Monday, January 16, 2012

बहराइच के गाजी बाबा की मजार का सच



 बहराइच में हिन्दू एक आक्रान्ता की कबर पर सर झुकाते हैं !!

जैसा कि पहले भी कई बार कहा जा चुका है कि वामपंथियों और कांग्रेसियों ने भारत के गौरवशाली हिन्दू इतिहास को शर्मनाक बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है… क्रूर, अत्याचारी और अनाचारी मुगल शासकों के गुणगान करने में इन लोगों को आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। लेकिन यह मामला उससे भी बढ़कर है, एक मुगल आक्रांता, जो कि समूचे भारत को “दारुल-इस्लाम” बनाने का सपना देखता था, की कब्र को दरगाह के रूप में अंधविश्वास और भेड़चाल के साथ नवाज़ा जाता है, लेकिन इतिहास को सुधार कर देश में आत्मगौरव निर्माण करने की बजाय हमारे महान इतिहासकार इस पर मौन हैं।मुझे यकीन है कि अधिकतर पाठकों ने सुल्तान सैयद सालार मसूद गाज़ी के बारे में नहीं सुना होगा, यहाँ तक कि बहराइच (उत्तरप्रदेश) में रहने वालों को भी इसके बारे में शायद ठीक-ठीक पता न होगा। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं बहराइच (उत्तरप्रदेश) में “दरगाह शरीफ़”(???) पर प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के पहले रविवार को लगने वाले सालाना उर्स के बारे में…। बहराइच शहर से 3 किमी दूर सैयद सालार मसूद गाज़ी की दरगाह स्थित है, ऐसी मान्यता है(?) कि मज़ार-ए-शरीफ़ में स्नान करने से बीमारियाँ दूर हो जाती हैं (http://behraich.nic.in/) और अंधविश्वास के मारे लाखों लोग यहाँ आते हैं। सैयद सालार मसूद गाज़ी कौन था, उसकी कब्र “दरगाह” में कैसे तब्दील हो गई आदि के बारे में आगे जानेंगे ही, पहले “बहराइच” के बारे में संक्षिप्त में जान लें – यह इलाका “गन्धर्व वन” के रूप में प्राचीन वेदों में वर्णित है, ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने ॠषियों की तपस्या के लिये यहाँ एक घने जंगल का निर्माण किया था, जिसके कारण इसका नाम पड़ा “ब्रह्माइच”, जो कालांतर में भ्रष्ट होते-होते बहराइच बन गया।

महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुगल आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 16 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में लगवाया। इसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही रिश्तेदार था सैयद सालार मसूद यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद एक सनकी किस्म का धर्मान्ध मुगल आक्रान्ता था। महमूद गजनवी तो बार-बार भारत आता था सिर्फ़ लूटने के लिये और वापस चला जाता था, लेकिन इस बार सैयद सालार मसूद भारत में विशाल सेना लेकर आया था कि वह इस भूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहेगा और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करेगा (जाहिर है कि तलवार के बल पर)।सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया। मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद कहा जा सकता है, जहाँ कोई मुगल आक्रांता सिर्फ़ लूटने की नीयत से नहीं बल्कि बसने, राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर आया था। पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं(?) को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई। इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है। इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें 17 राजा सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई। जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये अथवा उसे एक भयानक युद्ध झेलना पड़ेगा। गाज़ी मसूद का जवाब भी वही आया जो कि अपेक्षित था, उसने कहा कि “इस धरती की सारी ज़मीन खुदा की है, और वह जहाँ चाहे वहाँ रह सकता है… यह उसका धार्मिक कर्तव्य है कि वह सभी को इस्लाम का अनुयायी बनाये और जो खुदा को नहीं मानते उन्हें काफ़िर माना जाये…”।उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी। इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे। यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ। बहराइच के नज़दीक इसी मुगल आक्रांता सैयद सालार मसूद (तथाकथित गाज़ी बाबा) की कब्र बनी। जब फ़िरोज़शाह तुगलक का शासन समूचे इलाके में पुनर्स्थापित हुआ तब वह बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा”(?) के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था। मुगल काल में धीरे-धीरे यह किंवदंती का रूप लेता गया और कालान्तर में सभी लोगों ने इस “गाज़ी बाबा” को “पहुँचा हुआ पीर” मान लिया तथा उसकी दरगाह पर प्रतिवर्ष एक “उर्स” का आयोजन होने लगा, जो कि आज भी जारी है। इस समूचे घटनाक्रम को यदि ध्यान से देखा जाये तो कुछ बातें मुख्य रूप से स्पष्ट होती हैं-(1) महमूद गजनवी के इतने आक्रमणों के बावजूद हिन्दुओं के पहली बार संगठित होते ही एक क्रूर मुगल आक्रांता को बुरी तरह से हराया गया (अर्थात यदि हिन्दू संगठित हो जायें तो उन्हें कोई रोक नहीं सकता)(2) एक मुगल आक्रांता जो भारत को इस्लामी देश बनाने का सपना देखता था, आज की तारीख में एक “पीर-शहीद” का दर्जा पाये हुए है और दुष्प्रचार के प्रभाव में आकर मूर्ख हिन्दू उसकी मज़ार पर जाकर मत्था टेक रहे हैं।(3) एक इतना बड़ा तथ्य कि महमूद गजनवी के एक प्रमुख रिश्तेदार को भारत की भूमि पर समाप्त किया गया, इतिहास की पुस्तकों में सिरे से ही गायब है।जो कुछ भी उपलब्ध है इंटरनेट पर ही है, इस सम्बन्ध में रोमिला थापर की पुस्तक “Dargah of Ghazi in Bahraich” में उल्लेख हैएन्ना सुवोरोवा की एक और पुस्तक “Muslim Saints of South Asia” में भी इसका उल्लेख मिलता है,जो मूर्ख हिन्दू उस दरगाह पर जाकर अभी भी स्वास्थ्य और शारीरिक तकलीफ़ों सम्बन्धी तथा अन्य दुआएं मांगते हैं उनकी खिल्ली स्वयं “तुलसीदास” भी उड़ा चुके हैं। चूंकि मुगल शासनकाल होने के कारण तुलसीदास ने मुस्लिम आक्रांताओं के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा है, लेकिन फ़िर भी बहराइच में जारी इस “भेड़िया धसान” (भेड़चाल) के बारे में वे अपनी “दोहावली” में कहते हैं –लही आँखि कब आँधरे, बाँझ पूत कब ल्याइ ।कब कोढ़ी काया लही, जग बहराइच जाइ॥अर्थात “पता नहीं कब किस अंधे को आँख मिली, पता नहीं कब किसी बाँझ को पुत्र हुआ, पता नहीं कब किसी कोढ़ी की काया निखरी, लेकिन फ़िर भी लोग बहराइच क्यों जाते हैं…” 

“लाल” इतिहासकारों और धूर्त तथा स्वार्थी कांग्रेसियों ने हमेशा भारत की जनता को उनके गौरवपूर्ण इतिहास से महरूम रखने का प्रयोजन किया हुआ है। इनका साथ देने के लिये “सेकुलर” नाम की घृणित कौम भी इनके पीछे हमेशा रही है। भारत के इतिहास को छेड़छाड़ करके मनमाने और षडयन्त्रपूर्ण तरीके से अंग्रेजों और मुगलों को श्रेष्ठ बताया गया है और हिन्दू राजाओं का या तो उल्लेख ही नहीं है और यदि है भी तो दमित-कुचले और हारे हुए के रूप में। आखिर इस विकृति के सुधार का उपाय क्या है…? जवाब बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात तो तय है कि इतने लम्बे समय तक हिन्दू कौम का “ब्रेनवॉश” किया गया है, तो दिमागों से यह गंदगी साफ़ करने में समय तो लगेगा ही। इसके लिये शिक्षण पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे। “मैकाले की अवैध संतानों” को बाहर का रास्ता दिखाना होगा, यह एक धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है। हालांकि संतोष का विषय यह है कि इंटरनेट नामक हथियार युवाओं में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है, युवाओं में “हिन्दू भावनाओं” का उभार हो रहा है, उनमें अपने सही इतिहास को जानने की भूख है। आज का युवा काफ़ी समझदार है, वह देख रहा है कि भारत के आसपास क्या हो रहा है, वह जानता है कि भारत में कितनी अन्दरूनी शक्ति है, लेकिन जब वह “सेकुलरवादियों”, कांग्रेसियों और वामपंथियों के ढोंग भरे प्रवचन और उलटबाँसियाँ सुनता है तो उसे उबकाई आने लगती है, इन युवाओं (17 से 23 वर्ष आयु समूह) को भारत के गौरवशाली पृष्ठभूमि का ज्ञान करवाना चाहिये। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि भले ही वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नौकर बनें, लेकिन उन्हें किसी से “दबकर” रहने या अपने धर्म और हिन्दुत्व को लेकर किसी शर्मिन्दगी का अहसास करने की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन हिन्दू संगठित होकर प्रतिकार करने लगेंगे, एक “हिन्दू वोट बैंक” की तरह चुनाव में वोटिंग करने लगेंगे, उस दिन ये “सेकुलर” नामक रीढ़विहीन प्राणी देखते-देखते गायब हो जायेगा। हमें प्रत्येक दुष्प्रचार का जवाब खुलकर देना चाहिये, वरना हो सकता है कि किसी दिन एकाध “गधे की दरगाह” पर भी हिन्दू सिर झुकाते हुए मिलें…
संदर्भ : http://jayshah.net/archives/163

Sunday, January 15, 2012

डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी (राष्ट्र एवं धर्मप्रेमी योद्धा )


वर्तमानमें इस देशपर राष्ट्रघाती एवं भ्रष्टाचारी राज्य कर रहे हैं । ऐसे राष्ट्रघाती एवं भ्रष्टाचारियोंको सत्तासे हटाकर राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमियोंको सत्ता सौंपना आवश्यक है । आज देशकी १२० करोड जनतामें राष्ट्र एवं धर्मप्रमी कितने एवं कहां है, ऐसा प्रश्न जनताके मनमें आना स्वाभाविक है । ज्येष्ठ समाजसेवक श्री. अण्णा हजारे एवं योगऋषि रामदेवबाबा दोनों उनके संगठनद्वारा राष्ट्रका एवं कुछ मात्रामें धर्मका कार्य कर रहे हैं । इस समय राष्ट्र एवं धर्मका वैध मार्गसे अकेले सिपाहीके समान विगत ४०वर्षोंसे कार्य करनेवाले एक नामकी उपेक्षा हो रही है । वह नाम है जनता पक्षके अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामीका !
लोकनायक जयप्रकाश नारायणकी प्रेरणासे डॉ. स्वामीने राष्ट्रकार्यमें स्वयंको समर्पित किया । उनकी प्रेरणासे ही वे कभी जय-पराजयसे निराश नहीं हुए एवं उन्होंने संघर्ष जारी रखा । उन्होंने संघर्षके अच्छे-बुरे प्रभाव पर भी ध्यान नहीं दिया । डॉ. स्वामीके गुरु कांची कामकोटी पीठके शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती (वर्तमान समयके शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वतीके गुरु) के आशिर्वाद एवं  जयप्रकाश नारायणद्वारा किएर्भयतासे खडे होकर बोल पा रहे हैं । ऐसे राष्ट्र एवं धर्मके लिए कार्यरत निर्भय व्यक्तित्वके विभिन्न पहलु देखें -

जन्म एवं बाल्यावस्था

अ. बाल्यावस्थासे ही राजनीतिज्ञोंसे संबंध : डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामीका जन्म १५ सितंबर १९३९ को चेन्नईके मायलापूर नामक सांस्कृतिक शहरमें हुआ । उनके पिता सीताराम सुब्रह्मण्यम भारतीय प्रशासकीय अधिकारी थे । वे भारत शासनके ‘सचिव’ पदसे निवृत्त हुए । उनकी मां केरलके एक सुसंस्कृत तामिल घरानेसे थी । सीताराम सुब्रह्मण्यम शासकीय सेवामें होनेके कारण डॉ.स्वामीकी शिक्षा राजधानी दिल्लीमें संपन्न हुई । डॉ. स्वामीके पिताके सत्यमूर्र्ति, थिरू कामराज इत्यादि बडे राजनीतिज्ञोंसे निकटवर्ती संबंध थे, तथा वरिष्ठ शासकीय अधिकारी होनेके कारण शासनद्वारा उन्हें दिल्लीके ‘राजेंद्र प्रसाद मार्ग’ पर शासकीय निवास प्रदान किया गया था । यहां बिहारके संसद सदस्य शामानंदन सहाय, भूतपूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम इत्यादि बडे राजनेताओं निवासस्थान होनेके कारणे उनका एवं डॉ. स्वामीके पिताका एक दूसरेके यहां आना-जाना था ।
आ. शंकानिरसन न होनेसे यज्ञोपवीत धारण करनेसे मना किया : एक बार जगजीवन रामने डॉ. स्वामीसे प्रश्न किया कि आप ब्र्राह्मण होकर आपके गलेमें यज्ञोपवीत क्यों नहीं है ?’’ इसपर डॉ. स्वामीने बताया कि ७ वर्षकी आयुमें उनका उपनयन संस्कार किया जा रहा था । उस समय जिज्ञासू वृत्तिसे उन्होंने पंडितसे प्रश्न किया कि उनके वर्गमित्र यज्ञोपवीत (जनेऊ) नहीं धारण करते फिर वे क्यों धारण करें ? पंडितके उत्तरसे उन्हें संतुष्टि नहीं हुई । उन्होंने पंडितसे अनेक प्रश्न पूछे, जिससे घरमें सब लोग अस्वस्थ हो गए तथा उनके पिताजीने वह विधि ही निरस्त किया । इससे मां दुखी थी; परंतु डॉ.स्वामीने ठान लिया था कि जबतक उनके प्रश्नोंका पंडितसे संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, वे यज्ञोपवीत धारण नहीं करेंगे । इस उत्तरसे जगजीवन राम अत्यधिक प्रभावित हुए । (तत्पश्चात् डॉ.स्वामीके गुरु शंकराचार्य श्री चंद्रशेखरेंद्र सरस्वतीने अच्छा मुहूर्त देखकर यह विधि करवा लिया एवं आध्यात्मिक विधिमें यज्ञोपवीतका शास्त्र एवं महत्त्व बताया ।)

शिक्षा

अ. उच्चविद्याविभूषित डॉ. स्वामी : डॉ. स्वामीने दिल्ली विश्वविद्यालयमें हिंदु महाविद्यालयसे गणित विषयमें उपाधि प्राप्त की । तत्पश्चात् उन्होंने कोलकाताके इंडियन स्टॅटिस्टिकल इंन्स्टिट्यूट (भारतीय सांख्यिकी संस्था) से सांख्यिकी विषयमें उच्च उपाधि प्राप्त की । वहां पढते समय डॉ. स्वामीने भारतीय सांख्यिकी संस्थाके संचालक प्रसंत महालनोबीसद्वारा किए गए अन्वेषणको आवाहन किया था । उनके शैक्षणिक प्राविण्यसे प्रभावित होकर इंग्लैंडके विश्वविख्यात हॉवर्ड विश्वविद्यालयद्वारा उन्हें अन्वेषण करने हेतु आमंत्रित किया गया ।


आ. नोबल पारितोषिक प्राप्त विद्वानोंके साथ अन्वेषण : हॉवर्ड शैक्षणिक संस्थामें पढते हुए डॉ. स्वामीने नोबेल विजेता सायमन कुझनेटस एवं नोबेल विजेता पॉल स्यामूल्सन इन विद्वानोंके साथ काम किया । डॉ. स्वामीने १९६४ में अर्थशास्त्र विषयमें केवल १८ महिनेमें ‘डॉक्टरेट’की उपाधि प्राप्त की ।

शैक्षणिक क्षेत्रमें कार्य

अ. विदेशी एवं देशी शिक्षा संस्थाओंमें प्राध्यापकी : हॉवर्डमें अर्थशास्त्र विषयमें डॉक्टरेट प्राप्त करनेपर वहींपर अर्थशास्त्र पढानेके लिए उन्हें सहायक प्राध्यापक पदपर नियुक्त किया गया । डॉ. स्वामीने हॉवर्डमें १० वर्ष अलग-अलग कालावधिमें प्राध्यापकके रूपमें काम किया । अभी भी वे हॉवर्डके ग्रीष्मकालीन सत्रमें अर्थशास्त्र पढानेके लिए जाते हैं । उन्होंने १९६९-१९९१ इस कालावधिमें भारतीय तंत्रज्ञान संस्था दिल्ली (आय.आय.टी.) में अर्थशास्त्रके पूर्णकालीन प्राध्यापकके रूपमें कार्य किया । १९७० में इंदिरा गांधीने डॉ. स्वामीको बलपूर्वक एवं अवैधानिक रूपसे प्राध्यापक पदसे निष्कासित कर दिया । १९८० में सर्वोच्च न्यायालयद्वारा डॉ.स्वामी पुनः प्राध्यापकके पदपर नियुक्त किए गए । १९९१ मेंउन्होंने वेंâद्रीय मंत्रीपद विभूषित करने हेतु प्राध्यापक पदसे त्यागपत्र दिया । डॉ. स्वामीने १९७७ से १९८० के मध्य ‘भारतीय तंत्रज्ञान संस्था दिल्ली’ शैक्षणिक संस्थाके संचालक मंडलमें कार्य किया । उसी प्रकार १९८० से १९८२ तक भारतीय तंत्रज्ञान संस्थाके परिषदमें काम किया है । वर्तमान समयमें वे केरलमें संचार एवं व्यवस्थापन व्यापार संस्था नामक शिक्षा संस्थाके संचालक हैं ।
आ. डॉ. स्वामीके अर्थविषयक संकल्पनासे भारतीय अर्थव्यवस्थाकी पुनर्रचना : डॉ. स्वामीने हॉवर्ड एवं भारतमें किए गए अन्वेषणके कारण वे विश्वविख्यात अर्थतज्ञके रूपमें जाने गए । डॉ. स्वामीने उनके ‘भारतीय आर्थिक नियोजन - एक वैकल्पिक दृष्टिकोण’ (इंडियन इकॅनॉमिक प्लानिंग, अ‍ॅन अल्टरनेटिव्ह अप्रोच ) नामक प्रथम पुस्तकमें भारतीय अर्थव्यवस्थाके लिए एक स्पष्ट पर्याय प्रस्तुत किया था । उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीने लोकसभामें अर्थसंकल्पीय अधिवेशनमें प्रश्नोत्तरकी कालावधिमें इस पुस्तकमें प्रस्तुत संकल्पनाका विरोध करनेका निर्णय लेकर पुस्तककी समीक्षा की । (तदुपरांत १९९० में डॉ. स्वामीद्वारा प्रस्तुत की गई संकल्पनासे भारतीय अर्थव्यवस्थाकी पुनर्रचना की गई एवं भारतीय अर्थव्यवस्था विकसित हुई ।)
इ. पुस्तक एवं शोधप्रबंधको वैश्विक प्रसिद्धि : ‘शिकागो विश्वविद्यालय समाचार संस्थाद्वारा १९७३ में ‘भारत एवं चीन १९५२-१९७० आर्थिक विकास : एक तुलनात्मक मूल्यांकन’ इस डॉ. स्वामीद्वारा प्रकाशित शोधप्रबंधकी पूरे विश्वके अर्थतज्ञोंद्वारा प्रशंसा की गई । डॉ. स्वामी एवं आधुनिक अर्थशास्त्रके जनक पॉल स्यामूल्सनने मिलकर ‘थेअरी ऑफ इंडेक्स नंबर्स (सूचकांक संख्या सिद्धांत)’ इस विषयपर लिखा हुआ शोधनिबंध अमेरिकन इकॉनॉमिक रिव्हाइव्ह (१९७४) एवं रॉयल इकॉनॉमिक सोसायटीकी आर्थिक पत्रिका (१९८४) ने प्रकाशित किया था । डॉ. स्वामीका यह अभूतपूर्व प्रबंध विश्वमें एक नए आर्थिक सिद्धांतके रूपमें मान्य हुआ । डॉ. स्वामीद्वारा भारत एवं चीनके परमाणु संबंधपर लिखी गई ‘भारत एवं चीन : एक तुलनात्मक मूल्यांकन’ यह दूसरी पुस्तक विकास प्रकाशन संस्थाद्वारा प्रकाशित की गई है ।
ई. डॉ. स्वामीकी नोबल पारितोषिक प्राप्त करनेकी पात्रता : विश्वविख्यात विश्वविद्यालय 'हॉवर्ड'में डॉ. स्वामीने नोबेल विजेता सायमन कुझनेटस एवं पॉल स्यामूल्सन इन विद्वानोंके साथ काम किया । डॉ. स्वामी अर्थशास्त्रके प्राध्यापक थे, तब दोनों विद्वानोंने ऐसा कहा था कि यदि डॉ. स्वामीने इससे पूर्व प्रसिद्धि प्राप्त सूचकांक संख्या सिद्धांत (थिअरी ऑफ इंडेक्स नंबर्स) विषयपर इसी प्रकार अन्वेषण जारी रखा, तो उन्हें भी नोबेल पारितोषक निश्चित मिलेगा ।

राज्यकालका प्रारंभ

अ. लोकनायक जयप्रकाश नारायणकी भेंटसे जीवनमें परिवर्तन : लोकनायक जयप्रकाश नारायणके साथ हॉवर्डमें हुई अभूतपूर्व भेंटसे डॉ. स्वामीका जीवन परिवर्तित हो गया एवं वे शिक्षा जगतसे राजनीतिकी ओर मुडे । जयप्रकाश नारायणकी भेंट होनेके पश्चात् डॉ. स्वामी राजनीतिक क्षेत्रमें ध्येय प्राप्तिकी भावनासे प्रेरित हुए एवं उसपर उन्होंने ध्यान केंद्रित किया ।
आ. जनता पक्षके संस्थापक सदस्य : १९७० में इंदिरा गांधी साम्यवादी विचारधाराके लोगोंसे प्रभावित हुर्इं एवं तानाशाही करने लगी । उस समय दिल्लीके भारतीय तंत्रज्ञान संस्थामें अर्थशास्त्रके पूर्णकालीन प्राध्यापक डॉ. स्वामीको साम्यवादी विचारधाराके लोगोंद्वारा डाले गए दबावके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीने अवैधानिक रूपसे अपनी सत्ताका दुरुपयोगकर प्राध्यापक पदसे उन्हें हटा दिया । डॉ. स्वामीने इंदिरा गांधीकी इस तानाशाहीका सभी प्रकारसे विरोध करनेका निश्चय किया । १९७६ में इंदिरा गांधीद्वारा लगाए गए आपातकालके कारण राजनीतिमें परिवर्तन लानेका डॉ. स्वामीने निश्चय किया । यहींसे डॉ. स्वामीकी राजनीति वास्तविक रूपसे प्रारंभ हुई । तत्पश्चात् वे जनता पक्षके संस्थापक बने । आज डॉ. स्वामी भारतीय लोकतंत्रके इतिहासमें आमूल परिवर्तन लानेवाले जनता पक्षके अध्यक्ष हैं ।

डॉ. स्वामीद्वारा आपातकालमें किया गया कार्य

अ. विदेशमें जाकर आपातकालका विरोध :१९७६ में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकालमें डॉ. स्वामीका साहसी विदेशगमन, वहांसे वापस आनेपर संसदमें उनकी नाटकीय उपस्थिति, वहांसे सुरक्षित रूपसे स्वयंको मुक्त कर पुनः विदेशगमन करनेके कारण अत्यधिक विख्यात हुए । पुलिसद्वारा फरार (मोस्ट वाँटेड) घोषित करनेपर भी डॉ. स्वामी सुरक्षित रूपसे विदेश जानेमें सफल हुए । वहां उन्होंने अनिवासी भारतियोंका संगठन कर ‘फ्रेंड ऑफ इंडिया’ (भारतके परदेशमें स्थित मित्र) नामक संगठन स्थापित कर आपातकालका विदेशसे विरोध किया ।


आ. विदेशी समाचारपत्रों द्वारा हस्तक्षेप  : डॉ. स्वामीके इस क्रांतिकारक कार्यपर पूरे विश्वके समाचार पत्रोंने ध्यान दिया एवं भारतके सभी स्तरके लोगोंने उनकी प्रशंसा की । अमेरिकाके ‘वॉशिंग्टन पोस्ट’ इस
समाचारपत्रद्वारा ‘आपातकाल एक मजाक बन गया है’, ऐसा समाचार प्रकाशित किया गया था । इस घटनासे इंदिरा गांधीको कुछ महीनोंमें सार्वजनिक चुनाव घोषित करने पडे एवं उसमें वे पराजित हुर्इं ।

डॉ. स्वामी : एक उत्कृष्ट प्रशासक

अ. विभिन्न मतदानकेंद्रसे ५ बार निर्वाचित होनेवाले प्रथम संसद सदस्य : सर्वप्रथम डॉ. स्वामी जनसंघसे १९७४ में उत्तरप्रदेश राज्यसभामें चुनकर आए । आपातकालके पश्चात् १९७७ में एवं तत्पश्चात् पुनः हुए चुनावमें डॉ. स्वामी मुंबईके उत्तर-पूर्व (घाटकोपर) मतदानकेंद्रसे दो बार निरंतर चुने गए । उन्होंने मतदानवेंâद्रके विकासके लिए विभिन्न कार्य एवं जनसम्पर्क किए, जिसके कारण अबतक लोग उनका स्मरण करते हैं । १९८८ से १९९४ इन ६ वर्षोंकी कालावधिमें उन्होंने राज्यसभामें उत्तरप्रदेश मतदानवेंâद्रका प्रतिनिधित्व किया । मार्च १९९८ में वे तामिलनाडूके मदुराई मतदानकेंद्रसे लोकसभाके चुनावमें चुनकर आए । इस प्रकार ५ बार विभिन्न मतदानवेंâद्रोंसे चुनकर आनेवाले प्रथम लोकप्रतिनिधि हुए ।
आ. एल.टी.टी.ईका बंदोबस्त करना : १९९०-९१ में प्रधानमंत्री चंद्रशेखरके मंत्रीमंडलमें कानूनमंत्रीके पदका कार्यभार संभालते हुए तामिलनाडूके एल.टी.टी.ई (लिबरेशन टायगर्स आर्पâ तमिल ईलम) इस आतंकवादी संगठनको जडसे उखाडने हेतु उन्होंने सेनाका उपयोग किया, जिससे तामिलनाडूमें ‘भारतका एक संरक्षक’ के रुपमें उनकी छवि निर्माण हुई ।
इ. विभिन्न देशोंसे ऐतिहासिक व्यावसायिक अनुबंध करना : डॉ. स्वामीके मंत्रीपदके कार्यकालमें उन्होंने चीन, अफगानिस्तान एवं पोलेंड इत्यादि देशोंसे ऐतिहासिक व्यापारी अनुबंध किए ।
ई. सत्ताधारी कांग्रेस पक्षद्वारा विरोधी पक्षके डॉ. स्वामीको केबिनेट मंत्रीका स्तर दिया जाना : १९९४ में तत्कालीन पंतप्रधान पी.व्ही.नरसिंह रावद्वारा डॉ. स्वामीकी ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं कामगार नीति आयोग’के संचालक पदपर नियुक्ति की गई । भारतके इतिहासकी यह प्रथम घटना थी कि एक सत्ताधारी पक्षद्वारा विरोधी पक्षके नेताको केंद्रीय मंत्रीका स्तर दिया गया । इससे डॉ. स्वामीकी कुशलता स्पष्ट होती है । इस पदपर काम करते समय डॉ. स्वामीने कामगारों तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमोंमें अत्यधिक सुधार किए, जिससे भारतके निर्यात क्षेत्रको भारी मात्रामें लाभ हुआ ।
उ. भारतके अंतर्राष्ट्रीय संबंध सुधारनेमें डॉ. स्वामीका योगदान : १९७८ से १९८५ में भारतकी चीनके साथ विदेश नीति पुनर्गठित करनेका महान कार्य डॉ. स्वामीने किया । उनके अथक प्रयासोंके कारण भारतकी चीनके साथ विदेश नीति एक शत्रुराष्ट्रसे एक साधारण पडोसी राष्ट्रमें रूपांतरित हुई एवं दोनों देशोंद्वारा इसका पूरा श्रेय डॉ. स्वामीको दिया गया । १९७८ से १९९८ इस कालावधिमें डॉ. स्वामीने कुल ७ बार विभिन्न राजनीतिक संबंध स्थापित करने हेतु चीनको भेंट दी ।
ऊ. चीन एवं इस्राईल देशोंको अधिकृत भेंट देनेवाले प्रथम राजकीय नेता : तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाईके सहकार्यसे डॉ. स्वामी चीन एवं इस्राईल देशोंको भेंट देनेवाले प्रथम भारतीय नेता सिद्ध हुए । १९८२ में इस्राईल देशमें सार्वजनिक रूपसे यात्रा करनेवाले प्रथम भारतीय राजनेता थे । इस्राईलमें उन्होंने रॉबिन, तत्कालीन पंतप्रधान मेनाचीन बेगीं एवं अनेक महत्त्वपूर्ण राजनेताओंसे भेंट की जिसके परिणामस्वरूप दोनों देशोंद्वारा एक- दूसरेके देशमें दूतावास आरंभ हुए एवं मित्रताके सबंध स्थापित हुए ।
ए. विदेशनीतिपर लेखन करना : दक्षिण अफ्रीका, इंग्लेंड, पोलेंड, नामिबिया, चीन, इस्राईल इत्यादि अनेक देशोंके साथ मित्रताके सबंध स्थापित करनेमें डॉ. स्वामीका महत्त्वपूर्ण योगदान है । डॉ. स्वामीने भारत-चीन, भारत-पाकिस्तान, भारत-इस्राईल आदि देशोंके साथ विदेशनीतिपर अत्यधिक लेखन भी किया है ।
ऐ. संयुक्त राष्ट्रके लिए भी कार्य : नवंबर १९७८ में ‘विकसित देशोंमें आर्थिक सहकार्य’ पर प्रतिवेदन बनाने हेतु संयुक्त राष्ट्रद्वारा गठित समूहके वे सदस्य थे । १९६३ के पूर्वार्धमें डॉ. स्वामीने संयुक्त राष्ट्रके अमेरिकाके मुख्यालयमें ‘सहायक अर्थशास्त्रज्ञ अधिकारी’ पदपर कार्य किया है ।

सोनिया गांधीका प्रधानमंत्री न बनने का सही कारण है - डॉ. स्वामी

२००४ के चुनावमें कांग्रेस पक्ष बहुमतसे चु    नके आनेपर १७ मे २००४ को सायं. ५ बजे सोनिया गांधी सरकार बनाकर स्वयं प्रधानमंत्री बननेवाली थी; परंतु भारतके तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलामने एक कानून बताकर सोनिया गांधीको सरकार बनानेसे रोका । उस कानूनके पिछे थे डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी !

भारतीय नागरी कानूनद्वारा विरोध !

डॉ. स्वामीने १५ मई २००४ में राष्ट्रपतिको एक पत्र भेजा था । उसमें ऐसा कहा था कि कानूनन सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकती । भारतीय नागरी कानून १९५५ के अनुसार यदि भारतका नागरिक उस व्यक्तिके देशमें प्रधान हो सकता है, तो ही उस व्यक्तिको भारतमें प्रधान बनना संभव है । इटलीमें भारतके नागरिकको वहांके कानूनके अनुसार प्रधानमंत्री बनना असंभव है । अतः इससे यह स्पष्ट होता है कि इटलीमें रहनेवाली सोनिया गांधी कानूनन भारतमें प्रधानमंत्री नहीं बन सकती । 

सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनी तो सर्वोच्च न्यायालयमें आवाहन देनेकी चेतावनी !

१७ मई २०११ को राष्ट्रपति अब्दुल कलामके समक्ष डॉ. स्वामीका पत्र था । राष्ट्रपतिद्वारा दोपहर १२. ४५ को डॉ. स्वामीने कानूनका स्पष्टीकरण मांगने हेतु राष्ट्रपति भवनमें आमंत्रित किया एवं डॉ. स्वामीने यह स्पष्टीकरण दिया । डॉ. स्वामीने राष्ट्रपतिको कहा कि, ‘‘जिसप्रकार मैंने जयललिताको मुख्यमंत्री बननेसे रोका उसी प्रकार सोनिया गांधीके प्रधानमंत्री बननेपर मैं सर्वोच्च न्यायालयमें अभियोग प्रविष्ट कर चुनौती दूंगा ।’’

डॉ. स्वामीकी चेतावनीसे सोनिया गांधी पीछे हटीं !

डॉ. स्वामीकी इस आव्हानात्मक भूमिकासे राष्ट्रपति अब्दुल कलामने सोनिया गांधीको इस विषयमें समझाया कि, ‘यदि आपको कानूनके विरोधमें जाकर सरकार स्थापित करना है एवं प्रधानमंत्री बनना है तो मुझे सर्वोच्च न्यायालयमें डॉ. स्वामीद्वारा प्रविष्ट अभियोगके निर्णयकी प्रतिक्षा करनी होगी । तबतक आपका प्रधानमंत्री बनना असंभव है ।’ इसी कारण अंतमें सोनिया गांधी पीछे हटीं एवं उनका भारतका प्रधानमंत्री बननेका स्वप्न टूटा ।

Friday, January 13, 2012

भारत को इस्लामीकरण से बचाए ?

भारत मे मुस्लिम तकरीबन ३५ प्रतिशत की वृद्धिदर से बढ़ रहे है | जब की हिन्दुओ की वृधि दर लगभग १९ प्रतिशत ही हैं | इस वृधि दर से भारत का इस्लामीकरण तय हैं | भारत मे लोकतंत्र हैं और यही प्रणाली इसे इस्लामिक देश यानि दारुल इस्लाम बनाएगी २०३० नहीं तो २०५० वरना २०६० तो निश्चित ही | पर अब भी समय हैं कुछ उपाय हैं जिनका हिंदू समुदाय पालन करे तो देश को बचा पायेगा |
  १. किसी भी कौम को अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए  २.१ की निषेचन दर चाहिए | यानि हर गैर मुस्लिम दंपत्ति को ३ बच्चे पैदा करने होंगे अगर मुसलमानों के बराबर आबादी संतुलन रखना हैं |
२. भारत मे उन हिन्दुओ को भी जिन्हें बहुत आर्थिक समस्या हैं न्यूनतम ३ बच्चे तो परिवार मे करने ही चाहिए | वर्ना सक्षम लोग ४ बच्चे प्रति परिवार करे | वेद मे १० बच्चो तक आज्ञा हैं |
३. अधिक बच्चे पैदा करने के प्रश्न मे एक मुस्लिम दंपत्ति का उत्तर था “हिंदू जो एक बच्चा याँ २ बच्चा पैदा करता हैं और ये सोचता हैं की डॉक्टर बनायेंगे इंजिनियर बनायेंगे याँ आई ए एस बनायेंगे और हम ८ बच्चे पैदा करते हैं और हमारा कोई बच्चा साईकिल पंचर जोड़ता हैं कोई मसाला बेचता हैं पर अगले कुछ सालो मे जब हमारी आबादी होगी तो तुम्हारे डॉक्टर इंजिनियर पर हमारा ही शासन होगा |
४. भाइयो, ये लोकतंत्र हैं यहाँ जिसकी लाठी उसकी भैस का सिद्धांत चलता हैं डॉक्टर इंजिनियर नहीं पंचर जोडने वालो की सरकार बनेगी | लोकतंत्र मे बहु-संस्कृति तो पनपती है पर इस्लामिक साम्राज्य मे तो लोकतंत्र भी नहीं चल पता | सिर्फ मुल्ला मौलवियो की हुकूमत चलती हैं | दूर क्यों जाए पाकिस्तान का हाल देख लीजिए |
५. जो बच्चे हो उन्हें वैदिक धर्मं (हिंदू धर्मं) की मूलभूत जानकारी तो दे ही ताकि वे धर्मं निष्ठा बने | सिर्फ आबादी ही काफी नहीं, अगर धर्मं के बारे मे जानकारी ना होगी तो जैसे की आजकल के कथित धर्मनिरपेक्ष लोग हैं यानि हिंदू विरोधी वैसे ही बन जायेंगे |
६. ४ वेद, ६ शास्त्र, ११ उपनिषद , वाल्मीकि रामायण, संशोधित महाभारत आदि ग्रन्थ उपलब्ध ना हो तो भी एक सत्यार्थ प्रकाश तो रखिये ही | उस पुस्तक को पढने के बाद हिंदू धर्मं मे निष्ठा अपने आप आजाती हैं |
७. संगठित रहिये, क्योकि जंगल मे वही जीव बच पाते हैं जो संगठित रहते है | अपने परिवार, मोहल्ला , रिश्तेदार, जाती और धर्मं के नाम पर संगठित रहिये | कमजोरी को ताकत बनाने का यही तरीका हैं धर्मं के नाम पर एक होइए और विघटन को वर्गीकरण के तौर पर लीजिए |
८. जातिवाद के विचार रखते हैं तो भी धर्मं को वरीयता दे | जब धर्मं ही नहीं रहेगा तो जाती कहा बचेगी | तो कोई भी जाती हिंदू विरोधी याँ मुसलमानों की तलवे चाटने वाला नेता ना रखे | ये धर्मं से भी द्रोह है और जाती से भी क्यों की धर्मं से जाती है जाती से धर्मं नहीं |
९. समाज मे धर्मं रक्षा के प्रति जागरूकता फैलाये | भारत का इस्लामीकरण हो रहा हैं और हमे उसे रोकना है ये बात अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाये |
१०. भारत का इस्लामीकरण रोकने का एक स्थायी उपाय हैं के भारत को आर्य राष्ट्र/हिंदू राष्ट्र /वैदिक राष्ट्र (य जो कहना चाहे ) बनाये | भारत का संविधान वेदों के आधार पर रखे |
११. नए हिन्दुवादी दल याँ जब तक कोई खुल के सत्य बोलने वाला दल नहीं आता तब तक हर दल के हिन्दुयीकरण की निति पर चले | जब कोई वोट मांगने आये चाहे वो किसी भी दल का हो तो उस से पूछिए की क्या वो हिंदू(आर्य) राष्ट्र का समर्थन करता हैं? उसके हां कहने पर ही उसको वोट दीजिए |
१२. हिंदू संगठनो को आर्थिक रूप से मजबूत करिये क्यों की यही वो राष्ट्रवादी संगठन है जो आपातकल मे अपने लोगो की रक्षा करते हैं |
१३. अरबराष्ट्रवादियो का आर्थिक बहिष्कार करिये | जो रहे यहाँ, खाए यहाँ का, पर माने अरब की संस्कृति और भारत को अरब बनाने के लिए आबादी बढ़ाये उनका अर्थ बहिष्कार ही उत्तम उपाय हैं |
१४. मुस्लिम ये जानते हुए बच्चे पैदा करते हैं की इतने बच्चे अच्छा जीवन नहीं जी पाएंगे पर हिंदू उनका पेट पाल ही लेंगे किसी ना किसी तरह | उनकी इस भ्रान्ति को तोडिये | मुस्लिमो को आर्थिक लाभ मत दीजिए | यानि उनकी साईकिल की दुकान से पंचर मत जुड़वाइये, फल की दुकान से फल मत लीजिए |
१५. सभी के साथ ऐसा ना करिये, जो राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति और भारतीय धर्मं पर पर चलना चाहते हैं याँ चलने को तैयार हो जाते हैं पूरा उनको सहयोग दीजिए |
१६. मैं ये नहीं कह रहा के आप मुस्लिमो से आर्थिक लेन-देन बंद कर दे | आर्थिक लाभ लीजिए पर आर्थिक लाभ दीजिए मत |
१७. चमड़े का प्रयोग ना करे | ना केवल इस से आप जीव हत्या और पर्यावरण बचायेंगे | अपितु बड़े मुस्लिम कारोबारियों को जिनकी आस्था भारतीय संविधान से ज्यादा शरिया मे होती हैं आर्थिक नुक्सान पहुचायेंगे | ये अर्थीक बहिष्कार का ही अंग हुआ |
१८. मांसाहार का त्याग करे, पुनः उन्ही कारणों से | क्यों की मांस उद्योघ मे हिंदू न्यून हैं | हिन्दुओ मे यादव भाई अगर गाय का दूध बेचते हैं तो मुस्लिम उसी गाये का मांस | इस लिए मांस हर त्यागिये देश धर्मं और समाज के लिए |
१९. इधन और ऊर्जा बचाए | आप के द्वारा इस्तेमाल किए गए पेट्रोल से तेल उत्पादक इस्लामिक देश डॉलर कमाते हैं और वही रकम भारत मे जेहाद और आतंकवाद के लिए खर्च की जाती है | इसलिए पेट्रोल बचाए बिजली बचाए सौर्य उर्जा प्रयोग करे व अन्य प्राकृतिक संसाधन प्रयोग करे |
२०. अपने आस-पास मुस्लिम मत बसाये | वरना आज नहीं कल आपका इलाके का इस्लामीकरण हो जाएगा |
२१. मुसलमानों से मित्रता रखे | उनसे संपर्क ना तोड़े और अच्छे से बात करे | जैसे ये हमसे भाई जान कर के करते हैं | इनसे स्वस्थ चर्चा इस्लाम पर रखे और सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने को प्रेरित करते रहे | पर घर के अंदर मत लाइए वरना आज नहीं कल ये आपके आसपास की किसी हिंदू लड़की को लेके भाग जाएँगे |
२२. इनको वापस वैदिक धर्मं मे आने को कहे | शुद्धि के लाभ बताये |
२३. मुस्लिम लड़कियों से आर्य (हिंदू) शादी करे |
२४. अगर खुद नहीं कर सकते तो दूसरों को प्रेरित करे जो अविवाहित है | उन्हें रोजगार दीजिए जो मुस्लिम लड़कियों से शादी करते हैं |
२५. अगर कोई हिंदू लड़की किसी मुस्लिम लड़के से शादी करने जा रही है क्या कैसे भी संपर्क मे है तो तुरंत उसके घर वालो को सूचित करे | किसी भी तरह हिंदू लड़की को मुस्लिम लड़के के प्यार के जाल से बचाए |
२६. हिंदू विरोधी मीडिया का बहिष्कार करे | हिंदू विरोधी अखबार को मत ख़रीदे जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया , हिन्दुस्थान टाइम्स , दैनिक हिन्दुस्थान इत्यादि | हिंदू विरोधी चैनल जैसे अन. डी. टी .वी इत्यादि मत देखिये | दूसरों को भी यही करने को कहिये |
२७. अपने लोगो को काम दीजिए | जो काम विशेष कर मुस्लिम करते हैं वो हिन्दुओ को सिखलाइए और फिर उन्हें काम पर रखिये |
२८. हिंदू राष्ट्र का समर्थन करने वालो का यथा संभव सहयोग करे | यानि तन-मन-धन जैसे हो सके |
२९. भारत की संस्कृति धर्मं को बचाना है तो वैदिक राष्ट्र बनाना हैं | बस यही हमारा नारा हैं |
३०. द्रण प्रतिज्ञ हो जाइये की किसी भी हाल मे हमे भारत को दारुल इस्लाम (इस्लामिक देश) नहीं बनने देना हैं |
उपरोक्त उपायों पर अमल करने का प्रयास करे | नए सुझाव समविचारों वालो को भी दे |

Tuesday, January 10, 2012

क्या अकबर महान था ?



विद्यालय के दिनों में पढ़े इतिहास में अकबर का नाम और काम बखूबी याद होगा ! रियासतों के रूप में टुकड़ों टुकड़ों में टूटे हुए भारत को एक बनाने की बात हो, या हिन्दू मुस्लिम झगडे मिटाने को दीन ए इलाही चलाने की बात, सब मजहब की दीवारें तोड़कर हिन्दू लड़कियों को अपने साथ शादी करने का सम्मान देने की बात हो, या हिन्दुओं के पवित्र स्थानों पर जाकर सजदा करने की, हिन्दुओं पर से जजिया कर हटाने की बात हो या फिर हिन्दुओं को अपने दरबार में जगह देने की, अकबर ही अकबर सब ओर दिखाई देता है. सच है कि हमारे इतिहासकार किसी को महान यूँ ही नहीं कह देते. इस महानता को पाने के लिए राम, कृष्ण, विक्रमादित्य, पृथ्वीराज, राणा प्रताप, शिवाजी और न जाने ऐसे कितने ही महापुरुषों के नाम तरसते रहे, पर इनके साथ “महान” शब्द न लग सका.
हमें याद है कि इतिहास की किताबों में अकबर पर पूरे अध्याय के अन्दर दो पंक्तियाँ महाराणा प्रताप पर भी होती थीं. मसलन वो कब पैदा हुए, कब मरे, कैसे विद्रोह किया, और कैसे उनके ही राजपूत उनके खिलाफ थे. इतिहासकार महाराणा प्रताप को कभी महान न कह सके. ठीक ही तो है! अकबर और राणा का मुकाबला क्या है? कहाँ अकबर पूरे भारत का सम्राट, अपने हरम में पांच हज़ार से भी ज्यादा औरतों की जिन्दगी रोशन करने वाला, उनसे दिल्लगी कर उन्हें शान बख्शने वाला, बीसियों राजपूत राजाओं को अपने दरबार में रखने वाला, और कहाँ राणा प्रताप, क्षुद्र क्षत्रिय, अपने राज्य के लिए लड़ने वाला, सत्ता का भूखा, सत्ता के लिए वन वन भटककर पत्तलों पर घास की रोटियाँ खाने वाला, जिसका कोई हरम ही नहीं इस तरह का छोटा और निष्ठुर हृदय, सब राजपूतों से केवल इसलिए लड़ने वाला कि उन्होंने अपनी लड़कियां, पत्नियाँ, बहनें अकबर को भेजीं, अकबर “महान” का संधि प्रस्ताव कई बार ठुकराने वाला घमंडी, और मुसलमान राजाओं से रोटी बेटी का सम्बन्ध भी न रखने वाला दकियानूसी, इत्यादि. कहाँ अकबर जैसा त्यागी जो अपने देश को उसके हाल पर छोड़ कर दूसरे देश भारत का भला करने पूरा जीवन यहीं पर रहा, और कहाँ राणा प्रताप जो अपनी जमीन भी ऐसे त्यागी के लिए खाली न कर पाया और इस आशा में कि एक दिन फिर से अपने राज्य पर कब्ज़ा कर लेगा, वनों में धूल फांकता, पत्नी और बच्चों को जंगलों के कष्ट देता सत्ता का भूखा!
अकबर “महान” की महानता बताने से पहले उसके महान पूर्वजों के बारे में थोड़ा जान लेना जरूरी है. भारत में पिछले तेरह सौ सालों से इस्लाम के मानने वालों ने लगातार आक्रमण किये. मुहम्मद बिन कासिम और उसके बाद आने वाले गाजियों ने एक के बाद एक हमला करके, यहाँ लूटमार, बलात्कार, नरसंहार और इन सबसे बढ़कर यहाँ रहने वाले काफिरों को अल्लाह और उसके रसूल की इच्छानुसार मुसलमान बनाने का पवित्र किया. आज के अफगानिस्तान तक पश्चिम में फैला उस समय का भारत धीरे धीरे इस्लाम के शिकंजे में आने लगा. आज के अफगानिस्तान में उस समय अहिंसक बौद्धों की निष्क्रियता ने बहुत नुकसान पहुंचाया क्योंकि इसी के चलते मुहम्मद के गाजियों के लश्कर भारत के अंदर घुस पाए. जहाँ जहाँ तक बौद्धों का प्रभाव था, वहाँ पूरी की पूरी आबादी या तो मुसलमान बना दी गयी या काट दी गयी. जहां हिंदुओं ने प्रतिरोध किया, वहाँ न तो गाजियों की अधिक चली और न अल्लाह की. यही कारण है कि सिंध के पूर्व भाग में आज भी हिंदू बहुसंख्यक हैं क्योंकि सिंध के पूर्व में राजपूत, जाट, आदि वीर जातियों ने इस्लाम को उस रूप में बढ़ने से रोक दिया जिस रूप में वह इराक, ईरान, मिस्र, अफगानिस्तान और सिंध के पश्चिम तक फैला था अर्थात वहाँ की पुरानी संस्कृति को मिटा कर केवल इस्लाम में ही रंग दिया गया पर भारत में ऐसा नहीं हो सका.
पर बीच बीच में लुटेरे आते गए और देश को लूटते गए. तैमूरलंग ने कत्लेआम करने के नए आयाम स्थापित किये और अपनी इस पशुता को बड़ी ढिटाई से अपनी डायरी में भी लिखता गया. इसके बाद मुग़ल आये जो हमारे इतिहास में इस देश से प्यार करने वाले लिखे गए हैं! बताते चलें कि ये देशभक्त और प्रेमपुजारी मुग़ल, तैमूर और चंगेज खान के कुलों के आपस के विवाह संबंधों का ही परिणाम थे. इनमें बाबर हुआ जो अकबर “महान” का दादा था. यह वही बाबर है जिसने अपने काल में न जाने कितने मंदिर तोड़े, कितने ही हिंदुओं को मुसलमान बनाया, कितने ही हिंदुओं के सिर उतारे और उनसे मीनारें बनायीं. यह सब पवित्र कर्म करके वह उनको अपनी डायरी में लिखता भी रहता था ताकि आने वाली उसकी नस्ल इमान की पक्की हो और इसी नेक राह पर चले. क्योंकि मूर्तिपूजा दुनिया की सबसे बड़ी बुराई है और अल्लाह को वह बर्दाश्त नहीं. इस देशभक्त प्रेमपुजारी बाबर ने प्रसिद्ध राम मंदिर भी तुडवाया और उस जगह पर अपने नाम की मस्जिद बनवाई. यह बात अलग है कि वह अपने समय का प्रसिद्ध नशाखोर, शराबी, हत्यारा, समलैंगिक (पुरुषों से भोग करने वाला), छोटे बच्चों के साथ भी बिस्मिल्लाह पढकर भोग करने वाला था. पर वह था पक्का मुसलमान! तभी तो हमारे देश के मुसलमान भाई अपने असली पूर्वजों को भुला कर इस सच्चे मुसलमान के नाम की मस्जिद बनवाने के लिए दिन रात एक किये हुए हैं. खैर यह वो “महान” अकबर का महान दादा था जो अपने पोते के कारनामों से इस्लामी इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों से लिखवा गया.
ऐसे महान दादा के पोते स्वनामधन्य अकबर “महान” के जीवन के कुछ दृश्य आपके सामने रखते हैं. इस काम में हम किसी हिन्दुवादी इतिहासकार के प्रमाण नहीं देंगे क्योंकि वे तो खामखाह अकबर “महान” से चिढ़ते हैं! हम देंगे प्रमाण अबुल फज़ल (अकबर का खास दरबारी) की आइन ए अकबरी और अकबरनामा से. और साथ ही अकबर के जीवन पर सबसे ज्यादा प्रामाणिक इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ की अंग्रेजी की किताब “अकबर- द ग्रेट मुग़ल” से. हम दोनों किताबों के प्रमाणों को हिंदी में देंगे ताकि सबको पढ़ने में आसानी रहे. यहाँ याद रहे कि ये दोनों लेखक सदा इस बात के लिए निशाने पर रहे हैं कि इन्होने अकबर की प्रशंसा करते करते बहुत झूठ बातें लिखी हैं, इन्होने बहुत सी उसकी कमियां छुपाई हैं. पर हम यहाँ यह दिखाएँगे कि अकबर के कर्मों का प्रताप ही कुछ ऐसा था कि सच्चाई सौ परदे फाड़ कर उसी तरह सामने आ जाती है जैसे कि अँधेरे को चीर कर उजाला.
तो अब नजर डालते हैं अकबर महान से जुडी कुछ बातों पर-

अकबर महान का आगाज़

१. विन्सेंट स्मिथ ने किताब यहाँ से शुरू की है कि “अकबर भारत में एक विदेशी था. उसकी नसों में एक बूँद खून भी भारतीय नहीं था…. अकबर मुग़ल से ज्यादा एक तुर्क था” पर देखिये! हमारे इतिहासकारों और कहानीकारों ने अकबर को एक भारतीय के रूप में पेश किया है. जबकि हकीकत यह है कि अकबर के सभी पूर्वज बाबर, हुमायूं, से लेकर तैमूर तक सब भारत में लूट, बलात्कार, धर्म परिवर्तन, मंदिर विध्वंस, आदि कामों में लगे रहे. वे कभी एक भारतीय नहीं थे और इसी तरह अकबर भी नहीं था. और इस पर भी हमारी हिंदू जाति अकबर को हिन्दुस्तान की शान समझती रही!

अकबर महान की सुंदरता और अच्छी आदतें

२. बाबर शराब का शौक़ीन था, इतना कि अधिकतर समय धुत रहता था [बाबरनामा]. हुमायूं अफीम का शौक़ीन था और इस वजह से बहुत लाचार भी हो गया. अकबर ने ये दोनों आदतें अपने पिता और दादा से विरासत में लीं. अकबर के दो बच्चे नशाखोरी की आदत के चलते अल्लाह को प्यारे हुए. पर इतने पर भी इस बात पर तो किसी मुसलमान भाई को शक ही नहीं कि ये सब सच्चे मुसलमान थे.
३. कई इतिहासकार अकबर को सबसे सुन्दर आदमी घोषित करते हैं. विन्सेंट स्मिथ इस सुंदरता का वर्णन यूँ करते हैं-
“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था. उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था. उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था. उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी. उसके नाक के नथुने ऐसे दीखते थे जैसे वो गुस्से में हो. आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था. वह गहरे रंग का था”
४. जहाँगीर ने लिखा है कि अकबर उसे सदा शेख ही बुलाता था भले ही वह नशे की हालत में हो या चुस्ती की हालत में. इसका मतलब यह है कि अकबर काफी बार नशे की हालत में रहता था.
५. अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात करता करता भी नींद में गिर पड़ता था. वह अक्सर ताड़ी पीता था. वह जब ज्यादा पी लेता था तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलो के जैसे हरकत करने लगता.

अकबर महान की शिक्षा

६. जहाँगीर ने लिखा है कि अकबर कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं जानता था पर यह दिखाता था कि वह बड़ा भारी विद्वान है.

अकबर महान का मातृशक्ति (स्त्रियों) के लिए आदर

७. अबुल फज़ल ने लिखा है कि अपने राजा बनने के शुरूआती सालों में अकबर परदे के पीछे ही रहा! परदे के पीछे वो किस बेशर्मी को बेपर्दा कर रहा था उसकी जानकारी आगे पढ़िए.
८. अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है- “अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और हर एक का अपना अलग घर था.” ये पांच हजार औरतें उसकी ३६ पत्नियों से अलग थीं.
९. आइन ए अकबरी में अबुल फजल ने लिखा है- “शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था. वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी. दरबारी नर्तकियों को अपने घर ले जाते थे. अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी. कई बार जवान लोगों में लड़ाई झगडा भी हो जाता था. एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”.
अब यहाँ सवाल पैदा होता है कि ये वेश्याएं इतनी बड़ी संख्या में कहाँ से आयीं और कौन थीं? आप सब जानते ही होंगे कि इस्लाम में स्त्रियाँ परदे में रहती हैं, बाहर नहीं. और फिर अकबर जैसे नेक मुसलमान को इतना तो ख्याल होगा ही कि मुसलमान औरतों से वेश्यावृत्ति कराना गलत है. तो अब यह सोचना कठिन नहीं है कि ये स्त्रियां कौन थीं. ये वो स्त्रियाँ थीं जो लूट के माल में अल्लाह द्वारा मोमिनों के भोगने के लिए दी जाती हैं, अर्थात काफिरों की हत्या करके उनकी लड़कियां, पत्नियाँ आदि. अकबर की सेनाओं के हाथ युद्ध में जो भी हिंदू स्त्रियाँ लगती थीं, ये उसी की भीड़ मदिरालय में लगती थी.
१०. अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है- “जब भी कभी कोई रानी, दरबारियों की पत्नियाँ, या नयी लडकियां शहंशाह की सेवा (यह साधारण सेवा नहीं है) में जाना चाहती थी तो पहले उसे अपना आवेदन पत्र हरम प्रबंधक के पास भेजना पड़ता था. फिर यह पत्र महल के अधिकारियों तक पहुँचता था और फिर जाकर उन्हें हरम के अंदर जाने दिया जाता जहां वे एक महीने तक रखी जाती थीं.”
अब यहाँ देखना चाहिए कि चाटुकार अबुल फजल भी इस बात को छुपा नहीं सका कि अकबर अपने हरम में दरबारियों, राजाओं और लड़कियों तक को भी महीने के लिए रख लेता था. पूरी प्रक्रिया को संवैधानिक बनाने के लिए इस धूर्त चाटुकार ने चाल चली है कि स्त्रियाँ खुद अकबर की सेवा में पत्र भेज कर जाती थीं! इस मूर्ख को इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि ऐसी कौन सी स्त्री होगी जो पति के सामने ही खुल्लम खुल्ला किसी और पुरुष की सेवा में जाने का आवेदन पत्र दे दे? मतलब यह है कि वास्तव में अकबर महान खुद ही आदेश देकर जबरदस्ती किसी को भी अपने हरम में रख लेता था और उनका सतीत्व नष्ट करता था.
११. रणथंभोर की संधि में अकबर महान की पहली शर्त यह थी कि राजपूत अपनी स्त्रियों की डोलियों को अकबर के शाही हरम के लिए रवाना कर दें यदि वे अपने सिपाही वापस चाहते हैं.
१२. बैरम खान जो अकबर के पिता तुल्य और संरक्षक था, उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के तुल्य स्त्री से शादी की.
१३. ग्रीमन के अनुसार अकबर अपनी रखैलों को अपने दरबारियों में बाँट देता था. औरतों को एक वस्तु की तरह बांटना और खरीदना अकबर महान बखूबी करता था.
१४. मीना बाजार जो हर नए साल की पहली शाम को लगता था, इसमें सब स्त्रियों को सज धज कर आने के आदेश दिए जाते थे और फिर अकबर महान उनमें से किसी को चुन लेते थे.

नेक दिल अकबर महान

१५. ६ नवम्बर १५५६ को १४ साल की आयु में अकबर महान पानीपत की लड़ाई में भाग ले रहा था. हिंदू राजा हेमू की सेना मुग़ल सेना को खदेड़ रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह बेहोश हो गया. उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़ मच गयी. तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर महान के सामने लाया गया और इसने बहादुरी से हेमू का सिर काट लिया और तब इसे गाजी के खिताब से नवाजा गया. (गाजी की पदवी इस्लाम में उसे मिलती है जिसने किसी काफिर को कतल किया हो. ऐसे गाजी को जन्नत नसीब होती है और वहाँ सबसे सुन्दर हूरें इनके लिए बुक होती हैं). हेमू के सिर को काबुल भिजा दिया गया एवं उसके धड को दिल्ली के दरवाजे से लटका दिया गया ताकि नए आतंकवादी बादशाह की रहमदिली सब को पता चल सके.
१६. इसके तुरंत बाद जब अकबर महान की सेना दिल्ली आई तो कटे हुए काफिरों के सिरों से मीनार बनायी गयी जो जीत के जश्न का प्रतीक है और यह तरीका अकबर महान के पूर्वजों से ही चला आ रहा है.
१७. हेमू के बूढ़े पिता को भी अकबर महान ने कटवा डाला. और औरतों को उनकी सही जगह अर्थात शाही हरम में भिजवा दिया गया.
१८. अबुल फजल लिखता है कि खान जमन के विद्रोह को दबाने के लिए उसके साथी मोहम्मद मिराक को हथकडियां लगा कर हाथी के सामने छोड़ दिया गया. हाथी ने उसे सूंड से उठाकर फैंक दिया. ऐसा पांच दिनों तक चला और उसके बाद उसको मार डाला गया.
१९. चित्तौड़ पर कब्ज़ा करने के बाद अकबर महान ने तीस हजार नागरिकों का क़त्ल करवाया.
२०. अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया. हमजबान की जबान ही कटवा डाली. मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं. उसके ३०० साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरे पर गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया. विन्सेंट स्मिथ ने यह लिखा है कि अकबर महान फांसी देना, सिर कटवाना, शरीर के अंग कटवाना, आदि सजाएं भी देते थे.
२१. २ सितम्बर १५७३ के दिन अहमदाबाद में उसने २००० दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊंची सिरों की मीनार बनायी. वैसे इसके पहले सबसे ऊंची मीनार बनाने का सौभाग्य भी अकबर महान के दादा बाबर का ही था. अर्थात कीर्तिमान घर के घर में ही रहा!
२२. अकबरनामा के अनुसार जब बंगाल का दाउद खान हारा, तो कटे सिरों के आठ मीनार बनाए गए थे. यह फिर से एक नया कीर्तिमान था. जब दाउद खान ने मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में पानी पीने को दिया गया.

न्यायकारी अकबर महान

२३. थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले. उन मूर्ख आत्मघाती लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी. जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया. और अंत में इसने दोनों तरफ के लोगों को ही अपने सैनिकों से मरवा डाला. और फिर अकबर महान जोर से हंसा.
२४. हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की नीति यही थी कि राजपूत ही राजपूतों के विरोध में लड़ें. बादायुनी ने अकबर के सेनापति से बीच युद्ध में पूछा कि प्रताप के राजपूतों को हमारी तरफ से लड़ रहे राजपूतों से कैसे अलग पहचानेंगे? तब उसने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि किसी भी हालत में मरेंगे तो राजपूत ही और फायदा इस्लाम का होगा.
२५. कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ी और उस स्थान पर नमाज पढ़ी.
२६. एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है. इससे उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को इस बात के लिए एक मीनार से नीचे फिंकवा दिया.
२७. अगस्त १६०० में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था. न तो वह किला टोड पाया और न ही किले की सेना अकबर को हरा सकी. विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा. उसने किले के राजा मीरां बहादुर को आमंत्रित किया और अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा. तब मीरां शान्ति के नाम पर बाहर आया और अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुका. पर अचानक उसे जमीन पर धक्का दिया गया ताकि वह पूरा सजदा कर सके क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था.
उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे. सेनापति ने मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी? अकबर ने बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है? तब बालक ने कहा कि उसका पिता समर्पण नहीं करेगा चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए. यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया. इस तरह झूठ के बल पर अकबर महान ने यह किला जीता.
यहाँ ध्यान देना चाहिए कि यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है. अतः कई लोगों का यह कहना कि अकबर बाद में बदल गया था, एक झूठ बात है.
२८. इसी तरह अपने ताकत के नशे में चूर अकबर ने बुंदेलखंड की प्रतिष्ठित रानी दुर्गावती से लड़ाई की और लोगों का क़त्ल किया.

अकबर महान और महाराणा प्रताप 

२९. ऐसे इतिहासकार जिनका अकबर दुलारा और चहेता है, एक बात नहीं बताते कि कैसे एक ही समय पर राणा प्रताप और अकबर महान हो सकते थे जबकि दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी थे?
३०. यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जैसे अकबर प्रेमी को भी यह बात माननी पड़ी कि चित्तौड़ पर हमले के पीछे केवल उसकी सब कुछ जीतने की हवस ही काम कर रही थी. वहीँ दूसरी तरफ महाराणा प्रताप अपने देश के लिए लड़ रहे थे और कोशिश की कि राजपूतों की इज्जत उनकी स्त्रियां मुगलों के हरम में न जा सकें. शायद इसी लिए अकबर प्रेमी इतिहासकारों ने राणा को लड़ाकू और अकबर को देश निर्माता के खिताब से नवाजा है!
अकबर महान अगर, राणा शैतान तो
शूकर है राजा, नहीं शेर वनराज है
अकबर आबाद और राणा बर्बाद है तो
हिजड़ों की झोली पुत्र, पौरुष बेकार है
अकबर महाबली और राणा बलहीन तो
कुत्ता चढ़ा है जैसे मस्तक गजराज है
अकबर सम्राट, राणा छिपता भयभीत तो
हिरण सोचे, सिंह दल उसका शिकार है
अकबर निर्माता, देश भारत है उसकी देन
कहना यह जिनका शत बार धिक्कार है
अकबर है प्यारा जिसे राणा स्वीकार नहीं
रगों में पिता का जैसे खून अस्वीकार है.

अकबर और इस्लाम

३१. हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर ३६ शादियाँ करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि करके भी इस्लाम को अपने दामन से बाँधे रखा ताकि राजनैतिक फायदा मिल सके. और सबसे मजेदार बात यह है कि वंदे मातरम में शिर्क दिखाने वाले मुल्ला मौलवी अकबर की शराब, अफीम, ३६ बीवियों, और अपने लिए करवाए सजदों में भी इस्लाम को महफूज़ पाते हैं! किसी मौलवी ने आज तक यह फतवा नहीं दिया कि अकबर या बाबर जैसे शराबी और समलैंगिक मुसलमान नहीं हैं और इनके नाम की मस्जिद हराम है.
३२. अकबर ने खुद को दिव्य आदमी के रूप में पेश किया. उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में “अल्लाह ओ अकबर” कह कर अभिवादन किया जाए. भोले भाले मुसलमान सोचते हैं कि वे यह कह कर अल्लाह को बड़ा बता रहे हैं पर अकबर ने अल्लाह के साथ अपना नाम जोड़कर अपनी दिव्यता फैलानी चाही. अबुल फज़ल के अनुसार अकबर खुद को सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) की तरह पेश करता था. ऐसा ही इसके लड़के जहांगीर ने लिखा है.
३३. अकबर ने अपना नया पंथ दीन ए इलाही चलाया जिसका केवल एक मकसद खुद की बडाई करवाना था. उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया!
३४. अकबर को इतना महान बताए जाने का एक कारण ईसाई इतिहासकारों का यह था कि क्योंकि इसने हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों का ही जम कर अपमान किया और इस तरह भारत में अंग्रेजों के इसाईयत फैलाने के उद्देश्य में बड़ा कारण बना. विन्सेंट स्मिथ ने भी इस विषय पर अपनी राय दी है.
३५. अकबर भाषा बोलने में बड़ा चतुर था. विन्सेंट स्मिथ लिखता है कि मीठी भाषा के अलावा उसकी सबसे बड़ी खूबी अपने जीवन में दिखाई बर्बरता है!
३६. अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले. जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है. ये वैसे ही दावे हैं जैसे मुहम्मद साहब के बारे में हदीसों में किये गए हैं. अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी. उसके दरबारियों को तो यह अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए.

अकबर महान और जजिया कर

३७. इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी इस्लामी राज्य में रहने वाले गैर मुस्लिमों को अगर अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छिनने से सुरक्षित रखना होता था तो उनको इसकी कीमत देनी पड़ती थी जिसे जजिया कहते थे. यानी इसे देकर फिर कोई अल्लाह व रसूल का गाजी आपकी संपत्ति, बेटी, बहन, पत्नी आदि को नहीं उठाएगा. कुछ अकबर प्रेमी कहते हैं कि अकबर ने जजिया खत्म कर दिया था. लेकिन इस बात का इतिहास में एक जगह भी उल्लेख नहीं! केवल इतना है कि यह जजिया रणथम्भौर के लिए माफ करने की शर्त राखी गयी थी जिसके बदले वहाँ के हिंदुओं को अपनी स्त्रियों को अकबर के हरम में भिजवाना था! यही कारण बना की इन मुस्लिम सुल्तानों के काल में हिन्दू स्त्रियाँ जौहर में जलना अधिक पसंद करती थी.
३८. यह एक सफ़ेद झूठ है कि उसने जजिया खत्म कर दिया. आखिरकार अकबर जैसा सच्चा मुसलमान जजिया जैसे कुरआन के आदेश को कैसे हटा सकता था? इतिहास में कोई प्रमाण नहीं की उसने अपने राज्य में कभी जजिया बंद करवाया हो.

अकबर महान और उसका सपूत

३९. भारत में महान इस्लामिक शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बादशाह के अपने बच्चे ही उसके खिलाफ बगावत कर बैठते थे! हुमायूं बाबर से दुखी था और जहांगीर अकबर से, शाहजहां जहांगीर से दुखी था तो औरंगजेब शाहजहाँ से. जहांगीर (सलीम) ने १६०२ में खुद को बादशाह घोषित कर दिया और अपना दरबार इलाहबाद में लगाया. कुछ इतिहासकार कहते हैं की जोधा अकबर की पत्नी थी या जहाँगीर की, इस पर विवाद है. संभवतः यही इनकी दुश्मनी का कारण बना, क्योंकि सल्तनत के तख़्त के लिए तो जहाँगीर के आलावा कोई और दावेदार था ही नहीं!
४०. ध्यान रहे कि इतिहासकारों के लाडले और सबसे उदारवादी राजा अकबर ने ही सबसे पहले “प्रयागराज” जैसे काफिर शब्द को बदल कर इलाहबाद कर दिया था.
४१. जहांगीर अपने अब्बूजान अकबर महान की मौत की ही दुआएं करने लगा. स्मिथ लिखता है कि अगर जहांगीर का विद्रोह कामयाब हो जाता तो वह अकबर को मार डालता. बाप को मारने की यह कोशिश यहाँ तो परवान न चढी लेकिन आगे जाकर आखिरकार यह सफलता औरंगजेब को मिली जिसने अपने अब्बू को कष्ट दे दे कर मारा. वैसे कई इतिहासकार यह कहते हैं कि अकबर को जहांगीर ने ही जहर देकर मारा.

अकबर महान और उसका शक्की दिमाग

४२. अकबर ने एक आदमी को केवल इसी काम पर रखा था कि वह उनको जहर दे सके जो लोग अकबर को पसंद नहीं!
४३. अकबर महान ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का कतल कराया बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे- बैरम खान (अकबर का गुरु जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन, असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा, शेख अब्दुरनबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब मुल्ला जो इसे नापसंद थे. पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है. और फिर जयमल जिसे मारने के बाद उसकी पत्नी को अपने हरम के लिए खींच लाया और लोगों से कहा कि उसने इसे सती होने से बचा लिया!

समाज सेवक अकबर महान

४४. अकबर के शासन में मरने वाले की संपत्ति बादशाह के नाम पर जब्त कर ली जाती थी और मृतक के घर वालों का उस पर कोई अधिकार नहीं होता था.
४५. अपनी माँ के मरने पर उसकी भी संपत्ति अपने कब्जे में ले ली जबकि उसकी माँ उसे सब परिवार में बांटना चाहती थी.

अकबर महान और उसके नवरत्न

४६. अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी घड़ी है. असलियत यह है कि अकबर अपने सब दरबारियों को मूर्ख समझता था. उसने कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि इसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं.
४७. प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल अकबर की लूट का हिसाब करता था. इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना.
४८. एक और नवरत्न अबुल फजल अकबर का अव्वल दर्जे का चाटुकार था. बाद में जहाँगीर ने इसे मार डाला.
४९. फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वह अपने समय का भारत का सबसे बड़ा कवि था. आश्चर्य इस बात का है कि यह सर्वश्रेष्ठ कवि एक अनपढ़ और जाहिल शहंशाह की प्रशंसा का पात्र था! यह ऐसी ही बात है जैसे कोई अरब का मनुष्य किसी संस्कृत के कवि के भाषा सौंदर्य का गुणगान करता हो!
५०. बुद्धिमान बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया. बीरबल अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं. ध्यान रहे कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से भी प्रचलित हैं.
५१. अगले रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों सबसे बड़े रत्न अकबर के आदेश पर मार डाले गए!
५२. मान सिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बहन जहांगीर को दी. और बाद में इसी जहांगीर ने मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया. यही मानसिंह अकबर के आदेश पर जहर देकर मार डाला गया और इसके पिता भगवान दास ने आत्महत्या कर ली.
५३. इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें. और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है.
५४. रत्न टोडरमल अकबर का वफादार था तो भी उसकी पूजा की मूर्तियां अकबर ने तुडवा दीं. इससे टोडरमल को दुःख हुआ और इसने इस्तीफ़ा दे दिया और वाराणसी चला गया.

अकबर और उसके गुलाम

५५. अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया. इससे पता चलता है कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था.
५६. कंधार में एक बार अकबर ने बहुत से लोगों को गुलाम बनाया क्योंकि उन्होंने १५८१-८२ में इसकी किसी नीति का विरोध किया था. बाद में इन गुलामों को मंडी में बेच कर घोड़े खरीदे गए.
५७. जब शाही दस्ते शहर से बाहर जाते थे तो अकबर के हरम की औरतें जानवरों की तरह सोने के पिंजरों में बंद कर दी जाती थीं.
५८. वैसे भी इस्लाम के नियमों के अनुसार युद्ध में पकडे गए लोग और उनके बीवी बच्चे गुलाम समझे जाते हैं जिनको अपनी हवस मिटाने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है. अल्लाह ने कुरान में यह व्यवस्था दे रखी है.
५९. अकबर बहुत नए तरीकों से गुलाम बनाता था. उसके आदमी किसी भी घोड़े के सिर पर एक फूल रख देते थे. फिर बादशाह की आज्ञा से उस घोड़े के मालिक के सामने दो विकल्प रखे जाते थे, या तो वह अपने घोड़े को भूल जाये, या अकबर की वित्तीय गुलामी क़ुबूल करे.

कुछ और तथ्य

६०. जब अकबर मरा था तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियाँ केवल आगरे के किले में थीं. इसी तरह के और खजाने छह और जगह पर भी थे. इसके बावजूद भी उसने १५९५-१५९९ की भयानक भुखमरी के समय एक सिक्का भी देश की सहायता में खर्च नहीं किया.
६१. अकबर ने प्रयागराज (जिसे बाद में इसी धर्म निरपेक्ष महात्मा ने इलाहबाद नाम दिया था) में गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का क़त्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो लोग उसके इस्तकबाल करने की जगह घरों में छिप गए. यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है.
६२. एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि फतेहपुर सीकरी अकबर ने बनवाया था. इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है. बाकी दरिंदे लुटेरों की तरह इसने भी पहले सीकरी पर आक्रमण किया और फिर प्रचारित कर दिया कि यह मेरा है. इसी तरह इसके पोते और इसी की तरह दरिंदे शाहजहाँ ने यह ढोल पिटवाया था कि ताज महल इसने बनवाया है वह भी अपनी चौथी पत्नी की याद में जो इसके और अपने सत्रहवें बच्चे को पैदा करने के समय चल बसी थी!
तो ये कुछ उदाहरण थे अकबर “महान” के जीवन से ताकि आपको पता चले कि हमारे नपुंसक इतिहासकारों की नजरों में महान बनना क्यों हर किसी के बस की बात नहीं. क्या इतिहासकार और क्या फिल्मकार और क्या कलाकार, सब एक से एक मक्कार, देशद्रोही, कुल कलंक, नपुंसक हैं जिन्हें फिल्म बनाते हुए अकबर तो दीखता है पर महाराणा प्रताप कहीं नहीं दीखता. अब देखिये कि अकबर पर बनी फिल्मों में इस शराबी, नशाखोर, बलात्कारी, और लाखों हिंदुओं के हत्यारे अकबर के बारे में क्या दिखाया गया है और क्या छुपाया. बैरम खान की पत्नी, जो इसकी माता के सामान थी, से इसकी शादी का जिक्र किसी ने नहीं किया. इस जानवर को इस तरह पेश किया गया है कि जैसे फरिश्ता! जोधाबाई से इसकी शादी की कहानी दिखा दी पर यह नहीं बताया कि जोधा असल में जहांगीर की पत्नी थी और शायद दोनों उसका उपभोग कर रहे थे. दिखाया यह गया कि इसने हिंदू लड़की से शादी करके उसका धर्म नहीं बदला, यहाँ तक कि उसके लिए उसके महल में मंदिर बनवाया! असलियत यह है कि बरसों पुराने वफादार टोडरमल की पूजा की मूर्ति भी जिस अकबर से सहन न हो सकी और उसे झट तोड़ दिया, ऐसे अकबर ने लाचार लड़की के लिए मंदिर बनवाया, यह दिखाना धूर्तता की पराकाष्ठा है. पूरी की पूरी कहानियाँ जैसे मुगलों ने हिन्दुस्तान को अपना घर समझा और इसे प्यार दिया, हेमू का सिर काटने से अकबर का इनकार, देश की शान्ति और सलामती के लिए जोधा से शादी, उसका धर्म परिवर्तन न करना, हिंदू रीति से शादी में आग के चारों तरफ फेरे लेना, राज महल में जोधा का कृष्ण मंदिर और अकबर का उसके साथ पूजा में खड़े होकर तिलक लगवाना, अकबर को हिंदुओं को जबरन इस्लाम क़ुबूल करवाने का विरोधी बताना, हिंदुओं पर से कर हटाना, उसके राज्य में हिंदुओं को भी उसका प्रशंसक बताना, आदि ऐसी हैं जो असलियत से कोसों दूर हैं जैसा कि अब आपको पता चल गयी होंगी. “हिन्दुस्तान मेरी जान तू जान ए हिन्दोस्तां” जैसे गाने अकबर जैसे बलात्कारी, और हत्यारे के लिए लिखने वालों और उन्हें दिखाने वालों को उसी के सामान झूठा और दरिंदा समझा जाना चाहिए.
चित्तौड़ में तीस हजार लोगों का कत्लेआम करने वाला, हिंदू स्त्रियों को एक के बाद एक अपनी पत्नी या रखैल बनने पर विवश करने वाला, नगरों और गाँवों में जाकर नरसंहार कराकर लोगों के कटे सिरों से मीनार बनाने वाला, जिस देश के इतिहास में महान, सम्राट, “शान ए हिन्दोस्तां” लिखा जाए और उसे देश का निर्माता कहा जाए कि भारत को एक छत्र के नीचे उसने खड़ा कर दिया, उस देश का विनाश ही होना चाहिए. वहीं दूसरी तरफ जो ऐसे दरिंदे, नपुंसक के विरुद्ध धर्म और देश की रक्षा करता हुआ अपने से कई गुना अधिक सेनाओं से लड़ा, जंगल जंगल मारा मारा फिरता रहा, अपना राज्य छोड़ा, सब साथियों को छोड़ा, पत्तल पर घास की रोटी खाकर भी जिसने वैदिक धर्म की अग्नि को तुर्की आंधी से कभी बुझने नहीं दिया, वह महाराणा प्रताप इन इतिहासकारों और फिल्मकारों की दृष्टि में “जान ए हिन्दुस्तान” तो दूर “जान ए राजस्थान” भी नहीं था! उसे सदा अपने राज्य मेवाड़ की सत्ता के  लिए लड़ने वाला एक लड़ाका ही बताया गया जिसके लिए इतिहास की किताबों में चार पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं. ऐसी मानसिकता और विचारधारा, जिसने हमें अपने असली गौरवशाली इतिहास को आज तक नहीं पढ़ने दिया, हमारे कातिलों और लुटेरों को महापुरुष बताया और शिवाजी और राणा प्रताप जैसे धर्म रक्षकों को लुटेरा और स्वार्थी बताया, को आज अपने पैरों तले रौंदना है. संकल्प कीजिये कि अब आपके घर में अकबर की जगह राणा प्रताप की चर्चा होगी. क्योंकि इतना सब पता होने पर यदि अब भी कोई अकबर के गीत गाना चाहता है तो उस देशद्रोही और धर्मद्रोही को कम से कम इस देश में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए.
अब तो न अकबर न बाबर से वहशी
दरिन्दे कभी पुज न पायें धरा पर
जो नाम इनका ले कोई अपनी जबाँ से
बता देना राणा की तलवार का बल
इस धूर्त दरिन्दे के पर्दाफाश के बाद,
कोई पूछे कितना था राणा का भाला
तो कहना कि अकबर के जितना था भाला
जो पूछे कोई कैसे उठता था भाला
बता देना हाथों में ज्यों नाचे माला
चलाता था राणा जब रण में ये भाला
उठा देता पांवों को मुग़लों के भाला
जो पूछे कभी क्यों न अकबर लड़ा तो
बता देना कारण था राणा का भाला.

उपरलिखित तथ्यों का विस्तार जानने के लिए पढ़ें:
1. Akbar – the Great Mogul by Vincent Smith
2. Akbarnama by Abul Fazl
3. Ain-e-Akbari by Abul Fazl
4. Who says Akbar is Great by PN Oak
This article is also available in English at http://agniveer.com/3175/akbar/


Monday, January 9, 2012

गांधीजी की सेक्स लाइफ



महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। ऐसे में इस किताब में लिखी बाते लोगों ख़ासकर, गांधीभक्तों को शायद ही हजम हों। दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। वह अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं। जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। कहना न होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया।


क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बीहैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है। महात्मा गांधी पर लिखी किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” को किताब का रूप दिया है।

किताब में वैसे तो नया कुछ नहीं है। राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली महिलाओं और लड़कियों के साथ गांधी के आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डाला गया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में “नग्न स्नान” भी करते थे।


किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।
 
नई किताब यह खुलासा करती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतप्त किया जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर शेयर करती थीं। बहरहाल, ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद वकील से गुरु बने गांधी की इमैज कठोर नेता की बनी जो अपने अनोखी सेक्सुअल डिमांड से अनुयायियों को वशीभूत कर लेता है। आमतौर पर लोग के लिए यह आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश 
हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे। अपनी इच्छा को दमित करने के लिए ही उन्होंने कठोर परिश्रम का अनोखा स्वाभाव अपनाया जो कई लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता।

किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया है, जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।”

किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।” ऐडम का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही। जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है।


ऐडम्स के मुताबिक गांधी अपने लिए महात्मा संबोधन पसंद नहीं करते थे और वह अपने आध्यात्मिक कार्य में मशगूल रहे। गांधी की मृत्यु के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर लीपापोती की जाती रही। हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं।


किताब में ऐडम्स दावा करते हैं कि सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर, मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।


ऐडम्स ने कहा है कि नब्बे के दशक में उसे अपनी किताब “द डाइनैस्टी” लिखते समय गांधी और नेहरू के रिश्ते के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। इसके बाद लेखक की तमन्ना थी कि वह गांधी के जीवन को अन्य लोगों के नजरिए से किताब के जरिए उकेरे। यह किताब उसी कोशिश का नतीजा है। जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे।


इस बारे में ऐडम्स ने स्वीकार किया है कि यह किताब विवाद से घिरेगी। उन्होंने कहा, “मैं जानता हूं इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की, मुझे बधाई दी।” 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी। \'गांधीः नैक्ड ऐंबिशन\' का लंदन यूनिवर्सिटी में विमोचन हो चुका है। किताब में गांधी की जीवन की तक़रीबन हर अहम घटना को समाहित करने की कोशिश की गई है। जैड ऐडम्स ने गांधी के महाव्यक्तित्व को महिमामंडित करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि उनके सेक्स-जीवन की इस तरह व्याख्या की है कि गांधीवादियों और कांग्रेसियों को इस पर सख़्त ऐतराज़ हो सकता है।

Wednesday, December 28, 2011

ताजमहल की असलियत





यह इतना विस्तृत लेख है की इस लेख के सम्बन्ध में मुझे कुछ लिखने की ज़रुरत नही बस जानकारी को बढाना है इसीलिए लिंक दे रहा हूँ - http://tajmahal.gaupal.in/bhumika

Monday, December 26, 2011

गोभक्त मालवीय जी

स्वतन्त्रता से पूर्व देश में अनेक स्थानों पर मुसलमानों द्वारा खुलेआम गोहत्या की जाती थी। इससे हिन्दू भड़क जाते थे और दोनों समुदाय आपस में लड़ने लगते थे। अंग्रेज तो यही चाहते थे। इसलिए वे गोहत्या को प्रश्रय देते थे। गोभक्तों के अनुपम बलिदान की यह घटना 1918 की है।


हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ हरिद्वार के निकट ग्राम कटारपुर के मुसलमानों ने बकरीद पर बड़ी संख्या में गोहत्या करने की घोषणा की। हिन्दुओं ने ज्वालापुर थाने पर शिकायत की; पर वहाँ का थानेदार मुसलमान था। वस्तुतः उसकी शह पर ही यह हो रहा था। हरिद्वार में शिवदयाल सिंह थानेदार थे। उन्होंने हिन्दुओं को हर प्रकार से सहयोग देने का वचन दिया। इससे उत्साहित होकर हिन्दुओं ने घोषणा कर दी कि चाहे कुछ हो जाए; पर गोहत्या नहीं होने दी जाएगी।

18 सितम्बर 1918 को बकरीद थी। मुसलमानों ने उन गायों का जुलूस निकाला, जिन्हें वे मारने के लिए ले जा रहे थे। ‘नारा ए तकबीर, अल्लाहो अकबर’ जैसे भड़कीले नारे लग रहे थे; पर दूसरी ओर हनुमान मन्दिर के महन्त रामपुरी जी महाराज ने भी तैयारी कर रखी थी। उनके साथ सैकड़ों हिन्दू युवकों का दल अस्त्र-शस्त्रों के साथ सन्नद्ध था। उन्होंने ‘जयकारा वीर बजंरगी, हर हर महादेव’ कहकर धावा बोल दिया और सभी गायों को छुड़ा लिया।

अधिकांश मुसलमान मार डाले गये। बाकी सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए। इस मुठभेड़ में अनेक हिन्दू भी हताहत हुए। महन्त रामपुरी के शरीर पर चाकुओं के 48 घाव लगे। अतः वे भी बच नहीं सके।

पुलिस और प्रशासन को जैसे ही मुसलमानों के वध का पता लगा, तो वह सक्रिय हो उठा। हिन्दुओं के घरों में घुसकर लोगों को पीटा गया। महिलाओं को अपमानित किया गया। 172 लोगों को जेल में बन्द कर दिया गया। गुरुकुल महाविद्यालय के कुछ छात्रों को भी इसमें फंसा दिया गया; लेकिन इसके बाद भी हिन्दू जनता का मनोबल नहीं टूटा।

कुछ दिन बाद ही अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। गुरुकुल महाविद्यालय के प्राचार्य आचार्य नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ ने वहाँ जाकर गाँधी जी को सारी बात बतायी; पर गाँधी जी किसी भी तरह मुसलमानों के विरोध में जाने को तैयार नहीं थे। अतः वे शान्त रहे; पर महामना मदनमोहन मालवीय जी परम गोभक्त थे। उनका हृदय पीड़ा से भर उठा। उन्होंने इन निर्दोष गोभक्तों पर चलने वाले मुकदमे में अपनी पूरी शक्ति लगा दी।

इसके बावजूद 8 अगस्त 1919 को न्यायालय ने चार गोभक्तों को फाँसी और थानेदार शिवदयाल सिंह सहित 135 लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी। महन्त ब्रह्मदास उदासीन तथा चौधरी जानकीदास को प्रयाग तथा डा. पूर्णप्रसाद एवं श्रीमुख चौहान को लखनऊ जेल में फाँसी दी गयी। लाला खूबचन्द पन्सारी, पण्डित आसाराम, सरदार जगदत्त, लक्ष्मीनारायण, लाला दौलतराम, पण्डित नारायण दत्त, चौधरी रघुवीर सिंह, चौधरी फतेहसिंह, पण्डित माखनलाल, लाला प्यारेलाल, श्री नन्दा आदि अनेक गोभक्तों ने अन्दमान जाकर सजा भोगी।

यदि मालवीय जी इस मुकदमे में रुचि न लेते, तो अधिकांश गोभक्तों को फांसी हो जाती; पर उनके प्रयास से अधिकांश की जान बच गयी। इस घटना से गोरक्षा के प्रति हिन्दुओं में भारी जागृति आयी। महान गोभक्त लाला हरदेव सहाय ने प्रतिवर्ष 18 सितम्बर को कटारपुर में ‘गोभक्त बलिदान दिवस’ मनाने की प्रथा शुरू की। (मालवीय जी के जन्मदिन 25 दिसम्बर पर विशेष आलेख)
 
साभार - विजय कुमार जी के लेख से !

अयोध्या एक सच


बाबर ने मुस्लिम धर्म के प्रसार के लिए मंदिर को मस्जिद बनाने का आदेश दे दिया ! मंदिर तोड़ दिया गया ! उसी के अवशेषों से तथा हिन्दुओं के रक्त से सने हुए गारे से मस्जिद का निर्माण प्रारंभ हुआ !
जब मस्जिद की दीवार १ फुट उचाई तक पहुचते पहुचते *दैवीय शक्ति * के कारण अनेको बार गिरी, तब कज़ल  अब्बास  कलंदर ने पुजारी श्यामानंद को प्रताड़ित कर, तरह तरह की यातनायें देकर दीवार बनाए जाने की पद्दति मालूम की ! तब पुजारी श्यामानंद जी ने जो जानकारियां दी थी वो इस प्रकार है -

1 . मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर चन्दन की सिल्ली पर लिखवाए..  *'सीता पाक है'*  !  यह चन्दन की सिल्ली वर्तमान में भी है !
2 . मस्जिद के बगल में बजू करने के लिए *कुआं* न बनाया जाए !  (दुनिया की सभी प्रमुख मस्जिदों के बगल में हों..जरुरी है )
3 . मंदिर की *परिक्रमा* प्रणाली मस्जिद में भी जारी की जाए  !
4 . मस्जिद का गुम्बद मंदिरों की तरह बनाया जाए !

उपर्युक्त राज़ जानने के बाद कज़ल अब्बास कलंदर ने पुजारी श्यामानंद महाराज की गर्दन कलम करवा दी और अनेको परिवर्तन कराने के पश्चात् मस्जिद बनवाने में सफल हो सकां !

Sunday, December 25, 2011

एक अटल व्यक्तित्व (श्री अटल बिहारी बाजपेई)


25 दिसम्बर सन् 1924 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ था. यूपी को राजनीतिक कर्मभूमि बनाने वाले श्री वाजपेयी आज भले ही अस्वस्थ्य होकर राजनीति से दूर हों, लेकिन उनका प्रभाव आज भी लखनऊ के लोगों पर दिखता है.
बात 1957 की है. दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फ़ चार सांसद थे. इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन से कराया गया. तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते. अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे.
वो इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि आज भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज़्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो. शायद यह बात सच हो. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं.
नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई.

पत्रकारिता -

एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र ज़रा भी आसान न था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई.
उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया.

जन संघ और बीजेपी -

1951 में वो भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे. अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया. वैसे लखनऊ में एक लोकसभा उप चुनाव में वो हार गए थे. 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया. लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे. अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी.
1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे. विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया. 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं. 1980 में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे. 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे!

सांसद से प्रधानमंत्री -

अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं. दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक. बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही. ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे.
1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे. 16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने. लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे.
1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए.
1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया. गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली.
सन् 2004 में कराये गये लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। भारत उदय का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। भाजपा विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई। वर्तमान में अटल जी राजनीति से सन्यास ले चुके हैं।

अटल जी के जीवन के कुछ तथ्य -
  • अटल जी एक ऐसे नेता है जिन्होने जो देश-हित में था वही किया|
  • आजीवन अविवाहित रहे।
  • वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता (ओरेटर) एवं सिद्ध हिन्दी कवि भी हैं।
  • परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की संभावित नाराजगी से विचलित हुए बिना उन्होंने अग्नि-दो और परमाणु परीक्षण कर देश की सुरक्षा के लिये साहसी कदम भी उठाये। सन् १९९८ में राजस्थान के पोखरण में भारत का द्वितीय परमाणु परीक्षण किया जिसे अमेरिका की सी०आई०ए० को भनक तक नहीं लगने दी।
  • अटल सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी। वह पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने गठबंधन सरकार को न केवल स्थायित्व दिया अपितु सफलता पूर्वक से संचालित भी किया।
  • अटल ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।
  • इन सबसे अलग उनके व्यक्तित्व का सबसे बडा गुण है कि वे सीधे सच्चे व सरल इन्सान हैं। उनके जीवन में किसी भी मोड पर कभी कोई व्यक्तिगत विरोधाभास नहीं दिखा।
एक कवि के रूप में -
अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं। मेरी इक्यावन कविताएं अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। इसमें ऋंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर "यक शहन्शाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम हसीनों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक" की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेकों आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी।
उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएँ हैं :
  • मृत्यु या हत्या
  • अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी वक्तव्यों का संग्रह)
  • कैदी कविराय की कुण्डलियाँ
  • संसद में तीन दशक
  • अमर आग है
  • कुछ लेख: कुछ भाषण
  • सेक्युलर वाद
  • राजनीति की रपटीली राहें
  • बिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि।


अटल जी द्वारा रचित कविता की कुछ पंक्तियां-
जीवन की ढलने लगी सांझ, उमर घट गई,
डगर कट गई, जीवन की ढलने लगी सांझ।
बदले हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ, शान्ति बिना खुशियां हैं बांझ।
सपनों में मीत, बिखरा संगीत,
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।

अटल जी का कथन  -   
भारत को लेकर मेरी एक दृष्टि है- ऐसा भारत जो भूख और डर से, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो-
अटल बिहारी वाजपेयी

पाठकों के लिए अटल जी की कुछ दुर्लभ छावियें -



कुछ कवितियें -

दूध में दरार पड़ गई

जो थे अपने पल में हो गये पराये, अब किस मुंह से अपनों को बुलाएं, पल में सब बदल गया, वो बेठे हैं घात लगाये? क्यों हाथों में कटार पड गई? क्यों दूध में दरार पड गई?
हिंद भी तो पाक है, और पाक कब नापाक है? तो मुद्दा क्या,और मसला क्या, क्युं नफरत की मार पड गई? क्युं दूध में दरार पड गई?

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

खेतों में बारूदी गंध,
टुट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्याथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

झुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते