Monday, January 9, 2012

गांधीजी की सेक्स लाइफ



महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। ऐसे में इस किताब में लिखी बाते लोगों ख़ासकर, गांधीभक्तों को शायद ही हजम हों। दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। वह अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं। जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। कहना न होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया।


क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बीहैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है। महात्मा गांधी पर लिखी किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद “गांधीः नैक्ड ऐंबिशन” को किताब का रूप दिया है।

किताब में वैसे तो नया कुछ नहीं है। राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली महिलाओं और लड़कियों के साथ गांधी के आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डाला गया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में “नग्न स्नान” भी करते थे।


किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।
 
नई किताब यह खुलासा करती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतप्त किया जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर शेयर करती थीं। बहरहाल, ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद वकील से गुरु बने गांधी की इमैज कठोर नेता की बनी जो अपने अनोखी सेक्सुअल डिमांड से अनुयायियों को वशीभूत कर लेता है। आमतौर पर लोग के लिए यह आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश 
हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे। अपनी इच्छा को दमित करने के लिए ही उन्होंने कठोर परिश्रम का अनोखा स्वाभाव अपनाया जो कई लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता।

किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया है, जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।”

किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।” ऐडम का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही। जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है।


ऐडम्स के मुताबिक गांधी अपने लिए महात्मा संबोधन पसंद नहीं करते थे और वह अपने आध्यात्मिक कार्य में मशगूल रहे। गांधी की मृत्यु के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर लीपापोती की जाती रही। हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं।


किताब में ऐडम्स दावा करते हैं कि सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर, मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।


ऐडम्स ने कहा है कि नब्बे के दशक में उसे अपनी किताब “द डाइनैस्टी” लिखते समय गांधी और नेहरू के रिश्ते के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। इसके बाद लेखक की तमन्ना थी कि वह गांधी के जीवन को अन्य लोगों के नजरिए से किताब के जरिए उकेरे। यह किताब उसी कोशिश का नतीजा है। जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे।


इस बारे में ऐडम्स ने स्वीकार किया है कि यह किताब विवाद से घिरेगी। उन्होंने कहा, “मैं जानता हूं इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की, मुझे बधाई दी।” 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी। \'गांधीः नैक्ड ऐंबिशन\' का लंदन यूनिवर्सिटी में विमोचन हो चुका है। किताब में गांधी की जीवन की तक़रीबन हर अहम घटना को समाहित करने की कोशिश की गई है। जैड ऐडम्स ने गांधी के महाव्यक्तित्व को महिमामंडित करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि उनके सेक्स-जीवन की इस तरह व्याख्या की है कि गांधीवादियों और कांग्रेसियों को इस पर सख़्त ऐतराज़ हो सकता है।

Wednesday, December 28, 2011

ताजमहल की असलियत





यह इतना विस्तृत लेख है की इस लेख के सम्बन्ध में मुझे कुछ लिखने की ज़रुरत नही बस जानकारी को बढाना है इसीलिए लिंक दे रहा हूँ - http://tajmahal.gaupal.in/bhumika

Monday, December 26, 2011

गोभक्त मालवीय जी

स्वतन्त्रता से पूर्व देश में अनेक स्थानों पर मुसलमानों द्वारा खुलेआम गोहत्या की जाती थी। इससे हिन्दू भड़क जाते थे और दोनों समुदाय आपस में लड़ने लगते थे। अंग्रेज तो यही चाहते थे। इसलिए वे गोहत्या को प्रश्रय देते थे। गोभक्तों के अनुपम बलिदान की यह घटना 1918 की है।


हिन्दुओं के प्रसिद्ध तीर्थ हरिद्वार के निकट ग्राम कटारपुर के मुसलमानों ने बकरीद पर बड़ी संख्या में गोहत्या करने की घोषणा की। हिन्दुओं ने ज्वालापुर थाने पर शिकायत की; पर वहाँ का थानेदार मुसलमान था। वस्तुतः उसकी शह पर ही यह हो रहा था। हरिद्वार में शिवदयाल सिंह थानेदार थे। उन्होंने हिन्दुओं को हर प्रकार से सहयोग देने का वचन दिया। इससे उत्साहित होकर हिन्दुओं ने घोषणा कर दी कि चाहे कुछ हो जाए; पर गोहत्या नहीं होने दी जाएगी।

18 सितम्बर 1918 को बकरीद थी। मुसलमानों ने उन गायों का जुलूस निकाला, जिन्हें वे मारने के लिए ले जा रहे थे। ‘नारा ए तकबीर, अल्लाहो अकबर’ जैसे भड़कीले नारे लग रहे थे; पर दूसरी ओर हनुमान मन्दिर के महन्त रामपुरी जी महाराज ने भी तैयारी कर रखी थी। उनके साथ सैकड़ों हिन्दू युवकों का दल अस्त्र-शस्त्रों के साथ सन्नद्ध था। उन्होंने ‘जयकारा वीर बजंरगी, हर हर महादेव’ कहकर धावा बोल दिया और सभी गायों को छुड़ा लिया।

अधिकांश मुसलमान मार डाले गये। बाकी सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए। इस मुठभेड़ में अनेक हिन्दू भी हताहत हुए। महन्त रामपुरी के शरीर पर चाकुओं के 48 घाव लगे। अतः वे भी बच नहीं सके।

पुलिस और प्रशासन को जैसे ही मुसलमानों के वध का पता लगा, तो वह सक्रिय हो उठा। हिन्दुओं के घरों में घुसकर लोगों को पीटा गया। महिलाओं को अपमानित किया गया। 172 लोगों को जेल में बन्द कर दिया गया। गुरुकुल महाविद्यालय के कुछ छात्रों को भी इसमें फंसा दिया गया; लेकिन इसके बाद भी हिन्दू जनता का मनोबल नहीं टूटा।

कुछ दिन बाद ही अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। गुरुकुल महाविद्यालय के प्राचार्य आचार्य नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ ने वहाँ जाकर गाँधी जी को सारी बात बतायी; पर गाँधी जी किसी भी तरह मुसलमानों के विरोध में जाने को तैयार नहीं थे। अतः वे शान्त रहे; पर महामना मदनमोहन मालवीय जी परम गोभक्त थे। उनका हृदय पीड़ा से भर उठा। उन्होंने इन निर्दोष गोभक्तों पर चलने वाले मुकदमे में अपनी पूरी शक्ति लगा दी।

इसके बावजूद 8 अगस्त 1919 को न्यायालय ने चार गोभक्तों को फाँसी और थानेदार शिवदयाल सिंह सहित 135 लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी। महन्त ब्रह्मदास उदासीन तथा चौधरी जानकीदास को प्रयाग तथा डा. पूर्णप्रसाद एवं श्रीमुख चौहान को लखनऊ जेल में फाँसी दी गयी। लाला खूबचन्द पन्सारी, पण्डित आसाराम, सरदार जगदत्त, लक्ष्मीनारायण, लाला दौलतराम, पण्डित नारायण दत्त, चौधरी रघुवीर सिंह, चौधरी फतेहसिंह, पण्डित माखनलाल, लाला प्यारेलाल, श्री नन्दा आदि अनेक गोभक्तों ने अन्दमान जाकर सजा भोगी।

यदि मालवीय जी इस मुकदमे में रुचि न लेते, तो अधिकांश गोभक्तों को फांसी हो जाती; पर उनके प्रयास से अधिकांश की जान बच गयी। इस घटना से गोरक्षा के प्रति हिन्दुओं में भारी जागृति आयी। महान गोभक्त लाला हरदेव सहाय ने प्रतिवर्ष 18 सितम्बर को कटारपुर में ‘गोभक्त बलिदान दिवस’ मनाने की प्रथा शुरू की। (मालवीय जी के जन्मदिन 25 दिसम्बर पर विशेष आलेख)
 
साभार - विजय कुमार जी के लेख से !

अयोध्या एक सच


बाबर ने मुस्लिम धर्म के प्रसार के लिए मंदिर को मस्जिद बनाने का आदेश दे दिया ! मंदिर तोड़ दिया गया ! उसी के अवशेषों से तथा हिन्दुओं के रक्त से सने हुए गारे से मस्जिद का निर्माण प्रारंभ हुआ !
जब मस्जिद की दीवार १ फुट उचाई तक पहुचते पहुचते *दैवीय शक्ति * के कारण अनेको बार गिरी, तब कज़ल  अब्बास  कलंदर ने पुजारी श्यामानंद को प्रताड़ित कर, तरह तरह की यातनायें देकर दीवार बनाए जाने की पद्दति मालूम की ! तब पुजारी श्यामानंद जी ने जो जानकारियां दी थी वो इस प्रकार है -

1 . मस्जिद के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर चन्दन की सिल्ली पर लिखवाए..  *'सीता पाक है'*  !  यह चन्दन की सिल्ली वर्तमान में भी है !
2 . मस्जिद के बगल में बजू करने के लिए *कुआं* न बनाया जाए !  (दुनिया की सभी प्रमुख मस्जिदों के बगल में हों..जरुरी है )
3 . मंदिर की *परिक्रमा* प्रणाली मस्जिद में भी जारी की जाए  !
4 . मस्जिद का गुम्बद मंदिरों की तरह बनाया जाए !

उपर्युक्त राज़ जानने के बाद कज़ल अब्बास कलंदर ने पुजारी श्यामानंद महाराज की गर्दन कलम करवा दी और अनेको परिवर्तन कराने के पश्चात् मस्जिद बनवाने में सफल हो सकां !

Sunday, December 25, 2011

एक अटल व्यक्तित्व (श्री अटल बिहारी बाजपेई)


25 दिसम्बर सन् 1924 को श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ था. यूपी को राजनीतिक कर्मभूमि बनाने वाले श्री वाजपेयी आज भले ही अस्वस्थ्य होकर राजनीति से दूर हों, लेकिन उनका प्रभाव आज भी लखनऊ के लोगों पर दिखता है.
बात 1957 की है. दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फ़ चार सांसद थे. इन सासंदों का परिचय तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन से कराया गया. तब राष्ट्रपति ने हैरानी व्यक्त करते हुए कहा कि वो किसी भारतीय जन संघ नाम की पार्टी को नहीं जानते. अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे.
वो इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि आज भारतीय जनता पार्टी के सबसे ज़्यादा सांसद हैं और शायद ही ऐसा कोई होगा जिसने बीजेपी का नाम न सुना हो. शायद यह बात सच हो. लेकिन यह भी सच है कि भारतीय जन संघ से भारतीय जनता पार्टी और सांसद से देश के प्रधानमंत्री तक के सफ़र में अटल बिहारी वाजपेयी ने कई पड़ाव तय किए हैं.
नेहरु-गांधी परिवार के प्रधानमंत्रियों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी का नाम भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओँ में शामिल होगा जिन्होंने सिर्फ़ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर सरकार बनाई.

पत्रकारिता -

एक स्कूल टीचर के घर में पैदा हुए वाजपेयी के लिए शुरुआती सफ़र ज़रा भी आसान न था. 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर के एक निम्न मध्यमवर्ग परिवार में जन्मे वाजपेयी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा ग्वालियर के ही विक्टोरिया ( अब लक्ष्मीबाई ) कॉलेज और कानपुर के डीएवी कॉलेज में हुई.
उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में अपना करियर शुरु किया. उन्होंने राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन का संपादन किया.

जन संघ और बीजेपी -

1951 में वो भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य थे. अपनी कुशल वक्तृत्व शैली से राजनीति के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने रंग जमा दिया. वैसे लखनऊ में एक लोकसभा उप चुनाव में वो हार गए थे. 1957 में जन संघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया. लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत ज़ब्त हो गई लेकिन बलरामपुर से चुनाव जीतकर वो दूसरी लोकसभा में पहुंचे. अगले पाँच दशकों के उनके संसदीय करियर की यह शुरुआत थी.
1968 से 1973 तक वो भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे. विपक्षी पार्टियों के अपने दूसरे साथियों की तरह उन्हें भी आपातकाल के दौरान जेल भेजा गया. 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. इस दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वो इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताते हैं. 1980 में वो बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे. 1980 से 1986 तक वो बीजेपी के अध्यक्ष रहे और इस दौरान वो बीजेपी संसदीय दल के नेता भी रहे!

सांसद से प्रधानमंत्री -

अटल बिहारी वाजपेयी अब तक नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं. दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक. बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही. ख़ासतौर से 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हो गए थे.
1962 से 1967 और 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे. 16 मई 1996 को वो पहली बार प्रधानमंत्री बने. लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इसके बाद 1998 तक वो लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे.
1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस ले लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए.
1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया. गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली.
सन् 2004 में कराये गये लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। भारत उदय का नारा दिया। इस चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। भाजपा विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई। वर्तमान में अटल जी राजनीति से सन्यास ले चुके हैं।

अटल जी के जीवन के कुछ तथ्य -
  • अटल जी एक ऐसे नेता है जिन्होने जो देश-हित में था वही किया|
  • आजीवन अविवाहित रहे।
  • वे एक ओजस्वी एवं पटु वक्ता (ओरेटर) एवं सिद्ध हिन्दी कवि भी हैं।
  • परमाणु शक्ति सम्पन्न देशों की संभावित नाराजगी से विचलित हुए बिना उन्होंने अग्नि-दो और परमाणु परीक्षण कर देश की सुरक्षा के लिये साहसी कदम भी उठाये। सन् १९९८ में राजस्थान के पोखरण में भारत का द्वितीय परमाणु परीक्षण किया जिसे अमेरिका की सी०आई०ए० को भनक तक नहीं लगने दी।
  • अटल सबसे लम्बे समय तक सांसद रहे हैं और जवाहरलाल नेहरू व इंदिरा गांधी के बाद सबसे लम्बे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी। वह पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने गठबंधन सरकार को न केवल स्थायित्व दिया अपितु सफलता पूर्वक से संचालित भी किया।
  • अटल ही पहले विदेश मंत्री थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।
  • इन सबसे अलग उनके व्यक्तित्व का सबसे बडा गुण है कि वे सीधे सच्चे व सरल इन्सान हैं। उनके जीवन में किसी भी मोड पर कभी कोई व्यक्तिगत विरोधाभास नहीं दिखा।
एक कवि के रूप में -
अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी हैं। मेरी इक्यावन कविताएं अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह है। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ताजमहल थी। इसमें ऋंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर "यक शहन्शाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम हसीनों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक" की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता। राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेकों आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी।
उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएँ हैं :
  • मृत्यु या हत्या
  • अमर बलिदान (लोक सभा में अटल जी वक्तव्यों का संग्रह)
  • कैदी कविराय की कुण्डलियाँ
  • संसद में तीन दशक
  • अमर आग है
  • कुछ लेख: कुछ भाषण
  • सेक्युलर वाद
  • राजनीति की रपटीली राहें
  • बिन्दु बिन्दु विचार, इत्यादि।


अटल जी द्वारा रचित कविता की कुछ पंक्तियां-
जीवन की ढलने लगी सांझ, उमर घट गई,
डगर कट गई, जीवन की ढलने लगी सांझ।
बदले हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ, शान्ति बिना खुशियां हैं बांझ।
सपनों में मीत, बिखरा संगीत,
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।

अटल जी का कथन  -   
भारत को लेकर मेरी एक दृष्टि है- ऐसा भारत जो भूख और डर से, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो-
अटल बिहारी वाजपेयी

पाठकों के लिए अटल जी की कुछ दुर्लभ छावियें -



कुछ कवितियें -

दूध में दरार पड़ गई

जो थे अपने पल में हो गये पराये, अब किस मुंह से अपनों को बुलाएं, पल में सब बदल गया, वो बेठे हैं घात लगाये? क्यों हाथों में कटार पड गई? क्यों दूध में दरार पड गई?
हिंद भी तो पाक है, और पाक कब नापाक है? तो मुद्दा क्या,और मसला क्या, क्युं नफरत की मार पड गई? क्युं दूध में दरार पड गई?

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

खेतों में बारूदी गंध,
टुट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्याथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

झुक नहीं सकते

टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
 



Friday, December 23, 2011

हिन्दू सहनशीलता है या नपुंसक


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Monday, December 19, 2011

मुस्लिमों द्वारा हरे कृष्ण मंदिर, डेनमार्क पर हमला

 
दिनांक 6.12.2011 को मंदिर में 20.४५ बजे मुस्लिम पृष्ठभूमि के गुंडों के एक समूह द्वारा हमला किया गया था! ये सभी लोग बेसबॉल बैट और अन्य हथियारों से लैस थे ! ये लोग आवासीय मंदिर निर्माण के खिलाफ पहले पत्थर फेंक रहे थे, जिससे पहले तो आश्रम की खिड़की टूटी हुई ! मंदिर अध्यक्ष ने पुलिस को तुरन्त बुलाया! एक पुलिस अधिकारी ने पहले कुछ लोगों को पकड़ लिया फिर नोटिस देकर छोड़ दिया ! परिणामस्वरूप आधे घंटे बाद हमलावरों का एक बड़ा समूह फिर पत्थर फेंकने, उद्यान में प्रवेश, तुलसी कमरे में घुसने की कोशिश की तथा प्रत्यक्ष शारीरिक संघर्ष की मांग की ! क्योंकि मंदिर के करीबी एक मुस्लिम स्कूल भी है, यह बहुत संभव है कि इन दो घटनाओं से संबंधित हैं ! खिड़की से देखने पर उनमें से ज्यादातर 18 साल की उम्र के नवयुवक थे !
 
इस घटना में डेनमार्क की पुलिस भी उदासीन है, शायद इसलिए मंदिर के देखभाल करने बालों का कहना है की - "हमें पुलिस से कोई सुरक्षा की उम्मीद नहीं है और हम तो एक बार फिर पूरी तरह से श्री श्री भगवान न्र्सिम्हादेवा और श्री कृष्ण की दया पर ही निर्भर है !
 
अब इन घटनाओं को देककर सेकुलर लोग क्यों आँखे फिर लेते है ! अब हिन्दुओं को भी जानना चयिएँ की उनका कोई हितेषी नहीं ! अपने सम्मान की रक्षा उन्हें खुद ही करनी पड़ेगी ! 

रूस में लगा भगवतगीता एवं इस्कॉनपर प्रतिबंध !




[PTI An ISKCON follower holds a placard during an agitation in front of Consulate General of the Russian Federation Office in Kolkata on Monday]

मास्को, १७ दिसंबर - रशिया में न्यायालय ने एक आदेश द्वारा भगवतगीता पर प्रतिबंध लगाया है । इस आदेश में ऐसा आरोप लगाया गया है कि हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ भगवतगीता अन्य धर्मियों के विषय में द्वेष फ़ैलाता है ।
१. युरोप में हिंदु धर्म की बढती लोकप्रियता एवं इस्कॉन द्वारा जारी भगवान श्रीकृष्ण के अद्वितीय लीलाओं के प्रचार के कारण रशिया के धर्मांध चर्च भयभीत हो गए हैं ।

२. भगवतगीता अन्य धर्मियों के विरोध में द्वेष फैलाती है, ऐसा आरोप लगाकर रशियन शासन द्वारा सितंबर महिने में टॉम्स्क के जनपद न्यायालय में भगवद्गीता के विरोध में अभियोग प्रविष्ट किया गया है। रशियन शाखा के प्रवक्ता युरी प्लेशाकोवने कहा है कि यह अभियोग हास्यास्पद है । उन्होंने यह भी कहा कि भगवतगीता भारतीयोंका पवित्र ग्रंथ है तथा इस ग्रंथके साथ १०० करोड हिंदुओंको आतंकवादी कहना घातक है । 

३. जिला न्यायालय के न्यायाधीश गलिना बुटेंकोने इस प्रकरण में तज्ञोंसे परामर्श मांगा है ।
४. इस विषयमें प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय हिंदु धर्म के गहन अभ्यासक बोरीस फालिकोवने कहा है कि इस प्रकरण में प्रस्तुत किए गए साक्ष्य निराधार हैं । फालिकोव ने कहा कि भगवतगीता को त्याज्य ठहराने के विषयमें इस प्रकार अवैधानिक पद्धतिका उपयोग किया, तो कुरान एवं बाइबल ग्रंथोंको तो निश्चितरूपसे आतंकवादी ग्रंथ ठहरा सकते हैं । उन्होंने यह भी कहा कि मूल भगवद्गीताका विश्वभर में आदर किया जाता है । लिओ टॉलस्टॉय एवं अल्बर्ट आईन्स्टाईनने भी भगवतगीता का सम्मान किया है

नोट : गीता पर रूस में लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में दो रशियन व्यक्तियों द्वारा आवाज उठाई जा रही है; परंतु हिंदु बहुसंख्यक भारतमें प्रसार माध्यम एवं हिंदुत्ववादी संगठन चुप्पी साधे बैठे हैं । हिंदुओ, इस विषयमें इन संगठनोंके नेताओं से पूछें !

  प्रतिबंध लगाने वाले जरा इसे देख ले -

 क्या प्रतिबंध लगाने इन्हें रोक सकते है ?

हिंदु समाजपर नया संकट - Communal Violence Bill

Friday, December 16, 2011

अपराजेय अयोध्या : अयोध्या एक यात्रा (भाग - 1)




Source: IBTL

इस श्रृंखला के लेख IBTL से लिए गए है ! इनका श्रेय IBTL को ही दिया जाये !

अयोध्या अपने शाब्दिक अर्थ के अनुसार यह अपराजित है.. यह नगर अपने २२०० वर्षों के इतिहास मे अनेकों युद्धों व संघर्षो का प्रत्यक्ष दर्शी रहा है, अयोध्या को राजा मनु द्वारा निर्मित किया गया और यह श्री राम जी का जन्मस्थल है। इसका उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रंथों जिसमे रामायण व महाभारत सम्मिलित हैं, में आता है। वाल्मिकि रामायण के एक श्लोक मे इसका वर्णन निम्न प्रकार है।

कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्। निविष्ट सरयूतीरे प्रभूत-धन-धान्यवान् ॥१-५-५॥
अयोध्या नाम नगरी तत्रऽऽसीत् लोकविश्रुता। मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् ॥१-५-६॥
— श्रीमद्वाल्मीकीरामायणे बालकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः

श्री ग्रिफैत्स जो 19 शताब्दी के आख़िर मे बनारस कॉलेज के मुख्य अध्यापक रहे... उन्होने रामायण मे अयोध्या के वर्णन को बड़ी सुंदरता से इस प्रकार अनुवादित किया, उनके शब्दों के अनुसार - " उस नगरी के विशाल एवं सुनियोजित रास्ते और उसके दोनो ओर से निकली पानी की नहरें जिस से राजपथ पर लगे पेड़ तरो ताज़ा रहें और अपने फूलो की महक को फैलाते रहें। एक कतार से लगे हुए और सतल भूमि पर बने बड़े बड़े राजमहल हैं, अनेक मंदिर एवं बड़ी बड़ी कमानें, हवा मे लहराता विशाल राज ध्वज, लहलहाते आम के बगीचे, फलों और फूलों से लदे पेड़, मुंडेर पर कतार से लगे फहराते ध्वजों के इर्द गिर्द और हर द्वार पर धनुष लिए तैनात रक्षक हैं। "
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कौशल राज्य के नरेश राजा दशरथ राजा मनु के ५६ वंशज माने जाते हैं, उनकी ३ पत्नियां थी, कौशल्या, सुमीत्रा व कैकेयी, ऐसा माना जाता है श्री राम का जन्म कौशल्या मंदिर मे हुआ था, अतः उसे ही राम जन्म स्थल कहा जाता है. ब्रह्मांड पुराण में अयोध्या को हिंदुओं ६ पवित्र नगरियों से भी अधिक पवित्र माना गया है। जिसका उल्लेख इस पुराण मे इस प्रकार किया गया है -

अयोध्य मथुरा माया, काशी कांचि अवंतिका, एताः पुण्यतमाः प्रोक्ताः पुरीणाम उत्तमोत्तमाः

महर्षि व्यास ने श्री राम कथा का वर्णन उनके द्वारा रचित महाभारत के वनोपाख्यान खंड मे किया है, अयोध्या सदियों से अयोध्या वासियों द्वारा बारंबार निर्मित की गयी है, यह अयोध्या वासियोम की जिजीविषा ही है कि वह इस नगर को अनेकानेक बार पुनर्रचित कर चुके हैं। अलक्षेंद्र (सिकंदर) के लगभग २०० वर्ष बाद, मौर्य शासन काल के दौरान जब बौद्ध धर्म अपनी चरम सीमा पर था, एक ग्रीक राजा मेनंदार अयोध्या पर आक्रमण करनी की नीयत से आया, उसने बुद्ध धर्म द्वारा प्रभावित होने का ढोंग कर बौद्ध भिक्षु होने का कपट किया और अयोध्या पर धोखे से आक्रमण किया एवं इस आक्रमण मे जन्मस्थल मंदिर ध्वस्त हुआ, किंतु सिर्फ़ 3 महीने मे शुंग वंशिय राजा द्युमतमतसेन द्वारा मेनंदार पराजित किया गया और अयोध्या को स्वतंत्र कराया गया।

जन्म स्थान मंदिर की पुनर्रचना राजा विक्रमादित्य ने की, इतिहास मे 6 विक्रमादित्यो का उल्लेख आता है, इस बात पर इतिहासविद एक मत नही है कि किस विक्रमादित्य ने मंदिर का निर्माण किया। कुछ के अनुसार वो विक्रमादित्य जिसने शको को सन ५६ ई.पू. मे पराजित किया और जिसके नाम से शक संवत चलता है, तो कुछ कहते हैं स्कंदगुप्त जो स्वयं को विक्रमादित्य कहलाता था, उसने 5 वी शताब्दी के अंत मे मंदिर निर्माण किया। पी. करनेगी की किताब " ए हिस्टॉरिकल स्कैच ऑफ फ़ैज़ाबाद " मे कही बात साधारणतया सर्वमान्य है। उसमे वो कहते हैं, विक्रमादित्य के पुरातन शहर ढूँढने का मुख्य सूत्र यह है कि जहाँ सरयू बहती है और भगवान शंकर का रूप नागेश्वर नाथ मंदिर जहाँ है। ये भी माना जाता है की विक्रमादित्या ने करीब ३६० मंदिर अयोध्या मे बनवाए और इसके बाद हिंदुओं द्वारा श्री राम की पूजा निरंतर चलती रही.. इसकी पुष्टि नासिक स्थित सातवाहन राजा द्वारा बनाई पुरातन गुफा के शिला लेख मे मिलती है, बहुचर्चित संस्कृत नाटककार भास ने भगवान राम को अर्चना अवतार मे जोड़ा है।

नमो भगवते त्रैलोक्यकारणाय नारायणाय
ब्रह्मा ते ह्रदयं जगतत्र्यपते रुद्रश्च कोपस्तव
नेत्र चंद्रविकाकरौ सुरपते जिव्हा च ते भारती
सब्रह्मेन्द्रमरुद्रणं त्रिभुवनं सृष्टं त्वयैव प्रभो
सीतेयं जलसम्भवालयरता विश्णुर्भवान ग्रह्यताम

श्री राम को विष्णु अवतार मे पूजा जाने की परंपरा है, जिसका प्रमाण पुरानी दस्तकारी एवं शिला लेखों मे मिलते हैं। चौथी शताब्दी के रामटेक मंदिर की दस्तकारी, सन ४२३ ए.डी. का कंधार का शिलालेख, सन ५३३ ए.डी. का बादामी का चालुक्य शिलालेख, आठवीं शताब्दी (ए.डी) का मामल्लापुरम का शिलालेख, ११वीं शताब्दी में जोधपुर के नज़दीक बना अंबा माता मंदिर, ११४५ ए.डी. का रेवा जिले के मुकुंदपुर में बना राम मंदिर, ११६८ ए.डी. का हँसी शिलालेख, रायपुर जिले के राजीम मे बना राजीव लोचन मंदिर इनमे से कुछ हैं।

१२ शताब्दी में अयोध्या मे पांच मंदिर थे, गौप्रहार घाट का गुप्तारी, स्वर्गद्वार घाट का चंद्राहरी, चक्रतीर्थ घाट का विष्णुहरी, स्वर्गद्वार घाट का धर्महरी, और जन्मभूमि स्थान पर विष्णु मंदिर, इसके बाद जब महमूद ग़ज़नवी ने भारत पर आक्रमण किया तो उसने सोमनाथ को लूटा और वापस चला गया. किंतु उसका भतीजा सालार मसूद अयोध्या की ओर बढ़ा, १४ जून १०३३ को मसूद अयोध्या से ४० किलोमीटर दूर बहराइच पहुँचा, यहाँ सुहैल देव के नेतृत्व मे सेना एकत्र हुई और मसूद पर आक्रमण किया दिया, जिसमे मसूद की सेना परास्त हुई, और मसूद मारा गया. मसूद के चरित्रकार अब्दुल रहमान चिश्ती मिरात ए मसूदी मे कहते हैं,

" मौत का सामना है, फिराक़ सूरी नज़दीक है, हिंदुओं ने जमाव किया है, इनका लश्कर बे-इंतेहाँ है. नेपाल से पहाड़ों के नीचे घाघरा तक फौज मुखालिफ़ का पड़ाव है। मसूद की मौत के बाद अजमेर से मुज़फ्फर ख़ान तुरंत आया, पर वो भी मारा गया... अरब ईरान के हर घर का चिराग बुझा है। "

अपराजेय अयोध्या : अयोध्या एक यात्रा (भाग - 2)


  Source: IBTL

अपराजेय अयोध्या : अयोध्या एक यात्रा से आगे पढ़ें : इसके पश्चात फिर से राम भक्ति की परंपरा चलती रही, कई साहित्यिक एवं धार्मिक श्रोत अयोध्या महात्म्य में नज़र आते हैं जो १२ या १३ शताब्दी मे लिखा गया। अयोध्या महात्म्य में अनेकों जगह ऐसी कई बातें हैं, जो अयोध्या को महानतम मोक्ष मुक्तिदायक बनाते हैं।

तस्मात स्थानवं एशाने रामजन्म प्रवर्तते, जन्मस्थातं इदं प्रोक्त मोक्षादिफलसाधनं
विघ्नेश्वरात्पूर्वमागे वसिष्ठात उत्तरेतथा लौमशात पश्च्मे भागे जन्मस्थानं तत

अयोध्या मयात्म्य मे जन्मस्थान का विवरण और उसके निश्चित जगह का ब्यौरा है, और इसके साथ ही यह भी लिखा है कि रामनवमी के दिन जन्मस्थान के दर्शन से पुनर्जन्म टलता है। मोक्ष मिलता है, लाखों हिंदु अयोध्या महात्म्य मे लिखी बातों का विश्वास कर अयोध्या जाते रहे।

१५२६ मे मध्य एशिया के फरगाना प्रांत से बाबर का प्रवेश हुआ, १६ मार्च १५२७ को बाबर ने राणा सांगा को हरा कर दिल्ली पर कब्जा किया, यह मुगल साम्राज्य की शुरुआत थी, कुछ समय बाद बाबर ने अपने  सिपहसालार मीर बाकी को अयोध्या पर आक्रमण करने का आदेश दिया। " शहंशाह हिंद बादशाह बाबर के हुक्म व हजरत जलालशाह के हुक्म के बामुजिन अयोध्या मे रामजन्मभूमि को मिस्मार कर के उसकी जगह पर उसी के मलबे और मसाले से मस्जिद तामीर करने की इजाजत दे दी गई है, बाजरिये इस हुक्म नामे के तुमको बतौर इत्तिला से आगाह किया जाता है कि हिंदुस्तान के किसी सूबे से कोई भी हिंदू अयोध्या ना जाने पावे, जिस शख्स पर ये शुबहा हो कि वो वहॉ जाना चाहता है, उसे फौरन गिरफ्तार कर के दाखिल ए जिंदा कर दिया जावे, हुक्म का सख्ती से तामील हो, फर्ज समझ कर। "
(यह आदेश पत्र ६ जुलाई १९२४ के मॉडर्न रिव्यू के दिल्ली से प्रकाशित अंक मे प्रकाशित हुआ है.)

२३ मार्च १५२८ तक एक लाख सत्तर हजार से अधिक लोग जन्म भूमि स्थान पर लडते लडते मारे गये और अंत मे हार गये। मीर बाकी ने बाबर के आदेशों का पालन करते हुए जन्मस्थल मंदिर को ध्वस्त किया और उसी स्थान पर मस्जिद बनाई। कहा जाता है जब मीर बाकी के लोग मस्जिद बना रहे थे, तो प्रत्येक दिन को होने वाला काम रात को ढह जाता था. बाबर ने अपने आत्म चरित्र ताजुक ए बाबरी मे लिखा है।

" अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर को मिस्मार करके जो मस्जिद तामीर की जा रही है उसकी दीवारें शाम को आप से आप गिर जाती हैं। इस पर मैने खुद जा के सारी बातें अपनी ऑखो से देख कर चंद हिंदू ओलियाओं कीरों को बुला कर ये मसला उन के सामने रखा। इस पर उन लोगों ने कई दिनों तक गौर करने के बाद मस्जिद में चंद तरमीमें करने की राय दी। जिनमें पाँच ख़ास बातें थी... यानी मस्जिद का नाम सीता पाक या रसोई रखा जाए, परिक्रमा रहने दी जाए, सदर गुंबद के दरवाजे में लकड़ी लगा दी जाए, मीनारें गिना दी जाए, और हिंदुओं को भजन पाठ करने दिया जावे। उनकी राय मैने मान ली, तब मस्जिद तैयार हो सकी। "

यहां एक विचार बहुत आश्चर्यजनक है, मीनारें किसी भी मस्जिद का एक प्रमुख हिस्सा होती है, जबकि परिक्रमा हिंदू मंदिरों का, बनाई गई मस्जिद में ये दो अपवाद हिंदुओं के मंदिर को बिना मूर्ति के मंदिर मे परिवर्तित करने जैसा ही है। इस ढांचे का नाम सीता पाक रखा गया जो बाद मे बाबरी मस्जिद नाम से प्रचारित किया गया।

१२ अप्रैल १५२८ से १८ सितंबर १५२८ तक के बाबर की दिनचर्या के विवरण उपलब्ध नही हैं, शायद दिनचर्या के ये पन्ने १७ मई १५२९ के तूफान मे या १५४० के हुमांयु के रेगिस्तान में निवास के कारण नष्ट हुए हों। ३ जून १५२८ को सनेथु के देवीदीन पांडे और महावत सिंह ने मीरबाकी पर हमला किया, स्वयं देवीदीन पांडे ने ५ दिन मे ६०० सैनिको को मार गिराया। किंतु बाद मे देवीदीन को मीरबाकी ने मार गिराया। १५२९ को ईद के दिन राणा रण विजय ने जन्मस्थल की मुक्ति के लिये फिर प्रयास किया, किंतु कुछ ना हो सका। १५३० मे बाबर की मृत्यु हुई, उसके पश्चात उसके पुत्र हुमायू ने गद्दी संभाली, उसके शासन काल मे १५३० से १५५६ तक रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरा नंद ने जन्मस्थान की मुक्ति हेतु १० बार प्रयास किया। जन्मभूमि का नियंत्रण बार बार एक पक्ष से दूसरे पक्ष की ओर जाता रहा।

राम से बाबर तक : अयोध्या एक यात्रा (भाग - 3)



Source: IBTL
राम से बाबर तक : अयोध्या एक यात्रा से आगे पढ़ें ... हुमायूँ के बाद अकबर का शासन काल आया, उसने अपने राज्य को १२ भागो मे विभक्त किया, अनुमानित है कि अकबर के शासन काल मे हिंदुओं ने लगभग २० बार जन्मभूमि को स्वतंत्र कराने की लडाईयां लडी, अकबर ने हिंदुओं के अधिकार को मान्यता देते हुए मस्जिद के बिल्कुल आगे एक चबूतरा बनाने और पूजा करने का अधिकार दिया, यही चबूतरा आज राम चबूतरा के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही अकबर ने राम और सीता मुद्रित चांदी के सिक्के (रामटका) भी बनवाये. और रामायण की सचित्र किताबे भी बनवाई. अकबरनामा व आइना ए अकबरी के लेखक अबुल फजल अयोध्या को राम का निवास व हिंदुओ की पुण्यभूमि मानते हैं।

जहांगीर के शासन काल मे १६०८ व १६११ के बीच विलियम फिंच ने अयोध्या की यात्रा की, उन्होंने भी अयोध्या में राम के होने की पुष्टि अपने लेख में की जिसे विलियम फोस्टर ने अपनी पुस्तक " अर्ली  ट्रेवल्स इन इंडिया " मे शामिल किया। १८५८ के बाद औरंगजेब के सरदार जांबाज खान ने अयोध्या पर हमला किया किंतु परास्त हुआ, गुरु गोविंद सिंह जी के अकालियों ने उसे रुदाली और सादातगंज मे हराया। १६६४ मे औरंगजेब स्वयं अयोध्या पहुंचा और राम चबूतरा तोडने के साथ साथ १०००० हिंदुओ को भी मार डाला.  लेकिन उसके बाद भी रामनवमी का पर्व अयोध्या मे मनाया जाता रहा. नवाब सलामत खान ने भी अमेठी के राजा गुरदत्त सिंह और पिंपरा के राजकुमार सिंह के साथ लडाई की। सादिक अली ने भी जन्मस्थान पर कब्जा करने की ५ लडाईयां छेडी।
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Eng : From Akbar to Indian Independence : Ayodhya - a journey through time
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१७५१ मे अवध के दूसरे नवाब सफदरजंग ने मराठाओं के सरदार मल्हार राव होल्कर को पठानों के विरुद्ध लडने के लिये आमंत्रित किया। मल्हार राव होल्कर ने समर्थन के लिये एक शर्त रखी कि हिंदुओं को उनके ३ तीर्थ स्थल अयोध्या, काशी और प्रयाग वापस दिये जाने चाहिये। १७५६ मे दोबारा शुजाउद्दौला ने अफगानियों के विरुद्ध मराठों से सहायता मांगी, मराठों ने ३ तीर्थ स्थान वापस हिंदुओं को देने की मांग की, किंतु दुर्भाग्यवश मराठाओं को पानीपत के युद्ध मे हार का सामना करना पडा। अनेकों मुस्लिम और यूरोपीय लेखकों ने इस बात को लिखा है कि मीरबाकी ने बाबर के आदेशानुसार रामकोट मे एक मंदिर को तोड कर उस पर मस्जिद बनाई, वो ये भी कहते हैं कि राम जन्म भूमि पर राम की पूजा की परंपरा रही है, और ये भी कहते हैं कि रामनवमी के दिन संपूर्ण भारत से लोग यहां उत्सव के लिये आते हैं। इनमे से कुछ लेखक इस प्रकार हैं ...

" डी हिस्ट्री एंड जियोग्राफी ऑफ इंडिया " जोसफ ताईपेनथालर, द्वारा १७८५;
" सफियाई चहल नसाई बहादुर शाही " बहादुर शाह की पुत्री द्वारा, १७वीं/ १८वीं शताब्दी;
" रिपोर्ट बाई मोंट कमरी मार्टिन " एक ब्रिटिश सर्वेक्षक, १८३८;
" द इस्ट इन्डिया कंपनी गजेटीयर " एडवर्ड फाऊनटेन द्वारा, १८५४;
" हडियोकाई शहादत " मिर्ज़ा जान द्वारा, १८५६;

इसके बाद के अपेक्षाकृत शांतिकाल मे भी ऊधवदास और बाबा रामचरन दास ने नसीरुद्दीन हैदर और वाजिद अली शाह के शासन काल मे जन्मभूमि की मुक्ति के प्रयास जारी रखे। १८५७ मे आमिर अली ने जिहाद की घोषणा की और १७० आदमियों के साथ हनुमान गढी पर आक्रमण किया किंतु अपने जिहाद के साथ वह भी हार गया। इसके पश्चात १८५७ की क्रांति आई, जब हिंदू और मुस्लिम दोनों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध लडाई की, तब एक मौलवी आमिर अली ने स्थानीय मुस्लिमो को समझा कर रामजन्मभूमि हिंदुओ को सौंपनी के लिये तैयार कर लिया। किंतु अंग्रेजो ने फूट डाल कर राज करने की अपनी रणनीति के द्वारा आमिर अली और बाबा रामचंद्र दास को अयोध्या मे ही एक इमली के पेड पर लटका कर फांसी दे दी। आज भी वह इमली का पेड उस घटना का प्रत्यक्षदर्शी बना अयोध्या मे खडा है।

सार्जेंट जनरल एडवर्ड बॉल्फर के एन्साइक्लोपिडिया ऑफ इंडिया में मंदिर के स्थान पर तीन मस्जिदों का उल्लेख किया गया है। एक जन्मस्थल पर, दूसरी स्वर्गद्वार पर और तीसरी त्रेता का ठाकुर पर ऊपर बताई गयी। किताबों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें भी हैं जिसमे इन बातों का उल्लेख आता है, यह किताबें हैं ...

" फ़साना-ए-इबरत " मिर्ज़ा राजम अली बेग द्वारा, १८६७;
" तरीक-ए-अवध " शेख मोहम्मद अली जरत द्वारा, १८६९;
" अ हिस्टोरिकल ऑफ फैजाबाद " पी.कार्नेगी द्वारा, १८७०;
" द गजेटीयर ऑफ द प्रोविंस ऑफ आगरा एंड ओउध " १८७७;
" द इम्पीरियल गजेटीयर ऑफ फैजाबाद " १८८१;
" गुमश्ते-हालात-ए-अयोध्या " मौलवी अब्दुल करीम द्वारा;

1१८८६ मे मौहम्मद असगर की याचिका पर न्यायमूर्ति कर्नल एफ ई ए शॉमायर ने अपने फैसले मे कहा.. " हिंदुओ की पवित्र भूमि पर मस्जिद बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है, किंतु यह कार्य ३५६ वर्ष पूर्व १५३० मे किया गया। अतः इसका आज हल निकालना संभव नही है। " १९३४ मे अयोध्या मे हिंदू मुस्लिम दंगा हुआ, मस्जिद के आस पास हुए दंगे से ढांचे को नुकसान हुआ ...

Saturday, December 10, 2011

महाराजा भर्तृहरि कथा


प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (नूतन संवत्सर) पर हम राजा विक्रमादित्य और उनकी गौरव गाथा याद करते हैं; पर उनके बड़े भाई महाराजा भर्तृहरि की कथा भी अत्यन्त प्रेरक है। यदि भर्तृहरि वैरागी न बनते, तो न राजा विक्रमादित्य होते और न उनकी गौरव गाथाएं।

सूर्यवंशी भर्तृहरि का जन्म क्षिप्रा के तट पर स्थित ऐतिहासिक नगर अवन्तिका (उज्जैन) में हुआ था। वे रघुकुलभूषण श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण के पुत्र मालव के कुल में जन्मे थे, जिनके नाम पर यह क्षेत्र मालवा कहलाता है। उनके पिता गंधर्वसेन या चंद्रसेन की पहली पत्नी से भर्तृहरि तथा मैनावती और दूसरी से विक्रमादित्य का जन्म हुआ था। नामकरण के समय कुल पुरोहित ने कहा कि 17वें वर्ष में इसका विवाह होगा; पर 18वें वर्ष में यह उत्तर दिशा के जंगल में सफेद घोड़ी पर बैठकर काले हिरण का शिकार करेगा। इससे इसके मन में वैराग्य उत्पन्न होगा और यह योगी बन जाएगा।

राजा-रानी की चिंताओं के बीच भर्तृहरि ने गुरुकुल में शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा पाई और 16वें वर्ष में घर वापस आकर वे राजा बने। शासन व्यवस्था अति उत्तम होने के कारण उनका राज्य एक आदर्श राज्य बन गया। 17 वें वर्ष में सिंहल देश की राजकुमारी पिंगला से उनका विवाह हुआ। विवाह होते ही भर्तृहरि का मन राजकाज से उचट गया और वे दिन-रात पत्नी के साथ भोग में रम गये।

उनके भोग-विलास में लिप्त रहने से राज्य का भार छोटे भाई विक्रमादित्य पर आ गया। उन्होंने कई बार बड़े भाई को समझाया; पर भर्तृहरि काम के प्रभाव में थे। करेले पर नीम की तरह इसी बीच उनका विवाह एक अन्य राजकुमारी अनंगसेवा से भी हो गया। दोनों पत्नियों के साथ भर्तृहरि राजकाज को पूरी तरह भूल गये। इतना ही नहीं, अनंगसेवा की झूठी शिकायत पर उन्होंने विक्रमादित्य को राज्य से निकाल दिया।

ऐसा कहते हैं कि भर्तृहरि पूर्व जन्म में योगी थे। एक बार देवलोक में गोरखनाथ से उनके गुरु मच्छेन्द्रनाथ ने कहा कि भर्तृहरि इस जन्म में योग की बजाय भोग में लिप्त हो गया है। अतः उसे फिर से योगी बनाना है। गुरु की आज्ञा मानकर गोरखनाथ वेष बदलकर भर्तृहरि के राज्य में आये और उनकी अश्वशाला के प्रमुख बन गये।

एक बार एक संन्यासी ने राजा भर्तृहरि को एक अमरफल देकर कहा कि इसे खाने वाला सदा युवा बना रहेगा। राजा उन दिनों अनंगसेवा के साथ अधिक रहते थे। उन्होंने सोचा कि यदि यह फल अनंगसेवा खाएगी, तो वह चिरयुवा रहकर मुझे तृप्त करती रहेगी। अतः उन्होंने वह फल उसे दे दिया।

पर रानी अनंगसेवा राजा से पूर्ण संतुष्ट नहीं थी। वह उनके सारथी चंद्रचूड़ से प्रेम करती थी। उसने फल चंद्रचूड़ को दे दिया। चंद्रचूड़ एक वेश्या का प्रेमी था, उसने फल वेश्या को दे दिया। इधर भर्तृहरि भी यदाकदा उस वेश्या के पास जाते थे। अगले दिन जब वह वहां गये, तो वेश्या ने फल भर्तृहरि के हाथ में रख दिया।

फल देखकर भर्तृहरि के होश उड़ गये। उन्होंने तलवार निकाली तो वेश्या, चंद्रचूड़ और अनंगसेवा की पूरी कथा सामने आ गयी। इससे अनंगसेवा को इतनी आत्मग्लानि हुई कि उसने आत्मदाह कर लिया। राजा इससे उदास रहने लगे। एक बार मन बहलाने के लिए वह शिकार को गये। वहां उनके साथी ने एक हिरन को मारा; पर उसी समय वह स्वयं भी सर्पदंश से मर गया। उसकी पत्नी अपने पति के साथ चिता पर चढ़ गयी। जब राजा ने यह घटना पिंगला को बताई, तो उसने कहा कि साध्वी नारी पति की मृत्यु की बात सुनते ही प्राण छोड़ देती है। यह बात राजा के मन में बैठ गयी।

फल वाली घटना और अनंगसेवा की मृत्यु से भर्तृहरि का मन राजकाज से उचट गया। इससे राज्य की हालत बिगड़ने लगी। ऐसे में उन्हें फिर अपने भाई की याद आई। उन्होंने प्रयासपूर्वक अपने भाई को ढूंढा और उसे फिर राजकाज संभालने को कहा। इधर राजा अपना अधिकांश समय पिंगला के महल में बिताने लगे। उसके साथ रहकर राजा को अनुभव हुआ कि वह कितनी सात्विक, उदार और बड़े हृदय की नारी है। इससे वे आत्मग्लानि में डूब गये।
अंततः राजा के जीवन का 18 वां वर्ष प्रारम्भ हो गया। राजा उस दिन सुबह से ही शिकार की तैयारी कर रहे थे। रानी पिंगला को पुरोहित की भविष्यवाणी मालूम थी। अतः उसने यह प्रसंग टालना चाहा; पर विधि का विधान कौन टाल सकता है ? अश्वशाला के प्रमुख ने सफेद घोड़ी तैयार कर दी। राजा मानो किसी डोर से बंधे उत्तर दिशा में ही शिकार के लिए चल दिये।

जंगल में राजा ने देखा कि बहुत से हिरनियों के बीच एक काला नर हिरन विद्यमान है। राजा के धनुष चढ़ाते ही हिरनियों ने उनसे झुंड के एकमात्र नर को न मारने की प्रार्थना की; पर राजा ने तीर चला दिया। यह देखकर हिरनियों ने भी एक-एक कर उसके पास आकर प्राण त्याग दिये।

राजा यह देखकर भौचक रह गया। मरते हुए हिरन ने राजा से कहा कि वे उसकी खाल गोरखनाथ जी को तथा सींग किसी जोगी को दे दें, जिससे बनी सेली (सींगवाद्य) बजाकर वह सबको राजा भर्तृहरि के पाप की कहानी सुनाएं। राजा उस हिरन के वचन सुनकर तथा हिरनियों का प्रेम देखकर दंग रह गया। उसे लगा कि उसने पूर्वजन्म के किसी बड़े धर्मात्मा की हत्या कर दी है। तभी वहां योगी गोरखनाथ जी का आगमन हुआ। राजा की प्रार्थना पर उन्होंने भभूत डालकर हिरन और हिरनियों को जीवित कर दिया।


अब राजा ने भी उनसे दीक्षा लेनी चाही। गोरखनाथ ने कहा कि दीक्षा तभी मिल सकती है, जब इस जन्म के साथ ही पूर्व जन्मों की आसक्ति भी मिट जाए। इसके लिए तुम राजसी वस्त्र त्यागकर अपने महल में जाओ और रानी पिंगला को मां कहकर भिक्षा लाओ।

गोरखनाथ जी की आज्ञानुसार भर्तृहरि अपने महल में जाकर मां पिंगला से भिक्षा मांगने लगा। पिंगला ने उन्हें बहुत समझाया; पर राजा तो वैराग्य की गंगा में नहा रहा था। इस अवसर पर भर्तृहरि और पिंगला का संवाद बहुत मार्मिक है। काफी देर बाद पिंगला ने उसे भिक्षा में अपना सौभाग्य चिन्ह दे दिया। उसका विचार था कि इससे राजा के मन में जमी वासनाएं फिर से नहीं उभरेंगी।

अब गोरखनाथ जी ने उसे अपनी बहिन मैनावती के घर से भिक्षा लाने को कहा। मैनावती ने उसे साधारण जोगी समझकर दासी के हाथ से भिक्षा भेजी; पर भर्तृहरि ने रानी मैनावती के हाथ से ही भिक्षा लेने की जिद की। इस पर उसने बाहर आकर अपने भाई को भिक्षा दी। यहां उन दोनों में जगत की निःसारता पर रोचक एवं ज्ञानवर्धक संवाद हुआ। बहिन के आग्रह पर भर्तृहरि ने वचन दिया कि वह जब भी याद करेगी, वह उससे मिलने आएंगे।

अब गोरखनाथ जी ने भर्तृहरि को अरावली की गुफाओं में तप करने को कहा। भर्तृहरि को पिंगला की वह बात याद थी, जो उसने राजा के एक साथी की सर्पदंश से मृत्यु पर कही थी कि साध्वी स्त्री अपने पति की मृत्यु का समाचार सुनते ही देह त्याग देती है।

भर्तृहरि ने इसकी परीक्षा करने के लिए सेवक को खून में सने अपने राजसी वस्त्र देकर पिंगला के पास भेजा। सेवक ने रानी को बताया कि उनकी बातों पर विचार करने से भर्तृहरि का वैराग्य छूट गया। वे राजसी वस्त्र पहनकर वापस आ रहे थे कि एक शेर ने हमलाकर उन्हें मार डाला। यह सुनते ही रानी के दाहिने पैर के अंगूठे से अग्नि प्रकट हुई, जिससे कुछ ही समय में उन रक्तरंजित वस्त्रों के साथ उसकी देह भस्म हो गयी।

अब तो राजा के मन के सब बंधन कट गये। उन्होंने गोरखनाथ जी को सब बात बताई। गोरखनाथ जी ने भर्तृहरि के साथ महल में जाकर श्रद्धाभाव से रानी की भस्म माथे पर लगाई तथा नाथ संप्रदाय की दीक्षा देकर भर्तृहरि के कान में कुंडल पहना दिये। इस प्रकार गोरखनाथ ने अपने गुरु को दिया वचन पूरा कर दिया।

अब योगी भर्तृहरि ने देश भ्रमण करते हुए कई स्थानों पर तपस्या की। प्रयाग के कुंभ में उनकी भेंट अपने भानजे गोपीचंद से हुई। वह भी उस समय योगी हो चुका था। कुंभ के बाद दोनों अलवर के पास त्रिगर्तनगर (तिजारा) में लगातार बारह वर्ष तक रहे। यहां थानाभक्त नामक कुम्हार ने उनके भोजनादि की व्यवस्था की; पर इससे उसकी पत्नी बहुत रुष्ट हो गयी। अतः कुम्हार की अनुपस्थिति में वे उसे भरपूर धन देकर चले गये। तिजारा में स्थित भर्तृहरि गुम्बज उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाये है।

इसके बाद भर्तृहरि ने अरावली की पहाड़ियों में ध्यान करते हुए अपनी देह त्याग दी। उनके शरीर पर मिट्टी की परत चढ़ती गयी और क्रमशः वहां एक टीला बन गया। गुरु गोरखनाथ के प्रताप से वहां सिर झुकाने वालों की मनोकामना पूर्ण होने लगीं। आज यहां एक भव्य मंदिर बना है, जिसमें बाबा भर्तृहरि की अखंड ज्योति जलती है। उनकी पुण्य तिथि भादों शुक्ल अष्टमी (इस वर्ष पांच सितम्बर) को यहां विशाल लक्खी मेला होता है, जिसमें देश भर से हिरण का सींगवाद्य (सेली) साथ रखने वाले नाथ सम्प्रदाय के योगी अवश्य आते हैं।

कविहृदय भर्तृहरि ने अपने जीवन के सम्पूर्ण अनुभव को शतकत्रयी (शृंगार शतक, नीति शतक तथा वैराग्य शतक) में प्रस्तुत किया है। उन्होंने संस्कृत के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ ‘वाक्यपदीय’ की रचना भी की है। उनका जीवन भोग से योग तथा भुक्ति से मुक्ति की गाथा है। नाथ पंथ की मान्यता के अनुसार वे अमर हैं। उनकी अमरता की गाथा आज भी लोकगीतों और लोककथाओं में जीवित है। 

मेवाड़ का अपराजित हिन्दू राजा महाराणा प्रताप


परिचय
शासन काल    - 1568–1597
जन्म             -  May 9, 1540
जन्मस्थान     - कुम्भलगढ़, जुनी कचेरी, पाली
देहावसान       - जनवरी 19, 1597 (आयु 57)
पूर्वाधिकारी     - महाराणा उदय सिंह II
संतान            - 3 बेटे और 2 बेटी
राजवंश          - सूर्यवंशी राजपूत
पिता              - महाराणा उदय सिंह II
माता              - महारानी जावंता बाई
धर्म                - हिन्दू 


राजपूताने की वह पावन बलिदान-भूमि, विश्वमें इतना पवित्र बलिदान स्थल कोई नहीं । 
इतिहासके पृष्ठ रंगे हैं उस शौर्य एवं तेज़की भव्य गाथासे ।
 
प्रस्तावना - भीलोंका अपने देश और नरेशके लिये वह अमर बलिदान, राजपूत वीरोंकी वह तेजस्विता और महाराणाका वह लोकोत्तर पराक्रम— इतिहासका, वीरकाव्यका वह परम उपजीव्य है । मेवाड़के उष्ण रक्तने श्रावण संवत 1633 वि. में हल्दीघाटीका कण-कण लाल कर दिया । अपार शत्रु सेनाके सम्मुख थोड़े–से राजपूत और भील सैनिक कब तक टिकते ? महाराणाको पीछे हटना पड़ा और उनका प्रिय अश्व चेतक-उसने उन्हें निरापद पहुँचानेमें इतना श्रम किया कि अन्तमें वह सदाके लिये अपने स्वामीके चरणोंमें गिर पड़ा ।
महाराणा चित्तौड़ छोड़कर वनवासी हुए । महाराणी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घासकी रोटियों और निर्झरके जलपर किसी प्रकार जीवन व्यतीत करनेको बाध्य हुए । अरावलीकी गुफ़ाएँ ही आवास थीं और शिला ही शैया थी । दिल्लीका सम्राट सादर सेनापतित्व देनेको प्रस्तुत था, उससे भी अधिक- वह केवल चाहता था प्रताप अधीनता स्वीकार कर लें, उसका दम्भ सफल हो जाय । हिंदुत्व पर दीन-इलाही स्वयं विजयी हो जाता । प्रताप-राजपूतकी आनका वह सम्राट, हिंदुत्वका वह गौरव-सूर्य इस संकट, त्याग, तपमें अम्लान रहा- अडिंग रहा । धर्मके लिये, आनके लिये यह तपस्या अकल्पित है । कहते हैं महाराणाने अकबरको एक बार सन्धि-पत्र भेजा था, पर इतिहासकार इसे सत्य नहीं मानते । यह अबुल फजल की गढ़ी हुई कहानी भर है। अकल्पित सहायता मिली, मेवाड़के गौरव भामाशाहने महाराणाके चरणोंमें अपनी समस्त सम्पत्ति रख दी । महाराणा इस प्रचुर सम्पत्तिसे पुन: सैन्य-संगठनमें लग गये । चित्तौड़को छोड़कर महाराणाने अपने समस्त दुर्गोंका शत्रुसे उद्वार कर लिया ।  उदयपुर उनकी राजधानी बना । अपने 24 वर्षोंके शासन कालमें उन्होंने मेवाड़की केशरिया पताका सदा ऊँची रखी ।
प्रताप  की प्रतिज्ञा 
प्रतापको अभूतपूर्व समर्थन मिला । यद्यपि धन और उज्जवल भविष्यने उसके सरदारोंको काफ़ी प्रलोभन दिया, परन्तु किसीने भी उसका साथ नहीं छोड़ा ।  जयमलके पुत्रोंने उसके कार्यके लिये अपना रक्त बहाया, पत्ताके वंशधरोंने भी ऐसा ही किया और सलूम्बरके कुल वालोंने भी चूण्डाकी स्वामिभक्तिको जीवित रखा । इनकी वीरता और स्वार्थ—त्यागका वृत्तान्त मेवाड़के इतिहासमें अत्यन्त गौरवमय समझा जाता है । उसने प्रतीज्ञा की थी कि वह 'माताके पवित्र दूधको कभी कलंकित नहीं करेगा ।' इस प्रतिज्ञाका पालन उसने पूरी तरहसे किया।  कभी मैदानी प्रदेशोंपर धावा मारकर जन—स्थानोंको उजाड़ना तो कभी एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर भागना और इस विपत्ति कालमें अपने परिवारका पर्वतीय कन्दमूल फल द्वारा भरण-पोषण करना और अपने पुत्र अमरका जंगली जानवरों और जंगली लोगोंके मध्य पालन करना-अत्यन्त कष्टप्राय कार्य था । इन सबके पीछे मूल मंत्र यही था कि बप्पा रावलका वंशज किसी शत्रु अथवा देशद्रोहीके सम्मुख शीश झुकाये - यह असम्भव बात थी।  क़ायरोंके योग्य इस पापमय विचारसे ही प्रतापका हृदय टुकड़े-टुकड़े हो जाता था । तातार वालोंको अपनी बहन-बेटी समर्पण कर अनुग्रह प्राप्त करना, प्रतापको किसी भी दशामें स्वीकार्य न था । 'चित्तौड़के उद्धारसे पूर्व पात्रमें भोजन, शय्यापर शयन दोनों मेरे लिये वर्जित रहेंगे ।' महाराणाकी प्रतिज्ञा अक्षुण्ण रही और जब वे (वि0 सं0 1653 माघ शुक्ल 11) ता0 29 जनवरी सन 1597 में परमधामकी यात्रा करने लगे, उनके परिजनों और सामन्तोंने वही प्रतिज्ञा करके उन्हें आश्वस्त किया । अरावलीके कण-कणमें महाराणाका जीवन-चरित्र अंकित है। शताब्दियों तक पतितों, पराधीनों और उत्पीड़ितोंके लिये वह प्रकाश का काम देगा । चित्तौड़की उस पवित्र भूमिमें युगों तक मानव स्वराज्य एवं स्वधर्मका अमर सन्देश झंकृत होता रहेगा ।
 
 माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राण प्रताप ।
 अकबर सूतो ओधकै, जाण सिराणै साप ॥

कठोर जीवन निर्वाह
चित्तौड़के विध्वंस और उसकी दीन दशाको देखकर भट्ट कवियोंने उसको 'आभूषण रहित विधवा स्त्री- की उपमा दी है । प्रतापने अपनी जन्मभूमिकी इस दशाको देखकर सब प्रकारके भोग—विलासको त्याग दिया, भोजन—पानके समय काममें लिये जाने वाले सोने-चाँदीके बर्तनोंको त्यागकर वृक्षोंके पत्तोंको काममें लिया जाने लगा, कोमल शय्याको छोड़ तृण शय्याका उपयोग किया जाने लगा । उसने अकेले ही इस कठिन मार्गको नहीं अपनाया अपितु अपने वंश वालोंके लिये भी इस कठोर नियमका पालन करनेके लिये आज्ञा दी थी कि जब तक चित्तौड़का उद्धार न हो तब तक सिसोदिया राजपूतोंको सभी सुख त्याग देने चाहिएँ । चित्तौड़की मौजूदा दुर्दशा सभी लोगोंके हृदयमें अंकित हो जाय, इस दृष्टिसे उसने यह आदेश भी दिया कि युद्धके लिये प्रस्थान करते समय जो नगाड़े सेना के आगे—आगे बजाये जाते थे, वे अब सेनाके पीछे बजाये जायें । इस आदेशका पालन आज तक किया जा रहा है और युद्धके नगाड़े सेनाके पिछले भागके साथ ही चलते हैं ।

परिवारकी सुरक्षा
इस प्रकार, समय गुज़रता गया और प्रतापकी कठिनाइयाँ भयंकर बनती गईं । पर्वतके जितने भी स्थान प्रताप और उसके परिवारको आश्रय प्रदान कर सकते थे, उन सभीपर बादशाहका आधिकार हो गया । राणाको अपनी चिन्ता न थी, चिन्ता थी तो बस अपने परिवारकी ओरसे छोटे—छोटे बच्चों की । वह किसी भी दिन शत्रुके हाथमें पड़ सकते थे । एक दिन तो उसका परिवार शत्रुओंके पँन्जेमें पहुँच गया था, परन्तु कावाके स्वामिभक्त भीलोंने उसे बचा लिया । भील लोग राणाके बच्चोंको टोकरोंमें छिपाकर जावराकी खानोंमें ले गये और कई दिनों तक वहींपर उनका पालन—पोषण किया । भील लोग स्वयं भूखे रहकर भी राणा और परिवारके लिए खानेकी सामग्री जुटाते रहते थे । जावरा और चावंडके घने जंगलके वृक्षोंपर लोहे के बड़े—बड़े कीले अब तक गड़े हुए मिलते हैं । इन कीलोंमें बेतोंके बड़े—बड़े टोकरे टाँग कर उनमें राणाके बच्चोंको छिपाकर वे भील राणाकी सहायता करते थे।  इससे बच्चे पहाड़ोंके जंगली जानवरोंसे भी सुरक्षित रहते थे । इस प्रकारकी विषम परिस्थितिमें भी प्रतापका विश्वास नहीं डिगा ।

पृथ्वीराजद्वारा प्रताप को प्रेरित करना
प्रतापके पत्रको पाकर अकबरकी प्रसन्नताकी सीमा न रही । उसने इसका अर्थ प्रतापका आत्मसमर्पण समझा और उसने कई प्रकारके सार्वजनिक उत्सव किए । अकबरने उस पत्रको पृथ्वीराज नामक एक श्रेष्ठ एवं स्वाभीमानी राजपूतको दिखलाया । पृथ्वीराज बीकानेर नरेशका छोटा भाई था । बीकानेर नरेशने मुग़ल सत्ताके सामने शीश झुका दिया था । पृथ्वीराज केवल वीर ही नहीं अपितु एक योग्य कवि भी था । वह अपनी कवितासे मनुष्यके हृदयको उन्मादित कर देता था । वह सदासे प्रतापकी आराधना करता आया था। प्रतापके पत्रको पढ़कर उसका मस्तक चकराने लगा । उसके हृदयमें भीषण पीड़ाकी अनुभूति हुई । फिर भी, अपने मनोभावोंपर अंकुश रखते हुए उसने अकबरसे कहा कि यह पत्र प्रतापका नहीं है । किसी शत्रु ने प्रतापके यशके साथ यह जालसाज़ की है । आपको भी धोखा दिया है । आपके ताज़के बदलेमें भी वह आपकी आधीनता स्वीकार नहीं करेगा । सच्चाईको जाननेके लिए उसने अकबरसे अनुरोध किया कि वह उसका पत्र प्रताप तक पहुँचा दे । अकबरने उसकी बात मान ली और पृथ्वीराजने राजस्थानी शैलीमें प्रतापको एक पत्र लिख भेजा ।
अकबरने सोचा कि इस पत्रसे असलियतका पता चल जायेगा और पत्र था भी ऐसा ही । परन्तु पृथ्वीराजने उस पत्रके द्वारा प्रतापको उस स्वाभीमानका स्मरण कराया जिसकी खातिर उसने अब तक इतनी विपत्तियोंको सहन किया था और अपूर्व त्याग व बलिदानके द्वारा अपना मस्तक ऊँचा रखा था । पत्रमें इस बातका भी उल्लेख था कि हमारे घरोंकी स्त्रियोंकी मर्यादा छिन्नत-भिन्न हो गई है और बाज़ारमें वह मर्यादा बेची जा रही है । उसका ख़रीददार केवल अकबर है । उसने सीसोदिया वंशके एक स्वाभिमानी पुत्रको छोड़कर सबको ख़रीद लिया है, परन्तु प्रतापको नहीं ख़रीद पाया है । वह ऐसा राजपूत नहीं जो नौरोजा  लिए अपनी मर्यादाका परित्याग कर सकता है । क्या अब चित्तौड़का स्वाभिमान भी इस बाज़ारमें बिक़ेगा ।

भामाशाहद्वारा प्रतापकी शक्तियाँ जाग्रत होना
पृथ्वीराजका पत्र पढ़नेके बाद राणा प्रतापने अपने स्वाभिमानकी रक्षा करनेका निर्णय कर लिया । परन्तु मौजूदा परिस्थितियोंमें पर्वतीय स्थानोंमें रहते हुए मुग़लोंका प्रतिरोध करना सम्भव न था । अतः उसने रक्तरंजित चित्तौड़ और मेवाड़को छोड़कर किसी दूरवर्ती स्थानपर जानेका विचार किया । उसने तैयारियाँ शुरू कीं । सभी सरदार भी उसके साथ चलनेको तैयार हो गए । चित्तौड़के उद्धारकी आशा अब उनके हृदयसे जाती रही थी । अतः प्रतापने सिंध नदीके किनारेपर स्थित सोगदी राज्यकी तरफ़ बढ़नेकी योजना बनाई ताकि बीचका मरुस्थल उसके शत्रुको उससे दूर रखे । अरावलीको पार कर जब प्रताप मरुस्थलके किनारे पहुँचा ही था कि एक आश्चर्यजनक घटनाने उसे पुनः वापस लौटनेके लिए विवश कर दिया । मेवाड़के वृद्ध मंत्री भामाशाहने अपने जीवनमें काफ़ी सम्पत्ति अर्जित की थी । वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्तिके साथ प्रतापकी सेवामें आ उपस्थित हुआ और उससे मेवाड़के उद्धारकी याचना की । यह सम्पत्ति इतनी अधिक थी कि उससे वर्षों तक 25,000 सैनिकोंका खर्चा पूरा किया जा सकता था । भामाशाहका नाम मेवाड़के उद्धारकर्ताओंके रूपमें आज भी सुरक्षित है । भामाशाहके इस अपूर्व त्यागसे प्रतापकी शक्तियाँ फिरसे जागृत हो उठीं ।

वह पराधीनता की रजनी में गौरव का उजियाला था
जो चढ़ा मान सिंह के सिर पर राणा प्रताप का भाला था
बाप्पा रावल का वंशज वह, भारत गौरव का प्रतिमान
वह दृढ प्रतिज्ञ रण कुशल वीर, रखी राजपूती आन बाण
दुर्दम्य दैत्य अकबर का भी, पड़ गया सिंह से पला था
जो चढ़ा मान सिंह के सिर पर राणा प्रताप का भाला था
गौरव से फूली अरावली, हुई धन्य उदयपुर की माटी
राणा प्रताप की गरिमा के गुण गाती हैं हल्दी घाटी
करके कूदा जब सिंह नाद , बन गया वीर मतवाला था
जो चढ़ा मान सिंह के सिर पर राणा प्रताप का भाला था
मर जाने की मिट जाने की, सुख सुविधा की परवाह नहीं
निज स्वाभिमान जीवित रखा, बस और रखी कुछ चाह नहीं
जब देश झुक रहा था सारा, केसरिया केतु संभाला था
जो चढ़ा मान सिंह के सिर पर राणा प्रताप का भाला था
भामा शाह से मन प्राण मिले, हाकिम सूर नौजवान मिले
निज मातृभूमि की रक्षा हेतु , वनवासी सीना तान मिले
प्राणों का मूल्य चुकाया था, अद्भुत बलिदानी झाला था
जो चढ़ा मान सिंह के सिर पर राणा प्रताप का भाला था
वह राष्ट्र भक्ति से प्रेरित हो, अड़ गया सिंह सा कर गर्जन
मदभरी सल्तनत का जिससे पग-पग पर किया मान मर्दन
अणदाग गया नहीं झुकी पाग, बलिदानी भाव निराला था
जो चढ़ा मान सिंह के सिर पर राणा प्रताप का भाला था


महान छितौड़का दुर्ग जहां बलात्कारी जलालूद्दीन (अकबर) ने
30,000 निहत्ते नागरिकों और किसानोको मौतके घाट उतारा !

श्रृद्धांजलि छंद 
लोक में रहेंगे परलोक हु ल्हेंगे तोहू,
पत्ता भूली हेंगे कहा चेतक की चाकरी ||
में तो अधीन सब भांति सो तुम्हारे सदा एकलिंग,
तापे कहा फेर जयमत हवे नागारो दे ||
करनो तू चाहे कछु और नुकसान कर ,
धर्मराज ! मेरे घर एतो मत धारो दे ||
दीन होई बोलत हूँ पीछो जीयदान देहूं ,
करुना निधान नाथ ! अबके तो टारो दे ||
बार बार कहत प्रताप मेरे चेतक को ,
एरे करतार ! एक बार तो उधारो||

Friday, December 9, 2011

आजाद व्यक्तितत्व (शाहदत का रहस्यत या फिर "नेहरु की साजिश")

पहली रोमांचकारी घटना

१९१९ में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। जब गांधी ने सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पडी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। 

क्रान्तिकारी संगठन

असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् बिना किसे से पूछे गाँधी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया । चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में विजयसिंह का छद्म नाम दिया गया था। शचींद्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगाल में पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। " एच० आर० ए० " के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं- बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था । इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया । लेकिन इससे पहले ही अशफाक उल्ला खाँ ने ऐसी घटनाओं का विरोध किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओं - पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह को १९ दिसम्बर १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर चढ़ाकर मार दिया गया । सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी। ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कडी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर ८ सितम्बर १९२८ को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को भी दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस सभा में केन्द्रित कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को भी दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए " हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन " का नाम बदलकर " हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन " रखा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया- "हमारी लडाई आखिरी फैसला होने तक की लडाई है और वह फैसला है जीत या मौत ।

चरम सक्रियता

आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की । आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवती चरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था । इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गांधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे । झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था।

शाहदत का रहस्यत या फिर या फिर "नेहरु की साजिश"

एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फरवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चंद्रशेखर आजाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की सीतापुर जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने तकियाकलाम 'स्साला' के साथ भुनभुनाते हुए ड्राइँग रूम से बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फरवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

नोट -
जीवन में कभी अंग्रेजो के कभी हाँथ नहीं चड़ने वाला आदमी और हमेशा अंग्रेजो को नाको चने चबाने वाला आदमी कैसे इतनी आसानी से अंग्रेजो के द्वारा घेर लिया जाता है ! समझ से परे है ! हो सकता है की वह किसी विश्वासी के विश्वासघाट के ही शिकार हुए हों, हो सकता है की वह नेहरु ही हों ! यह केवल विचार ही नहीं अपितु एक विषय भी है जो की एक शोध का विषय बन सकता है और इस पर शोध होना भी चाहिए ! यह एक विचार है इस लेख को नापसंद करने वाले कृपया इसे अन्यथा न लें ! 

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चंद्रशेखर आजाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की शहादत की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की शहादत की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।
आज़ाद के शहादत की खबर नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। । बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पडा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फरवरी १९२७ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे पर उन्हें क्या पता था कि इलाहाबाद की इसी धरा पर कुछ दिनों बाद उनका भी बलिदान होगा!

व्यक्तिगत जीवन

आजाद प्रखर देशभक्त थे। काकोरी कांड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाये। परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये। प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। एक बार दल के गठन के लिये मुंबई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए। एक बा‍र आजाद कानपुर के मशहूर व्यवसायी सेठ प्यारेलाल के निवास पर एक समारोह में आये हुये थे । प्यारेलाल प्रखर देशभक्त थे और प्राय: क्रातिकारियों की आथि॑क मदद भी किया क‍रते थे। आजाद और सेठ जी बातें कर ही रहे थे तभी सूचना मिली कि पुलिस ने हवेली को घेर लिया है। प्यारेलाल घबरा गये फिर भी उन्होंने आजाद से कहा कि वे अपनी जान दे देंगे पर उनको कुछ नहीं होने देंगे। आजाद हँसते हुए बोले-"आप चिंन्ता न करें, मैं कानपुर के लोगों को मिठाई खिलाये बिना जाने वाला नहीं।" फिर वे सेठानी से बोले- "आओ भाभी जी! बाह‍र चलकर मिठाई बाँट आयें।" आजाद ने गमछा सिर पर बाँधा, मिठाई का टो़करा उठाया और सेठानी के साथ चल दिये। दोनों मिठाई बाँटते हुए हवेली से बाहर आ गये। बाहर खडी पुलिस को भी मिठाई खिलायी। पुलिस की आँखों के सामने से आजाद मिठाई-वाला बनकर निकल गये और पुलिस सोच भी नही पायी कि जिसे पकडने आयी थी वह परिन्दा तो कब का उड चुका है। ऐसे थे आजाद! आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बडे आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। वे सच्चे अर्थों में पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के वास्तविक उत्तराधिकारी जो थे।चंद्रशेखर आजाद हमेशा सत्य बोलते थे। एक बार की घटना है आजाद पुलिस से छिपकर जंगल में साधु के भेष में रह रहे थे तभी वहाँ एक दिन पुलिस आ गयी। दैवयोग से पुलिस उन्हीं के पास पहुँच भी गयी। पुलिस ने साधु वेश धारी आजाद से पूछा-"बाबा!आपने आजाद को देखा है क्या?" साधु भेषधारी आजाद तपाक से बोले- "बच्चा आजाद को क्या देखना, हम तो हमेशा आजाद रहते‌ हें हम भी तो आजाद हैं।" पुलिस समझी बाबा सच बोल रहा है, वह शायद गलत जगह आ गयी है अत: हाथ जोडकर माफी माँगी और उलटे पैरों वापस लौट गयी।
चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके।