहारी-मांसाहारी, सुखी-दु:खी, सफल-असफल, शांत-अशांत, आस्तिक-नास्तिक, ईमानदार-बेईमान, अच्छे या बुरे आदि सब कुछ हमारे विचारों के कारण से हैं। अत: ऊँचे व श्रेष्ठ विचार ही महान् जीवन के आधर होते हैं।
  43. जीवन-प्रबन्धन - प्रतिदिन 1 घन्टा योग, 8 से 16 घन्टे कर्मयोग, 6 घन्टे निद्रा व 2 घन्टे परिवार के साथ बैठना, यह जीवन प्रबन्धन का सिद्धांत है ।
  44. आदर्श की स्थापना -आदर्श-जीवन, आदर्श-परिवार, आदर्श-समाज, आदर्श-राष्ट्र व आदर्श-राज्य व्यवस्था हमारा लक्ष्य है। हम जीवन में सदा उच्च आदर्शों पर चलने में ही गौरवान्वित महसूस करते हैं तथा जिन्होंने उच्च आदर्शों से युक्त जीवन जीया उनको ही अपना आदर्श मानते हैं तथा स्वयं भी जीवन में उच्च आदर्शों की स्थापना करना चाहते हैं।
  45. ऊर्जा का सिद्धांत :- एक सैल (कोशिका) से लेकर पूरा पिण्ड (शरीर) व एक-एक परमाणु से लेकर पूरा ब्रह्माण्ड एनर्जी (ऊर्जा) के सिद्धांत पर कार्य करता है। योग, प्राणायाम, ध्यान, यज्ञ, जड़ी-बूटियों के सेवन से हमारे भीतर एक सकारात्मक शक्ति का सृजन होता है तथा रोग, नशा, समस्त अशुभ विचार, अज्ञान, अविद्या, क्लेश, शरीर, इन्द्रियों व मन आदि के सब दोष नष्ट हो जाते हैं और मानव महामानव बन जाता है। जैसे मोबाईल की बैटरी 30 मिनट में चार्ज होने के बाद, हम पूरा दिन मोबाईल पर बात कर सकते हैं वैसे ही प्रतिदिन योग, प्राणयाम, ध्यान द्वारा शरीर, मन व आत्मा को चार्ज कर सकते हैं।
  46. सत्यमेव-जयते -जब भी कोई इंसान जीवन में कोई बड़ा निर्णय लेता है तो वह 99वें प्रतिशत अन्तरात्मा से उठ रही परमात्मा की प्रेरणा या संदेश के अनुरूप ही कार्य करता है और हर व्यक्ति की आत्मा व्यक्ति को गलत काम करने से रोकती है तथा उसको सच्चाई पर चलने के लिए प्रेरित करती है। अत: देश हमारे साथ खड़ा होगा क्योंकि हम सत्य व न्याय के पथ पर है।
  47. चित्र - चित्र देखकर हमें ऊँचे चरित्र की प्रेरणा मिलती है अत: हम अपने घरों में उन महापुरुषों के चित्र लगायें जिन्होंने सामाजिक, राष्ट्रीय व आध्यात्मिक जीवन के उच्च आदर्शों की स्थापना की है।
  48. कर्म - जो हम करते हैं वही हमको मिलता है तथा वह कई गुणा होकर मिलता है जैसे सरसों, तिल, बाजरा आदि जो कुछ भी हम जमीन में डालते हैं वह हमें फसल के रूप में कई गुणा होकर मिलता है। दान व सेवा में भी यही सिद्धांत लागू होता है।
  49. पाप-पुण्य -जिस काम को करने में आत्मा हमको रोके वह काम पाप है जैसे- हिंसा, झूठ, दुराचार, व्यभिचार इत्यादि। जिस काम को करने में आत्मा को सुख, शान्ति व तृप्ति मिले वह पुण्य है जैसे- योग, ध्यान, सेवा, दान इत्यादि।
  50. सरकारी कर्मचारी व अधिकारी - हम सभी सरकारी नौकरी करने वाले देशक्त कर्मचारियों व अधिकारियों का राष्ट्रहित में हृदय से आह्वान करते हैं कि आप किसी पार्टी के गुलाम नहीं, अत: किसी भी षड्यन्त्र व भ्रष्टाचार में भ्रष्ट-नेताओं का साथ न दें अपितु भ्रष्टाचार को मिटाने व कालाधन देश को दिलाने वाले काम में सहयोग करके अपना संवैधनिक दायित्व व राष्ट्रधर्म निभायें।
  51. प्रतिभा पलायन - हमें पढ़-लिखकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा आदि विदेशों में नहीं जाना अपितु अपने देश को विदेशों से भी अच्छा बनना हैं तथा हमारे देश में हमें विश्व-स्तर के शोध,अनुसंधन-केन्द्र, विश्वविद्यालय व सम्पूर्ण विकास का एक आदर्श ढाँचा तैयार करना है। भ्रष्टाचार मिटाकर कालाधन देश को दिलाकर, हम भारत को अमेरिका से भी अधिक शक्तिशाली बनाना है।
  52. आरक्षण -भ्रष्टाचार व कालाधन खत्म होने से हमारे पास इतना धन होगा कि हम प्रत्येक जिले, तहसील में लाखों विद्यालय व हजारों विश्वविद्यालय बना सकेंगे तथा प्रत्येक गाँव में औद्योगिक व अन्य विकास के काम कर सकेंगे। हम अपने लोगों को पढ़ाने व रोजगार देने के साथ-साथ विश्व के अन्य लोगों को भी रोजगार दे सकेंगे। अत: भ्रष्टाचार के खत्म होने व विकास होने पर जब सबको आर्थिक व सामाजिक न्याय मिल जायेगा तो आर्थिक विषमतायें समाप् त हो जायेंगी। प्रारम्भ में आरक्षण का उद~देश्य था कि आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से जो पिछड़े हुए लोग थे उनको ऊपर उठाया जा सके। यह वैचारिक व व्यवहारिक रूप से तर्कसंगत भी था, परन्तु अब आरक्षण के नाम पर जिस तरह से घटिया राजनीति हो रही है वह चिन्ताजनक है। अत: सम्पूर्ण भारतवासियों को सामाजिक व आर्थिक न्याय पाने के लिए तथा समस्त विषमताओं को दूर करने के लिए भ्रष्टाचार व कालेधन के खिलाफ एक साथ खड़ा होना होगा। तभी सभी जातियों को समान रूप से न्याय मिल पायेगा।
  53. विकास का दर्शन - हम व्यवस्थाओं, पूँजी, उद्योग, सेवाओं व अधिकारों के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखते हैं। यही सवा±Äõीण विकास का आदर्श-दर्शन है। हम पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, उदारीकरण व वैश्वीकरण के नाम पर गाँव, गरीब व भारत की बलि नहीं चढ़ाना चाहते।
  54. मूलभूत सुविधयें - रोटी, कपड़ा, मकान व शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा बिजली, पानी, सड़क ये नौ मूलभूत बुनियादी सुविधयें देश के सभी नागरिकों को बिना किसी पक्षपात तथा भेदभाव के उपलब्ध करवाना ये सरकार का नैतिक एवं संवैधनिक कर्तव्य है।
  55. युवा-शक्ति - भारत में करीब 50 करोड़ युवा व अन्य मजदूर व कारीगर आंशिक या पूर्ण रूप से बेरोजगार हैं यदि हम युवा-शक्ति का उपयोग उत्पादन बढ़ाने में करें तो हम 100 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा का उत्पादन कर सकते हैं। आज चीन प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख करोड़ रुपये का निर्यात करता है जबकि हम प्रतिवर्ष मात्र 7 लाख करोड़ रुपये का ही निर्यात कर पाते हैं।
  56. चुनाव सुधर :-
    1. राजनीति में अपराध रोकने के लिए तथा चुनाव में बाहुबल, धनबल या कालेधन के दुरूपयोग पर अंकुश के लिए तथा आपराधिक तत्वों को राजनीति से दूर करने के लिए चुनाव सुधरों की नितान्त आवश्यकता है। इसके लिए स्टेट-फुन्डिंग (धन) इलैक्शन और चुनाव के नाम पर रैलियाँ और झूठे वादे न होकर एक स्थान पर ही सब पाटिदमवयों व अन्य प्रत्याशियों के लिए प्रचार की व्यवस्थाएं हों। सरकार के नियन्त्रण में सार्वजनिक सभाएं हों व जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए मीडिया में स्थान सरकार अपने खर्च पर उपलब्ध करवाये। इसमें सरकार को राजनैतिक पाटिदमवयों से यदि खर्च में हिस्सेदारी लेनी हो तो, वह भी तर्क-संगत ढंग से की जा सकती है।
    2. प्रधनमंत्री किसी पार्टी, परिवार या व्यक्ति के प्रति वफादार व जिम्मेदार न होकर सीध देश के प्रति वफादार व जवाबदेह हो। इसके लिए प्रधनमंत्री का सीध जनता से चुनाव होना चाहिए।
    3. देश में अनिवार्य मतदान का कानून बनाना चाहिए, विश्व के 30 से भी ज्यादा देशों में अनिवार्य मतदान का कानून है और इससे वहाँ पर स्वस्थ्य लोकतन्त्र है। मतदान करना हमारा मात्र एक अधिकार ही नहीं अपितु लोकतान्त्रकि कर्त्तव्य व धर्म है। मतदान न करने वाले नागरिक को राष्ट्र के नागरिक होने के नाम पर प्राप् त होने वाली सुविधओं से वंचित या उनमें कटौती करने का प्रावधन होना चाहिए।
  57. देश के लोकतन्त्र व सरकारों के लिए सबसे बड़ी शर्म व अपमान की बात -
    1. देश में एक घण्टे में दो महिलाओं के साथ बलात्कार, तीन महिलाओं की दहेज के लिए हत्या। (नेशनल क्राइम ब्यूरों के अनुसार जो रिर्पोटिड केस हैं)
    2. देश में बड़ी संख्या में प्रतिदिन किसानों की आत्महत्या।
    3. देश में 84 करोड़ लोग 20 रुपये मात्र पर प्रतिदिन जीवन यापन कर रहे हैं और ये 84 करोड़ लोग मूलभूत सुविधओं से वंचित है। (प्रा0 अजुनसेन गुप् त व भारत सरकार के आर्थिक सवेक्षणों की रिपोट)
    4. देश में प्रतिदिन 20 हजार व प्रतिवर्ष 60 से 70 लाख लोग भूख से मरते हैं।
    5. देश की सम्पूर्ण आबादी में से 50 प्रतिशत पूरी तरह अनपढ़ तथा 90 प्रतिशत कम पढ़े-लिखे हैं।
    6. देश भ्रष्टाचार, बलात्कार, गंदगी, अशिक्षा, बेरोजगारी तथा गरीबी में दुनियाँ का सर्वाधिक पिछड़ा देश है।
    7. देश में गलत आर्थिक नीतियों के चलते जहाँ एक ओर भारत में अमीर लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है और वहाँ विश्व के सबसे बड़े 10 धनवानों में से 4 धनवान भारत के हैं। साथ ही भ्रष्टाचार के चलते हमारे देश के पैसे से आधी से ज्यादा दुनियाँ के देशों की अर्थ-व्यवस्था चल रही है। हमारे देश के पैसे से दुनियाँ के 100 से अधिक देश ऐशो-आराम कर रहे हैं तथा हमारे देश के लोग गरीबी से भूखे मर रहे हैं और यही कारण है कि इस देश में अमीर प्रतिदिन-प्रतिपल अधिक अमीर हो रहे हैं तथा गरीब प्रतिदिन-प्रतिपल अधिक गरीब होते जा रहे हैं तथा बेबसी में पशुओं से भी ज्यादा बदतर जीवन जीने को मजबूर हैं।
  58. "उत्ष्ठित जाग्रत प्राप्य वरान~ निबोधत।" -(कठोपनिषद 3.14) उठो, जागो! और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रूको। सभी देशभक्त, नागरिक एक से दो घण्टे प्रात:काल का समय सोने में न गंवाकर योगसेवा में लगायें। सोने से स्वयं को व देश को कुछ भी नही मिलेगा, योग-साधना व योगसेवा करने से आपको व देश को सब कुछ मिलेगा। अत: स्वयं जागो व ओरों को जगाओ! तथा स्वयं को तथा देश को बचाओं!
  59. सुखस्य मूलं धर्म:। धर्मस्य: अर्थ:। अर्थस्यमूलं राज्यम्। राज्यस्य मूलमिन्द्रयिजय:। (चाणक्य-सूत्राणि) -सुख का मूल (आधर) अर्थ है, अर्थ का नियन्त्रक राज्य है, राज्यशक्ति, राजसत्ता का नियन्त्रण इन्द्रिय विजय अर्थात् जितेन्द्रियता का आधर योग व आध्यात्म है अत: आदर्श राज्य व्यवस्था का आधर भी योग व आध्यात्म ही है।
  60. तप से ऐश्वर्य :- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तप व त्याग से ही संचालित हो रहा है, जिनको कुछ चाहिए वो कुछ तो कर सकते हैं परन्तु सबकुछ नहीं कर सकते हैं। जिनको कुछ नहीं चाहिए, वो सबकुछ कर सकतें हैं। भारत स्वाभिमान आंदोलन के कार्यकर्त्ता नि:स्वार्थ भाव से अपना कर्त्तव्य मानकर राष्ट्रसेवा, राष्ट्र-निर्माण व राष्ट्रधर्म में लगे हुए हैं। अत: देश के लिए सबकुछ करेंगे और हम सफल होंगे। वेद के इन परम वचनों के साथ हम अपनी बात का उपसंहार करते हैं - अकर्मा दस्यु: इस जगत में कर्महीन आलसी व्यक्ति दस्यु (लुटेरा) होता है तथा मा व स्तेनऽईशत माऽघशंस: (यजु0-1/1) चोर, डाकू, लुटेरे और इनके प्रशंसक तथा समर्थक हमारे ऊपर शासन न करें।
साभार - IBTL  

Friday, March 23, 2012

अब रूस में भी पैर पसारता इस्लाम

रुस्तम कोबिल
बीबीसी उज़बेक सेवा
गुरुवार, 22 मार्च, 2012

मार्च में ठंडे शुक्रवार को मॉस्को के बीचो-बीच गुजरने वाली बोलशाया तातरस्काया स्ट्रीट पर सन्नाटा पसरा है. यह सड़क रूस की राजधानी की सबसे पुरानी मस्जिद के पास से गुजरती है.
मॉस्को में आजकल 20 लाख से अधिक मुसलमान रहते और काम करते हैं. यह अब यूरोप में मुस्लिम लोगों के सबसे बड़े शहरों में से एक हो गया है और कुछ मस्जिदें इतनी बड़ी आबादी के लिए काफी नहीं है.
जुमे की नमाज के दौरान इस ऐतिहासिक इमारत में लोगों का जमघट लगा है और हजारों लोग खुले में बर्फबारी के बीच नमाज पढ़ रहे हैं.
ज्यादातर मुसलमान मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणराज्यों से आए युवा आप्रवासी हैं. गरीबी और संघर्ष ने उन्हें रूस में नई जिंदगी शुरू करने के लिए मजबूर किया है. लाखों उजबेक, ताजिक और किरगिज लोग मॉस्को में नौकरियाँ कर रहे हैं.
उजबेकिस्तान से आए युवा अलबेक कहते हैं, "हम इस बात के आभारी हैं कि मॉस्को में इतनी मस्जिदें हैं." लेकिन दूसरे कुछ लोग कहते हैं कि प्रशासन मुसलमानों की जरूरतों की अनदेखी कर रहा है.
शहर की ऐतिहासिक मस्जिद के इमाम हसन फकरित्दिनोव का मानना है कि मौजूदा सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं. वे कहते हैं, "हम प्रशासन से और मस्जिदें बनाने की अनुमति माँग रहे हैं लेकिन वह हमारी बात नहीं मान रहे हैं. इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों को अब खुले में बारिश और बर्फ के बीच नमाज पढ़नी पड़ रही है."

नमाजियों के लिए जगह की कमी

मॉस्को की पुरानी ततार मस्जिद की अब नई इमारत बनाई जा रही है लेकिन इसके बावजूद भी सभी नमाजियों के लिए यह जगह कम पड़ रही है.
जिन मॉस्कोवासियों से मैंने बात की, उनकी आप्रवासियों द्वारा शहर में लाए गए बदलाव के बारे में अलग अलग राय है.
पुरानी मस्जिद के पास टहल रही दो युवा महिलाएं मुझे बताती हैं, "मॉस्को बढ़ रहा है और ज्यादा से ज्यादा आप्रवासियों को आकर्षित कर रहा है जिसमें से कई मुसलमान हैं. रूस में गिरजाघर भी बनाए जा रहे हैं इसलिए मुसलमानों को भी मस्जिद बनाने से नहीं रोका जाना चाहिए."
लेकिन दूसरे लोगों को डर है कि अधिक विदेशियों के होने की वजह से रूस की संस्कृति और जीवन शैली बदल रही है.
एक राष्ट्रीय संगठन रूसावेट के कार्यकर्ता यूरी गोर्सकी कहते हैं, "लोग मजाक कर रहे हैं कि मॉस्को अब मॉस्कोवाबाद बन गया है. अब सड़कों पर स्लाविक देशों के चेहरे नहीं दिखाई देते. हमें स्लाविक देशों से आए लोगों से आपत्ति नहीं है लेकिन हमें इन मुसलमानों को रोकना होगा."
पहले रूस में मुसलमान आप्रवासियों पर हमले हुआ करते थे लेकिन अब इनकी संख्या में काफी कमी आई है. रूसी मानवाधिकार संगठन सोवा के अनुसार जातीय हमलों में 2011 के दौरान सात लोगों की मौत हुई है और 28 लोग घायल हुए हैं जबकि 2008 में इन हमलों में मरने वालों की संख्या 57 थी.
बाहर से आए अधिकतर लोगों को वह काम करने में कोई संकोच नहीं है जिसे स्थानीय लोग करने में हिचकिचाते हैं. पूरे शहर में हलाल दुकानों और कैफे का जाल सा बिछ गया है.

हलाल समोसा

इनमें महंगे रेस्तराँ से ले कर, जहां एक बार के खाने की कीमत दस हजार रुपए तक है, सस्ते टेक अवे भी शामिल हैं जहाँ मध्य एशियाई लोग तंदूरों में रोटियाँ सेकते हैं और समोसे बनाते हैं. हलाल समोसा रूस का सबसे लोकप्रिय टेक अवे खाना बन गया है.
रूस में बड़ी संख्या में लोग इस्लाम धर्म अपना रहे हैं. इनमें से एक अली व्याचिसलाव हैं जो पहले कट्टरपंथी पादरी हुआ करते थे और क्रिसमस को सार्वजनिक अवकाश बनाने की मुहिम चला रहे थे.
बारह वर्ष पूर्व उन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया और अब वह मॉस्को में मुस्लिम सपोर्ट केंद्र चलाते हैं जो धर्म बदलने वाले नए रूसियों को सलाह देते हैं.
इस केंद्र में काम करने वाली आएशा लरीसा कहती हैं कि उन्होंने 10 हजार से अधिक धर्म बदलने वाली मुस्लिम महिलाओं को पंजीकृत किया है.
इस्लाम हमेशा से ही रूस का दूसरा सबसे धर्म रहा है लेकिन वह इतना दृष्टिगोचर कभी नहीं रहा जितना आज है

Wednesday, March 21, 2012

इण्डोनेशिया में हिन्दू संस्कृति

कुछ वर्ष पूर्व मेरे एक मित्र ने दुनिया के सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या वाले देश इण्डोनेशिया से लौटने के बाद कच्छ के आदीपुर (गुजरात) में मुझे एक 20 हजार रुपया वहां की करेंसी का नोट दिखाया जिस पर भगवान गणेश मुद्रित थे। मैं आश्चर्यचकित हुआ और प्रभावित भी ।
जब पिछले महीने इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता से सिंधी समुदाय के कुछ महानुभावों के समूह ने 9,10 तथा 11 जुलाई 2010 को जकार्ता में होने वाले विश्व सिंधी सम्मेलन में आने का न्यौता दिया तो मैंने इसे तुरन्त स्वीकारा । इसका कारण यह था कि मैं इस देश पर भारतीय सभ्यता और विशेष रुप से रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथों के प्रभाव के बारे में अक्सर सुनता रहता था। करेंसी नोट पर गणेशजी का छपा चित्र इसका एक उदाहरण है।
मेरी पत्नी कमला, सुपुत्री प्रतिभा, दशकों से मेरे सहयोगी दीपक चोपड़ा और उनकी पत्नी वीना के साथ मैं 8 जुलाई को यहां से रवाना हुआ तथा 13 जुलाई को इस यात्रा की अविस्मरणीय स्मृतियां लेकर लौटा। इण्डोनेशिया में 13,677 द्वीप हैं जिनमें से 6000 से ज्यादा पर आबादी है। वहां की कुल जनसंख्या 20.28 करोड़ में से 88 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम और 10 प्रतिशत ईसाई हैं। यहां की 2 प्रतिशत हिन्दू आबादी मुख्य रुप से बाली द्वीप में रहती है।
 Bali brand logo
बाली द्वीप के लिए हाल ही में स्वीकृत किया गया नया ब्राण्ड ‘लोगो’ (प्रतीक चिन्ह) देश की हिन्दू परम्परा का प्रकटीकरण है। इण्डोनेशिया के पर्यटन मंत्रालय का प्रकाशन इस प्रतीक चिन्ह को इस प्रकार बताता है, त्रिकोण (प्रतीक चिन्ह की आकृति) स्थायित्व और संतुलन का प्रतीक है। यह तीन सीधी रेखाओं से बना है जिनमें दोनों सिरे मिलते हैं, जो सास्वत, अग्नि (ब्रह्मा- सृष्टि निर्माता), लिंग या लिंग प्रतिमान के प्रतीक हैं। त्रिकोण् ब्रहमाण्ड के तीनों भगवानों - (त्रिमूर्ति- ब्रह्मा, विष्णु और शिव), प्रकृति के तीन चरणों (भूर, भुव और स्वाहा लोक) और जीवन के तीन चरणों (उत्पत्ति, जीवन और मृत्यु ) को भी अभिव्यक्त करते हैं। प्रतीक चिन्ह के नीचे लिखा बोधवाक्य शान्ति, शान्ति, शान्ति भुवना अलित दन अगुंग (स्वयं और विश्व) पर शान्ति, जोकि एक पावन और पवित्र सिरहन देती है, जिससे गहन दिव्य ज्योति जागृत होती है जो सभी जीवित प्राणियों में संतुलन और शान्ति कायम करती है।
यहां 20000 रुपये के करेंसी नोट का नमूना दिया गया है। जैसा मैंने ऊपर वर्णन किया कि कुछ वर्ष पूर्व मैंने इसे देखा था और तभी तय किया था कि यदि मुझे इस देश की यात्रा करने का अवसर मिला तो मै स्वयं जा कर इसे प्राप्त करुंगा तथा औरों को दिखाऊंगा।
 Indonesian Rupiah with Ganesh inscription

सिंधी सम्मेलन अत्यधिक सफल रहा । सभी पांचों महाद्वीपों- अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका और आस्टे्रलिया के 32 विभिन्न देशों से एक हजार प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया । अधिकांश प्रतिनिधि युवा थे या उनसे कुछ अधिक आयु वाले थे जिनके परिवारों को 1947 में घर से विस्थापित होने की समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा।
भारत के विभाजन से रैडक्लिफ लाइन के दोनों ओर लाखों लोगों को मुसीबत भरे दिन देखने को बाध्य होना पड़ा। सिंध के हिन्दुओं को न केवल चूल्हों और घरों से विस्थापित होना पड़ा अपितु पंजाब और बंगाल के हिन्दुओं जिन्हें अपने गृह राज्य का कुछ न कुछ हिस्सा बचाने का संतोष था, से अलग अपने समूचे क्षेत्र से हाथ धोना पड़ा और विभाजित भारत के विभिन्न राज्यों को अपना घर बनाने को बाध्य होना पड़ा ।
इन सिंधी प्रतिनिधिओं से बात करते हुए मुझे गर्व हुआ कि उन्होंने न केवल विभाजन के त्रासद अनुभवों का अपने पुरुषार्थ और धैर्य से सामना किया अपितु सामान्यत: कहा जाए तो वे अच्छे रुप से समृध्द और सम्पन्न हुए। वे विपदा को अवसर में बदलने में सफल रहे।
हालांकि इनमें से अनेक प्रतिनिधि ऐसे थे जिनके पूर्वज उन देशों में, जहां का वे प्रतिनिधित्व कर रहे थे, से भारत के विभाजन और विभाजन की त्रासदी से काफी पहले जाकर बस चुके थे। उदाहरण के लिए जकार्ता सम्मेलन के आयोजक श्री सुरेश वासवानी उनमें से एक थे जिनके दादा 1914 के आस-पास जकार्ता चले गए थे यानी करीब एक शताब्दी पूर्व! तब से उनका परिवार वहां बस गया और जावा द्वीप को उन्होंने अपना घर बना लिया। जब हम सिंध में थे तो व्यापारियों का वह वर्ग जो विदेश चला गया था और जिन्होंने अपने परिवारों के लिए धन कमाया, उन्हें स्थानीय बोली में - ‘सिंधवर्किज’ ( sindhworkies ) के नाम से जाना जाता था।

जकार्ता जाने वाले यात्रियों के लिए इण्डोनेशिया की राजधानी जकार्ता के उत्तर-पश्चिम तट पर स्थित शहर के बीचोंबीच भव्य निर्मित अनेक घोड़ों से खिंचने वाले रथ पर श्री कृष्ण-अर्जुन की प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षित करने वाली है।
इण्डोनेशिया में स्थानों, व्यक्तियों के नाम और संस्थानों का नामकरण संस्कृत प्रभाव की स्पष्ट छाप छोड़ता है।
 Bheem statue
निश्चित रूप से यह जानकर कि इण्डोनेशिया में सैन्य गुप्तचर का अधिकारिक शुभांकर (mascot) हनुमान हैं, काफी प्रसन्नता हुई। इसके पीछे के औचित्य को वहां के एक स्थानीय व्यक्ति ने यूं बताया कि हनुमान ने ही रावण द्वारा अपहृत सीता को जिन्हें अशोक वाटिका में बंदी बनाकर रखा गया था, का पता लगाने में सफलता पाई थी।
हमारे परिवार ने चार दिन इण्डोनेशिया - दो दिन जकार्ता और दो दिन बाली में बिताए।
बाली इस देश के सर्वाधिक बड़े द्वीपों में से एक है। यहां के उद्योगों में सोने और चांदी के काम, लकड़ी का काम, बुनाई, नारियल, नमक और कॉफी शामिल हैं। लेकिन जैसे ही आप इस क्षेत्र में पहुंचते हैं तो आप साफ तौर पर पाएंगे कि यह पर्यटकों से भरा हुआ है। लगभग तीन मिलियन आबादी वाले बाली में प्रतिवर्ष एक मिलियन पर्यटक आते हैं।
इस द्वीप की राजधानी देनपासर है। हमारे ठहरने का स्थान मनोरम दृश्य वाला फोर सीजंस रिसॉर्ट था जो समुद्र के किनारे पर है और हवाई अड्डे से ज्यादा दूर नहीं है। रिसॉर्ट जाते समय रास्ते में मैंने जकार्ता में कृष्ण-अर्जुन जैसी विशाल पत्थर पर बनी आकृति देखी हालांकि यह जकार्ता में देखी गई आकृति से अलग किस्म की थी।
मैंने अपनी कार के ड्राइवर से पूछा: यह किसकी प्रतिमा है? और क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जब उसने जवाब दिया तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। उसने बताया, ”यह महाभारत के घटोत्कच की प्रतिमा है।” उसने आगे बताया ”और शहर में इस आकृति में घटोत्कच के पिता भीम को भी दिखाया गया है जो दानव से भीषण युध्द कर रहे हैं!”
 Ghatotakach statue near the Ngurah Rai International Airport

भारत में, इन दोनों महाकाव्यों रामायण और महाभारत में से सामान्य नागरिक रामायण के अधिकांश चरित्रों को पहचानते हैं। लेकिन महाभारत के चरित्र कम जाने जाते है।वस्तुत:, भारत में भी बहुत कम होंगे जिन्हें पता होगा कि घटोत्कच कौन है। और वहां हमारी कार का ड्राइवर भीम से उसके रिश्ते के बारे में भी पूरी तरह से जानता था।
जकार्ता में सिंधी सम्मेलन और बाली में हमें रामायण के दृश्यों के मंचन की झलक देखने को मिली जो भारत में प्रचलित परम्परागत रुप से थोड़ा भिन्न थी। कलाकारों का प्रदर्शन तथा प्रस्तुति और जिन स्थानों पर यह प्रदर्शन देखने को मिले वहां का सामान्य वातावरण भी पर्याप्त श्रध्दा और भक्ति से परिपूर्ण था।
मैं यह अवश्य कहूंगा कि इण्डोनेशिया के लोग हमसे ज्यादा अच्छे ढंग से रामायण और महाभारत को जानते हैं और संजोए हुए है।

द्वारा -
लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली
१७ जुलाई, २०१०

Tuesday, March 20, 2012

कश्मीर में बेच दी गई मंदिरों की खरबों की संपत्ति

श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार की मुश्किलें रोज ब रोज बढ़ती जा रही हैं। क्रिकेट घोटाले में केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला का नाम आने के बाद अब अरबों रुपये का जमीन घोटाला सामने आ रहा है। आरोप है कि अफसरों, नेताओं और जमीन माफिया की साठगांठ से कश्मीर के कई मंदिरों की सैकड़ों एकड़ जमीन फर्जी तरीके से बेच दी गई है।
डोगरा राजघराने की एक निशानी है श्रीनगर का महावीर जी मंदिर। इस मंदिर के ट्रस्ट के नाम पर सैकड़ों एकड़ जमीन है और जब देश भर में जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं तो नोट कमाने वालों ने मंदिर को भी नहीं बख्शा।
आईबीएन7 के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि इस मंदिर की जमीन को जम्मू के एक बड़े व्यापारी ने बेच दिया है। डोगरा राज में बने इस मंदिर समेत राज्य भर में फैले कई मंदिरों की रखवाली सनातन धर्म प्रताप सभा ट्रस्ट कर रहा है। ये बिजनेसमैन इस ट्रस्ट का अध्यक्ष होने का दावा करता है। दस्तावेज बताते हैं कि इन लोगों ने खुद ही पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार की। इसके बाद रेवेन्यू के अफसरों के साथ साठगांठ करके राज्य के कई मंदिरों की बेशकीमती जमीन और संपत्ति को अवैध तरीके से बेच दिया। आरोप है कि पूरे कश्मीर में अब तक मंदिरों की साढ़े आठ हजार करोड़ की संपत्ति अवैध तरीके से बेची जा चुकी है।

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति को अब इस मामले में अदालत से इंसाफ की उम्मीद है क्योंकि सरकार ने अभी तक इस दिशा में कुछ भी खास नहीं किया है। 90 के दशक में बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी छोड़ कर चले गए थे। इसके बाद दस हजार करोड़ की संपत्ति वाले कश्मीरी मंदिरों के ट्रस्ट की कमान कुछ पुजारियों और व्यापारियों के हाथों में सिमट गई थी।
जांच में पता चला है कि तकरीबन 20 सालों से इस ट्रस्ट की गवर्निंग बॉडी का कोई चुनाव भी नहीं हुआ है। जाहिर है घोटालेबाजों को हर फर्जीवाड़े की पूरी छूट मिली। अब कश्मीर के डिवीजनल कमिश्नर ने सभी जिला कमिश्नरों को इस घोटाले की जांच के आदेश दिए हैं। राज्य के मुखिया भी भरोसा दे रहे हैं कि कश्मीरी पंडितों के साथ इंसाफ होगा।


Thursday, March 8, 2012

भारत की भौतिक उन्नति का मार्ग (वैदिक भाषा संस्कृत)


भारत के सामने हमारे पूर्व राष्ष्ट्रपति श्री. अब्दुल कलाम ने 2020 तक विश्व की आर्थिक एवं सामरिक महाशक्ति बनने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने की क्षमता केवल आनेवाली पीढ़ी में है ऐसा मानकर वे बाल एवं युवकों को श्शिक्षा संस्थानों में जाकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। किन्तु इस तरूणाई को सामुहिक रीति से किस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए इस विष्षय में पर्याप्त मार्गदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। शासन में बैठा राजकीय दल या विपक्ष दोनों केवल आनेवाले चुनाव तक की सोच रखते हैं। तात्कालिक सोच के श्शिकार नौकरशाह केवल अपने कार्यकाल को चमकाने और उस आधार पर उँचा पद प्राप्त करने के जुगाड में लगे रहते हैं। यही कारण है कि लगभग दो लाख किसानों द्वारा आत्महत्या करने पर भी देश के नीति निर्धारकों एवं योजनाओं को क्रियान्वित करने वाले तन्त्रा की नींद टूटी नहीं है। ऐसे में समाज के सभी घटकों को इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु मार्ग निर्धारण के लिए आगे आना चाहिए।

विकसित देशों की कहानी-

विश्व के वर्तमान परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो विश्व के 204 देशों को सामान्यतः तीन श्रेणियों में
विभाजित किया गया है। प्रथम श्रेणी का नाम है ‘ विकसित ’ दूसरी का ‘ विकसनशील ’ एवं तीसरी का ‘
अविकसित ’ रखा गया है। भारत विकसनशील देशों की श्रेणी में आता है। विकसित देशों की श्रेणी के अन्तर्गत
एक छोटा गट बना है, जिसका नाम है G8। ये आठ देश सर्वाधिक प्रगत देश माने जाते है। इनके नाम है-
अमेरिका, कैनडा, ब्रिटेन, फ्रान्स, जर्मनी, इटली, रशिया और जापान। इन देशों ने विज्ञान और तन्त्राज्ञान के आधार पर प्रगति की है। ये देश विश्व की मण्डी में नये-नये उत्पाद या तकनीक को बेचकर धनार्जन करते हैं।
उदाहरण के लिए
1. अमेरिका में सगणक का निर्माण हुआ। उसे चलाने के लिए मॅक्रोसॉफ्ट ने विन्डोज नामका सॉफ्टवेयर विकसित किया। तत्पश्चात् अन्तरताने (इन्टरनेट) का अविष्कार किया। इन तीनों उत्पादों को विश्व में सभी देशो को बेचकर अमेरिका ने अत्यधिक पैसा कमाया।
2. जापान ने इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहनों के स्तरीय उत्पादों से विश्व के बाजार भर दिये। आज भी ‘सोनी’ ‘टोयोटा’ जैसे ब्रॅण्ड पूरे विश्व में अपनी धाक जमाये हुए हैं।
3. रशिया भारत को दीर्घकालसे शस्त्रों की आपूर्ति करता रहा है। चाहे पनडुब्बी हो या विमान वाहक जलपोल, हम रशिया पर निर्भर हैं।
उपर्युक्त परिपेक्ष में यदि हम भारत का विचार करें तो प्रश्न उठता है कि हमने किन उत्पादों को बेचकर पैसा कमाया। स्वतन्त्राता के पश्चात् हमने विज्ञान और गणित को मैट्रिक तक अनिवार्य विषय बनाया। इन दोनों विषयों की भाषा अंग्रजी है ऐसा मान कर उसे अनिवार्य विषय के रूप में स्थापित किया। आज भारत के १०% लोग अंग्रजी जानते हैं। हमने पर्याप्त मात्रा में तन्त्राज्ञ निर्माण किये हैं। किन्तु वैज्ञानिक कम ही उत्पन्न
कर पाये। इतनी पूर्वसिद्धता के पश्चात् भी हम ऐसी कोई वस्तु निर्माण नहीं कर पाये जिसे बेचने से हम धनवान बन सकें। न हम विज्ञान के क्षेत्रा में कोई मौलिक संशोधन कर पाये। हर वर्ष विज्ञान की विविध शाखाओं में नोबेल पुरस्कार वितरित किये जाते हैं। स्वतन्त्राता प्राप्ति के पश्चात् किसी भारतीय नागरिक को विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ। हम केवल पश्चिम की नकल उतारते हैं। किसी नकलची को परीक्षा में किसी ने प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए देखा है? जो मूल पश्चिम का ज्ञान है उसमें उनका अग्रणी बने रहना स्वाभाविक है। हमें उनके ज्ञान के आधार पर अग्रणी बनने के सपने को छोड़ देना चाहिए। क्या हमारे पास अपना भी कुछ है?

भारतीय विज्ञान-
अंग्रेजों का भारत में पदार्पण होने के पूर्व भारत के विश्विद्यालयों में कुल 62 विषयों की पढ़ाई होती थी। शिक्षा की भाषा संस्कृत होने के कारण इन विषयों के ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे जाते थे। संस्कृत भाषा को आत्मसात करने पर हम इन ग्रन्थों को पढकर समझ सकेंगे। यदि हम ऐसा कर पायेंगे तो हमें विरासत में मिले ज्ञान भण्डार के द्वार खुल जायेंगे। जब हम भारतीय विज्ञान, अर्थशास्त्रा, विधिशास्त्रा की बात करते हैं तो लोग कहते हैं कि- ‘मान लिया कि भारत का ज्ञान क्षेत्रा पूर्व में विस्तृत था। किन्तु वर्तमान मे उसका क्या उपयोग?’ ऐसा कहने वालों के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ।

1. दिल्ली में आज की तिथि में पर्यटक अक्षरधाम देखने के लिए अधिक संख्या में पहुचते हैं। उसे बनाने के लिए 7 हजार शिल्पी 5 वर्ष तक काम करते रहे। उनमें आधुनिक शिक्षा प्राप्त कोई नहीं था। उन भवनों और मन्दिरों की आयु भी आधुनिक भवनों से अधिक है। सुन्दरता, भव्यता और विशालता में भी उनका कोई सानी नहीं हैं। उस निर्माण में लोहा, सीमेन्ट (वज्रचूर्ण) बालु और गिट्टी का उपयोग नहीं हुआ है। संगमरमर में पत्थरों से बने उस निर्माण में जोडने वाला तत्व (binding force) क्या है, यह जानने का विषय है। क्या हमारा यह परम्परागत भवन निर्माण शास्त्रा आज के स्थापत्य अभियन्ता (सिविल इंजीनियर) को सिखाना नहीं चाहिए?
2. भारत में आधुनिक विज्ञान एवं संस्कृत दोनों को जाननेवालों की संख्या अत्यन्त सीमित है। उनमें एक है डॉ.सी.एस.आर प्रभु। वें छंजपवदंस प्दवितउंजपबे में सहायक महाप्रबन्धक हैं। उन्होंने भास्कराचार्य द्वारा लिखित ‘ यन्त्रासर्वस्व ’ नामके ग्रन्थ का अú रहे ‘विमान शास्त्रा’ का अध्ययन प्रारम्भ किया और पाया की विमानों के निर्माण हेतु उपयोग किये जानेवाले धातुओं का विवरण कुछ श्लोकों में संग्रहित है। उन धातुओं के निर्माण के प्रयत्न के फलस्वरूप उन्होंने 5 नये मिश्रधातु बनाये जो वर्तमान विज्ञान जगत को ज्ञात नहीं हैं। उनमें से कुछ के यू.एस.पेटन्ट भी उन्हें प्राप्त हैं। उन मिश्र धातुओं में से एक का भार तो अल्युमीनियम से भी हल्का है। यदि उस मिश्र धातु से विमान बनाया जायेगा तो स्वाभाविक उसका भार कम रहेगा और गति अधिक।
3. नागपुर स्थित नीरी नामकी (NEERI-National Environmental Engineering Research Institute) केन्द्र सरकार की प्रयोगशाला पर्यावरण पर कार्य करती है। वहाँ के वैज्ञानिकों की एक टोली ने पानी की शुद्धता पर एक प्रकल्प हात में लिया। उस टोली में उन्होंने एक स्थानीय आयुर्वेदिक वैद्य को जोडा। उस वैद्य ने उन्हें 92 वी सदी के ‘चिन्तामणि’ नामके ग्रन्थ से 6 श्लोक निकालकर दिये जिनमें पानी के शुद्धीकरण के उपाय बताये हैं। एक श्लोक में लवंग के द्वारा पानी का शुद्धीकरण कैसे होगा इसका विवरण दिया है। उस विवरण पर काम करने के कारण उन वैज्ञानिकों की टोली ने एक रसायन बनाने मे सफलता प्राप्त की, जिसकी एक बूंद एक लीटर पानी को शुद्ध करती है।उस रसायन का यू.एस.पेटन्ट भी भारत सरकार के नामसे प्राप्त किया गया है।
 
अर्थव्यवस्था-
आर्थिक समृद्धि का कारक जैसे विज्ञान है वैसे ही दूसरा कारण है अर्थव्यवस्था। आज विश्व को केवल दो अर्थव्यवस्था की धाराओं की जानकारी है। 1. सामाजवादी अर्थव्यवस्था और 2. बाजारवादी अर्थव्यवस्था। अभी यह माना जाने लगा है कि साम्यवादी तत्वज्ञान आर्थिक समृद्धि लाने मे असफल रहा है। इसलिए साम्यवादी देश अब बाजारवाद की चपेट में आ गये है। भारत ने मिश्र अर्थव्यवस्था, समाजवादी अर्थव्यवस्था और बाजारवादी अर्थव्यवस्था को आजमाकर देखा है। बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने हमारे देश को दो पाटों में बाँट दिया है। एक है- सम्पन्न एवं मध्यम वर्ग का जो बाजारवाद से लाभान्वित है और दूसरा निर्धनों का। अर्थव्यवस्था की सफलता का मापदण्ड तो यही हो सकता है कि उचित अर्थप्रबन्धन के कारणगरीबी कम हो। गरीबों की संख्या का सही आकलन करने के अबतक कई प्रयास भारत में हुए। उनमें अन्तिम प्रयास अर्जुन सेन गुप्ता एवं तेंडुलकर समिति का रहा। प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त इन समितियों की रपट ने बाजारवाद के समर्थकों को निराशा ही कियाकारण निर्धनता की व्याख्याओं को मनोनुकूल बनाकर भी गरीबों की संख्या कम नहीं आँकी गयी।

हमने अपनी अर्थव्यवस्था को शेष विश्व से जोड दिया है। किन्तु गरीबों की संख्या के आकलन के लिए निर्धारित वैश्विक मानदण्डों को हम नहीं मानते। फिर भी जनसंख्या के ३७.६% गरीब भारत में रहते हैं ऐसा सरकार मानती हैं। इन्हें २० रूपये या उससे कम की आय पर प्रतिदिन गुजारा करता पड़ता है। विश्व बैंक का  गरीबी का मापदण्ड देढ डॉलर है। यदि उस कसौटी पर भारत को कसा जायेगा तो भारत की ८० % जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे आ जायेगी। क्या इस संख्या के आधारपर भारत को समृद्ध देश कहा जा सकेगा? बाजारवाद के समर्थक यह कहते आये हैं कि यदि समाज का एक हिस्सा सम्पन्न होगा तो उसके कारण अन्य
भी लाभाविन्त होंगे। इसे ‘ट्रिकल डाऊन थेयरी’ कहा गया। हमारे देश मे बाजारवाद का प्रारम्भ 1990 में हुआ।
अब 20 वर्ष गुजर चुके हैं। ‘ट्रिकल डाऊन थेयरी कहीं कारगर होती दिखाई नहीं दे रही है।

इतिहासकालीन भारत-
इतिहास काल में भारत की समृद्धि का वर्णन सभी विदेशी यात्रिायों ने अपने-अपने यात्रााव‘तान्तों में किया है। इसीलिए भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। यहाँ के समृद्धि के आकर्षण से ही भारत पर आक्रमणों का दौर निरन्तर चलता रहा। प्रारम्भ ग्रीकों ने किया। तत्पश्चात् हूण, शक, कुशाण,मुगल, तुर्क, पठाण, पोर्तुगीज, फ्रेंच एवं अन्त में अंग्रजों ने भारत की लूट जारी रखी।यदि हम निर्धन होते तो भला कोई क्यों हम पर आक्रमण करता? विकसित देशों का एक संगठन है व्म्ब्क्। उस सúठन ने ई.स. शून्य से ईस. 2000 वर्ष तक का आर्थिक इतिहास लिखकर जालपुटपर (ूमइेपजम) डाला है। उसमें केवल 22 देशों का आर्थिक इतिहास सम्मिलित है, जो इस पूरे काल तक जीवित रहें। उन 22 देशों में ई.स शून्य से ई.स.2000 इस कालखण्ड में सर्वाधिक सकल घरेलू उत्पाद भारत का ही रहा है। इ.स. 1700 में भारत का सकल घरेलु उत्पाद विश्व की तुलना में 40ः था, जो आज किसी भी समृद्ध देश का नहीं है। इसका सीधा अर्थ यहीं निकलता है कि हमारे देश में एक सुदृढ अर्थ व्यवस्था रही होगी, जिसका वर्णन तत्कालीन साहित्य में हमें स्थान स्थान पर मिलता है। उस व्यवस्था का परिशीलन कर यदि उसके कालानुरूप अंशो के आधार पर युगनुकूल नयी व्यवस्था हम बनाते हैं तो उसमें केवल भारत का ही नहीं तो विश्व का कल्याण निहित है।

संस्कृत ही उपाय-
उपर्युक्त उदाहरणों से यह निश्चित रीति से कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए छोड़ी धरोहर वर्तमान युग मे भी उतनी ही उपयोगी है। उस ज्ञान सागर से ज्ञान रूपी अमृत निकालकर हम तो ज्ञान क्षेत्रा में अग्रणी राष्ट्र बन सकते हैं। पश्चिम का ज्ञान हमने सीख ही लिया है। हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा नियुक्त ज्ञान आयोग ने अपने रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि ‘जिस समाज या मानव समूह के पास ज्ञान होगा वहीं विकास करेगा’। यदि यह बात सच है तो हम विश्व में सबसे विकसित समाज बनकर उभरेंगे। इस मार्ग में जो एकमात्रा बाधा है वह है संस्कृत भाषा। जितना शीघ्र हम उस भाषा को सीख पायेंगे उतना ही शीघ्र हम विकास पथ के अग्रणी राष्ट्र बनेंगे। अतः आनेवाले वर्षों में हमारे प्रगति का मूल मन्त्र होगा-
पठतु संस्कृतम्! लिखतु संस्कृतम्!! वदतु संस्कृतम्!!!

Sunday, February 12, 2012

अजर, अमर हम अविनाशी


यूनानी साहित्य में एक मृत्युंजयी पक्षी ‘फीनिक्स’ की चर्चा आती है। उसके बारे में मान्यता है कि अपनी राख में से वह फिर-फिर जीवित हो जाता है।

दुनिया के गत लाखों वर्ष के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो ध्यान में आता है कि भारत वर्ष और हिन्दू समाज भी मृत्युंजयी है। फीनिक्स पक्षी तो काल्पनिक है; पर हिन्दू समाज इस धरा की जीवित-जाग्रत वास्तविकता है। हिन्दुओं पर हजारों आपदाएं आयीं। इससे असीमित धन, जन, भूमि, सत्ता और मान-सम्मान की हानि भी हुई; पर वह फिर उठ खड़ा हुआ। ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’ कहकर हमारे विरोधी भी इसे स्वीकार करते हैं।

उतार-चढ़ाव सृष्टि का सनातन नियम है। दुनिया में जय-पराजय हर देश और समाज को समय-समय पर झेलनी पड़ी हैं। हमारे साथ तो यह कुछ अधिक ही हुआ है; पर हमने एक दिन के लिए भी पराजय को मन से स्वीकार नहीं किया। इतना ही नहीं, तो हमने हजारों वर्ष तक चले संघर्ष में उन अमर बलिदानियों और हुतात्माओं को अपने देश व धर्म के लिए गौरव और प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।

बलिदान की यह परम्परा तब से ही प्रारम्भ हो गयी, जब से शक, हूण, तुर्क, पठान, मुगल आदि विदेशी और विधर्मियों के हमले भारत पर होने लगे। इस्लामी हमलावरों के काल में राजा दाहिरसेन की पुत्रियां सूर्या और परिमल, गुरु अमरदास, गुरु तेगबहादुर और चारों गुरुपुत्र, बन्दा बैरागी, हकीकत राय जैसे हजारों बलिदानियों के प्रेरक प्रसंगों से इतिहास भरा है।

राजस्थानी जौहर की गाथाएं सुनकर किसका मस्तक गर्व से ऊंचा नहीं हो जाता ? उन वीर माताओं ने जान देना स्वीकार किया; पर आन नहीं। अंग्रेजों और पुर्तगालियों ने भी इस बर्बरता को दोहराया। भारत का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां इन्होंने हत्या, अग्निकांड और दुराचार का नंगा नाच न किया हो। गत शती की जलियांवाला बाग (अमृतसर) और मानगढ़ (राजस्थान) जैसे अनेक सामूहिक नरसंहारों की गाथाएं भी लोककथाओं और लोकगीतों में जीवित हैं।

लेकिन इतना सब होने के बाद भी इन बलिदान पर्वों पर हम हर साल काले कपड़े पहनकर छाती नहीं पीटते। उत्सवप्रिय हिन्दू समाज ने इन दुखद प्रसंगों को भी प्रेरणा और गौरव के पर्वों में बदल दिया है। प्रायः हम मेले लगाकर उस दिन को याद करते हैं। जगह-जगह भोजन और शरबत के लंगर तथा सेवा के शिविर लगाकर उन बलिदानियों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं।

हम ‘पुरानी नींव नया निर्माण’ की कहावत के अनुसार पिछली घटनाओं और दुर्घटनाओं से प्रेरणा लेकर आगे देखने में विश्वास रखते हैं। मुस्लिम और ईसाई हमलावरों ने भारत में हजारों मंदिर तोड़े। हमने उनमें से कई को पहले से भी अधिक भव्य रूप में फिर बना लिया। अब हम विध्वंस के बदले उनके पुनर्निमाण के दिन को याद कर उत्सव मनाते हैं।

लेकिन इसके दूसरी ओर अरब जगत को देखें, तो 1400 साल पूर्व हुए एक युद्ध को याद कर, पराजित गुट के अनुयायी आज तक रोते हैं। कुछ लोग उसे भले ही सत्य और असत्य के युद्ध जैसा कोई अच्छा नाम दें; पर वह विशुद्ध सत्ता का संघर्ष था। उसमें एक गुट को हारना ही था। एक गुट ने अपनी कबीलाई बर्बरता दिखाते हुए दूसरे गुट के बड़ों ही नहीं, तो बच्चों को भी तड़पा-तड़पा कर मारा।

पराजित लोग भले ही इसे अमानवीय कहें; पर उनके अपने क्रूर कर्मों से भी इतिहास के लाखों पृष्ठ भरे हैं। बिना बात मरने और निहत्थे-निरपराध लोगों को मारने का उनका स्वभाव आज भी बना है। जेहादी और आत्मघाती हमलों से वे सब कुछ नष्ट करने पर तुले हैं। दुनिया में आतंक का मुख्य कारण यह मानसिकता ही है।

हिन्दुओं की जीवंतता और उत्सवप्रियता पर एक और दृष्टि से विचार करें। ईश्वर एक होने पर भी हिन्दू कण-कण में उसे देखता है। उसकी दृष्टि में पशु, पक्षी, मानव, जलचर, पेड़, पौधे, धरती, जल, वायु, अग्नि, आकाश..सबमें भगवान है। हम हजारों पंथ, मत, सम्प्रदाय और देवी-देवताओं को मानते हैं। ईश्वर अजन्मा, अजर और अमर है; पर उसके कई अवतारों ने अपनी लीलाओं से इस धरा को पवित्र किया है। हम इन सब रूपों की पूजा करते हैं।

अवधबिहारी श्रीराम और मथुरानंदन श्रीकृष्ण के बालरूप की महिमा सुनने और गाने में किसे आनंद नहीं आता ? जब तुलसीदास ठुमक चलत रामचंद्र, बाजत पैंजनिया गाते हैं, तो सबका मन श्रीराम को गोद में उठाकर दुलारने का हो उठता है। धनुष यज्ञ से पूर्व राजा जनक और जानकी के मन का असमंजस हर व्यक्ति को अपना सा लगता है। जब श्रीराम अपनी प्राणप्रिया के वियोग में रोते हुए वन-वन भटकते हैं, तो सबकी आंखों में आंसू आ जाते हैं।

इसी प्रकार जब सूरदास यशोदा हरि पालने झुलावे गाते हैं, तो बच्चे से लेकर बूढ़े तक बालकृष्ण के पालने की डोरी में हाथ लगाकर उन्हें सुलाने का श्रेय लेने को उमग उठते हैं। जब यशोदा कृष्ण को ऊखल से बांधती है, तो सबके मन में कृष्ण के प्रति करुणा उत्पन्न हो जाती है। कंस का वध करते समय और महाभारत में गीता सुनाते समय श्रीकृष्ण सबको गौरव से भर देते हैं।

हमारे भगवान का क्या कहना ? वे हंसते हैं, तो रोते भी हैं। वे नाचते हैं, तो गाते भी हैं। घर में बच्चों की बालसुलभ शरारतों को देखकर हम भगवान को तथा मंदिर में बाल भगवान की मूर्ति देखकर अपने बच्चों को याद कर लेते हैं। भगवान के कण-कण और हर प्राणी में विद्यमान होने का यही तो अर्थ है। कीर्तन करते हुए तेरा-मेरा का भेद मिटाकर भक्त और भगवान एकरूप हो जाते हैं।

दूसरी ओर ईसा मसीह या इस्लाम के पैगम्बर के सौम्य रूप की चर्चा प्रायः कहीं नहीं है। ईसा मसीह का सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्र वही है, जिसमें वे रक्तरंजित अवस्था में सूली पर लटके हैं। इस्लाम के पैगम्बर का जीवन तो युद्धों में ही बीता। इसीलिए मुसलमान चाहे जिस देश में हों, किसी न किसी से लड़ ही रहे हैं। दूसरे नहीं मिलते, तो वे आपस में ही लड़ते हैं।

गत 2,000 साल का अनुभव बताता है कि किसी नगर, गांव या कबीले पर कब्जे के लिए हुआ आपसी संघर्ष; या मृत्युदंड पाये, सलीब पर लटके ईसा मसीह किसी को सत्य, अहिंसा और प्रेम की शिक्षा नहीं दे सकते। इसलिए इन दोनों मजहबों के अनुयायी अपने जन्मकाल से ही दुनिया के अधिकाधिक जन, धन और भूमि पर कब्जा करने के लिए लड़ रहे हैं। विश्व में अशांति का यही कारण है।

क्या यह कटु सत्य नहीं है कि किसी इस्लामी देश में लोकतंत्र नहीं है। कुछ स्थानों पर वह दिखावे के लिए है; पर वहां कब सेना या तालिबानी हावी हो जाएं, कहना कठिन है। अपनी वैचारिक असफलता को छिपाने के लिए वहां मरने और मारने का खुला खेल जारी है। कौन, कब, किसे मार दे; कुछ पता नहीं। पिछले दिनों कई इस्लामी देशों में तानाशाही सत्ता के विरुद्ध विद्रोह हुआ है; पर वह भी किसी सार्थक निष्कर्ष पर पहुँचता नजर नहीं आता।

अधिकांश ईसाई देशों में लोकतंत्र है; पर इसकी आड़ में द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व ब्रिटेन और अब अमरीका पूरी दुनिया को लूटने और बरबाद करने पर तुला है। वे अपने धन और शस्त्रों के बल पर भले ही दुनिया को दबा कर रखें; पर यह भी सत्य है कि वहां चर्च बिक रहे हैं। चर्च में जाने वालों की संख्या लगातार घट रही है। इस कमी को वे अपने धनबल से भारत जैसे देशों में मतान्तरण द्वारा पूरा करना चाहते हैं।

चर्च के बंधन टूटने से वहां सब मर्यादाएं मिट रही हैं। परिवार व्यवस्था के बाद अब विवाह व्यवस्था भी समाप्त होने को है। ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के नाम पर खुला व्यभिचार चल रहा है। बुढ़ापे में देखरेख की जिम्मेदारी जब शासन की है, तो बच्चे क्यों पैदा करें ? इस सोच से ईसाई देशों की जनसंख्या घट रही है। इससे चिंतित होकर अब वे अधिक बच्चे पैदा करने वाले दम्पतियों को पुरस्कृत करने लगे हैं। केरल का चर्च भी इसी दिशा चल रहा है।

मिशनरी और पादरी चाहे कुछ भी कहें; पर सलीब पर लटका, ईश्वर का तथाकथित पुत्र, युवा वर्ग की मानसिक और आत्मिक भूख अब शांत नहीं करता। इसके बदले हंसता-खेलता, रोता-लड़ता और शरारत करता बालकृष्ण उन्हें अच्छा लगता है। इसलिए पश्चिमी देशों में ‘हरे कृष्ण आंदोलन’ बहुत लोकप्रिय हो रहा है। हर नगर में कीर्तन करते, धोती पहने गौरांग लोग, भाव विभोर होकर नाचते नजर आते हैं। रूस में गीता के विरोध का कारण भी यही है।

हिन्दू धर्म की विशेषता उसका लचीलापन है। हमने देश, काल, और परिस्थिति के अनुसार स्वयं को बदला और सुधारा है; पर मजहबवादी आज भी लकीर के फकीर बने हैं। किसी ने कहा है - झुकेगा वही, जिसमें कुछ जान है, अकड़ खास मुर्दे की पहचान है।।

हम जीवन को याद रखते हैं, मृत्यु को नहीं। हम बलिदान को याद रखते हैं, सत्ता के बर्बर संघर्ष में हुई मौतों को नहीं। हम ‘जियो और जीने दो’ के पुजारी हैं, ‘मारो और मरो’ के नहीं। जो जीवन की पूजा करते हैं, वे कभी मरेंगे नहीं। भले ही कालक्रम में उन्हें कुछ सौ या हजार साल पराजय और गुलामी का दंश झेलना पड़े। जो मृत्यु के पुजारी हैं, वे मिट कर ही रहेंगे। भले ही वे कुछ सौ या हजार साल जीतते हुए दिखाई दें।

सृष्टि का यह सनातन नियम है। इसीलिए हम अजर, अमर और अविनाशी हैं। ऐसे संकट पहले भी आये हैं, जिन्हें हमने हर बार कुचला है। इस बार भी ऐसा ही होगा। बस, आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दू धर्म की जिन विशेषताओं की चर्चा हम मुंह से करते हैं, अपने धर्मग्रन्थों से प्रेम और सामाजिक समरसता के जो उद्धरण हम प्रायः देते हैं, उन्हें व्यवहार में लाना प्रारम्भ कर दें।
(लेखक : ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक के पूर्व सहायक सम्पादक हैं)